नन्दलाल वर्मा री कवितावां
कविता : सात रंग
(1)
खारो-जैर ही
क्यूं नीं हुवै
कविता करै
कविता करै
सामी छाती
सांच रो सामनो ।
***
(2)
भाव तो
ऊंचै सूं ऊंचा
हो सकै
कविता रा
पण नीं हुवै
तो
मोल-भाव !
***
(3)
कविता तो बणै
सबद सूं सबद
जुड़यां
तुक मिलो
भावै ना मिलो
छिटक’र
न्यारो हुयोड़ो
एकलो सबद
भलां ही
कितरां ही आखरां रो
कितरो ही बडो
कितरो ही पाणीदार
क्यूं नीं हुवै
कविता कदै नीं बण सकै ।
***
(4)
दूजै दिन
पाटी खुल्यां
आपरी काची-कंवळी
किल्कारियां मारती
पोती नै
मुळकती देख’र
रूं-रूं
मुळकण लागज्या
जणा कविता
अर कारी में
कोई भेद नीं रैवै !
***
(5)
हवा में
कदैई नीं उडै
भांवै मान-सम्मान सूं
बीं रो कद
अम्बरां तांई पूगज्या
कविता री आ ही’ज
ओळख है-
बा आपरा पग
धरती माथै
जमाया राखै ।
***
(6)
अंतस रो अणैसो
हिवड़ै री पीड़
मन रो मोद
हेत री हथायां अर
प्रीत री ओळ्यूं सूं रीती
सूकी-पाकी ओळियां
भलां ही मोती बरणै
फूटरै-फर्रे आखरां में
कागदां पर मंड्योड़ी हुवै
बा रचना कीं भी हुवो,
पण बा
कविता तो नीं हुवै ।
***
(7)
म्हैं नीं जाणूं
कविता री भाषा, व्याकरण
अलंकार अर सबद सलीको
पण म्हैं सोचूं
शिव रा लीला कंठ
रामजी रो बन-बीखो,
सिंधासण पर पड्या खड़ाऊ,
बगल में दब्योड़ी
मुट्ठी’क चावळां री पोटळी,
माईतां रो जमारो सुधारती
कांधै माथै टिकी कांवड़
पीथळ री पाती,
पातल री छाती,
बेटी री मुळक सारू
निछरावळ होंवता मां-बाप
कविता रा ही’ज तो
अखूट दरसाव है ।
***
drnlverma@gmail.com
9414381427
सूरतगढ़
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