प्रेमलता जैन री कवितावां
गीत
डायजिया का बोल सुणूँ जद
याँ होठाँ ने म्हँ सील्यूँ ऐ/ घुटक ज्हैर की पील्यूँ ऐ
डायजिया का बोल सुणूँ जद बीजळ नणदळ का -----
घणां लाड़ सूँ पाळी पोसी, दूध कटोराँ प्वायो,
रात रात भर गोद्याँ में ले बाबुल चाँद दिखायो,
बिना डायजे बण्यो अकारथ सारो लाड़ लड़ायो,
दुनिया भर की जूँठ माँजबो म्हारे पाँती आयो,
घुटी घुटी सी रहल्यूँ ऐ/ मन में पीड़ा सह ल्यूँ ऐ
डायजिया का बोल सुणूँ जद बीजळ नणदळ का -----
’’कठी मेल दी बाबुल जी ने सारी मूँड कमाई,
ज्याँ बीराँ पे तू गरबै छै, आछी नाक कटाई,
सासरियो चोखो यो मिलग्यो, लगी न्हँ कोड़ी- पाई,
हीरा सा बेटा के पल्ले भूखा घर की आई ’’
सासू का ताना सुण ल्यूँ ऐ, भाटा सा मन पे चुण ल्यूँ ऐ
डायजिया का बोल सुणूँ जद बीजळ नणदळ का -----
जेठाण्याँ का ओढ़स- डोढ़ज्ञा बोल काळज्ये साळै,
हरता फरता देवर जी भी घणीं मसखर्या राळै,
बैठ हथायाँ ससुरा बोले- ‘‘ पड़ी लखपति पालै’
थोड़ा होठा खुल्या- सायब का थापड़- थोल्या चालै,
रो’र बसकड़ा भर ल्यूँ ऐ/ घूँघट ने गीलो कर ल्यूँ ऐ/
डायजिया का बोल सुणूँ जद बीजळ नणदळ का -----
अणबोल्यो धन बणके बेट्याँ कद ताँई रह्वैगी,
छुरी कसायाँ की गरदन पे, कद ताँई सह्वैगी,
मरदाँ की नरमम करतूताँ, कद ताँई कह्वैगी,
कद समाज की ठेकेदारी, याँ ने उत्तर दैगी,
मूँण्डा ने म्हँ कील्यूँ ऐ/ बणीं जनावर जी ल्यूँ ऐ/
डायजिया का बोल सुणूँ जद बीजळ नणदळ का -----
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(आभार : श्री अतुल कनक)

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