दहकते पलाश
“मम्मी, पापा इस समर- वेकेशन में मैं इंडिया जा रही हूं। झारखंड की आदिवासी स्त्रियों पर मेरा प्रोजेक्ट ऐक्सेप्ट हो गया है। वहां जाने और रहने के लिए मुझे ग्रांट भी मिली है।’’खुशी से उमगती दीप्ति ने अपनी माँ सुषमा और पापा अनिल को सूचना दी।
“क्या, पागल हो गई है, दीपू? भला उन जंगली लोगों के बीच तू रह सकेगी। आदमी तीर-कमान लिए शिकार करते फिरते हैं। शिकार का अधपका मांस खाने वालों को तू क्या सह सकेगी।“
“क्या, पागल हो गई है, दीपू? भला उन जंगली लोगों के बीच तू रह सकेगी। आदमी तीर-कमान लिए शिकार करते फिरते हैं। शिकार का अधपका मांस खाने वालों को तू क्या सह सकेगी।“
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