निर्मल कुमार शर्मा री कवितावां

निर्मल कुमार शर्मा

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 कवितावां- नुंवै पोत री


हुर्र 

लाडूडाँ ज्यूँ भुरती ईंटा, पंजीरी ज्यूँ खिरती रेत
घेवर ज्यूँ छिदियोड़ी छातां, पापड़ ज्यूँ फड़फड़ता गेट 
सीरे ज्यूँ पसरयोड़ी नालियाँ, डंकोली ज्यूँ बांका पेम्प
कच्चोडी ज्यूँ थोथी सड़काँ, सम्मोसे ज्यूँ तीखा रेम्प
अजब बनाई रचना, थांरी हुर्र बोलू
थानें इंजीनीयर बतलाऊँ, या हलवाई बोलूं !! 

धुर्र

बिन हाथ लगाया, दरद जाण गया
परची मोटी करी तय्यार
जांच कराइ बार लैब स्यूं
रपट पढी ना एक भी बार
सात-आठ एक गोल्याँ लिख दी
पीवण री शीश्याँ दी चार
ठीक हुयो तो महिमा थांरी 
मरग्यो तो मालिक री मार

अजब लगावो मजमो, थांरी धुर्र बोलूं
थानें डाक्टर बतलाऊँ, या मदारी बोलूं !!

फुर्र

कालो कोट अर धोळी टाई 
हर कालिख री करो सफाई
करियावे चोरी डाले डाका
थें सदा रहो रक्षक याँका
गुंडा - हतियारा फिरे निडर 
थांरी किरपा को ही है असर
कचैड़याँ रा थें राजा हो
टके सेर बिक़े बे खाजा हो 
बाखड़ में दूध संभालो थें
खळ स्यूं भी तेल निकालो थें

अजब चलावो घाणी, थांरी फुर्र बोलूं
थांने वकील मैं बतलाऊँ, या कि तेली बोलूं !!


सुर्र

वर्दी रो मान टंग्यो खूँटयां
डंडे रो गज़ब रामो थें खेल
मुट्ठी गरम तो खूँ माफ़
नीं बदचलनी में भेजो जेल
दंगा ह्वे या हुवे कतल
बलवो ह्वे ठोकीजे निरबल
हर जुर्म री खबर रेवे थानें
या बात सारी दुनिया जाणे
पण गज री चाल सून आवो थें
जो पड़े दाब तो जांच करो
नीं, यूँ ही ऍफ़ आर लगावो थें


अजब जमाओ रुतबो, थांरी सुर्र बोलूँ
थानेदार कहूं, या, थानें गज गेलो बोलूँ !!
   

आदमी

आदमी रह्यो न देखो-देखो आज आदमी
आदमी ने खाय रह्यो, देखो आज आदमी !!

धरती बांटी, आभो बांटयो, बाँट डाल्यो नीर भी
धर्म री दीवार खींच, बांटयो मालिक पीर भी !
नैणा रे नीर री, पीर यो न बाँट सक्यो
खेंच डाल्यो लाश सूँ, कफ़न रो कोरो चीर भी !

मिनखपणों मानखे रो भूल गयो आदमी 
आदमी ने खाय रह्यो, देखो आज आदमी !!
हाउडे सूँ डरतो चिपतो, भूल गयो छाती बा
भूल्यो संस्कार री, गुरां पढाई पाटी बा !
जायदाद बाप री, में सीर यो न भूल सक्यो 
माँ-जाया दूर, भूल्यो माँ रे दूध री मिठास भी !

रिश्तां ने ताकड़ी में, तोल रह्यो आदमी 
आदमी ने खाय रह्यो, देखो आज आदमी !!

जीवतां जिमायो कोनी, मरियां मौसर अनाप
ता जिन्दगी उघाड़े लारे, कर रह्या ओढावणी !
माल यूँ उडाय रह्या, ब्याव ज्यूँ मंड्यो है कोई
भूल रह्या है बगत री मार सूँ, बच्यो ना कोई!

झूठी बड़ाई में बड़ाई, खोय रह्यो आदमी
आदमी ने खाय रह्यो, देखो आज आदमी !!

सोवतो जगाणो सोरो, जागतो जगावे कौन
सूजतो भी खाड में, पड़े अहि तो बचावे कौन !
संस्कृति ने छोड़ के, मरजादा ने मरोड़ के
खुद मारे खुद री आतमा, तो बोलो फिर बचावे कौन !

निरमल बणेलो भाईयाँ, फिर आदमी कद आदमी
आदमी ने खाय रह्यो, देखो आज आदमी !!

विधाता बैरी भयो

जिण रे तल़े मिलती शीतळ छाया
फूल्या-फ़ल्या मैं, खेल्या-खाया
सूख्यो बो बट , लुटियो चैण
विधाता बैरी भयो !!

गोद्याँ सुलायो म्हाने, कान्धां झुलायो म्हाने
कोर काळजिये ज्यूँ, हिव चिपकायो म्हाने
फेरया यूँ आज देखो नैण
विधाता बैरी भयो !!

आंगली पकड़ म्हाने चलणो सिखायो
हर आपद सूँ लड़णो सिखायो
आज हुया निरमोही केण
विधाता बैरी भयो !!

जद भी करी हठ, म्हाने मनायो
हेज अणूथो ही, म्हापे लुडायो
आज रूस्या यूँ, बोले नी बैण
विधाता बैरी भयो !!

झेल्या सभी दुःख, खुशी सब बाँटी
सोवाँ मैं सुख सूँ, बे जग रातां काटी
आज सूत्या यूँ, खोले नी नैण
विधाता बैरी भयो !!

रचणा जो थांरी है, थां में समाणी
इतरो निठुर है थूं , या मैं नी जाणी
बिण सांझ ढल्यां आयी रैण
विधाता बैरी भयो !!

जिण रे तल़े मिलती शीतळ छाया 
फूल्या-फ़ल्या मैं, खेल्या-खाया 
सूख्यो बो बट , लुटियो चैण
विधाता बैरी भयो !!


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