जनकराज पारीक री कवितावां


गीत- ओळूं
ठेला-ठेल मची सड़कां पर,सुस्तांवण न कठै न ठांव ।
इण माया नगरी में आई ओळूं थांरी    म्हारा गांव ॥
              मिनखपणै रो काळ अठै है,
               पड़्यो प्रीत रो टोटो ।
               ऊपर सूं है घणो फ़ूटरो,
               मन रो माणस खोटो ॥
अठै तीख रो तपै तावडो़ , अठै कठै है बड़ री छांव ।
इण माया नगरी में आई ओळूं थांरी    म्हारा गांव ॥
               अब झूरां बां धरकोटां पर,
               झिरमिर पड़तो पाणी ।
               लारै रैगी सुख री घड़ियां,
               करती गाणी - माणी ॥
अथै बजारां सुपना बिकग्या,भरी भीड़ में हरया दांव ।
इण माया नगरी में आई ओळूं थांरी    म्हारा गांव ॥
               अठै भीड़ में फ़िरै भटकता,
               बण्या लोग बिणज्यारा ।
               अठै कठै "कासम" री काणी
               हुणतै रा हुंकारा ॥
अठै है गीत कठै पिणघट रा, अठै सुणौ कागां री कांव ॥
इण माया नगरी    में आई ओळूं थांरी      म्हारा गांव ॥
 ***

म्हूं के बोलूं
म्हूं तो कुछ नीं बोलूं
म्हूं तो चुप हूं साहब,
बाहर सूं दीखूं-
भीतर सूं घुप हूं साहब ।
दड़ बोच्यां बैठ्यो हूं
डरतो तलवारां सूं-
मीठो खरबूजो हूं
कट जासूं धारां सूं ।
थे बळती तीळी माचस री
म्हूं तूडी़ रो कुप हूं साहब ।
थे म्हारी किस्मत रा मालक
थे कहदयो सो ठीक।
हुकुम-हज़ूरी गोल-चाकरी
म्हां हाथां री लीक,
चौकस-चतुर फ़ील्डर थे,अर
म्हूं सीदो सो गुप हूं साहब ।
***
श्री जनकराज पारीक 
(17 सितम्बर, 1947)
30-मंडी ब्लोक,श्रीकरणपुर-335073,
जिला-श्रीगंगानगर,राजस्थान

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