*अकबर की धार्मिक नीति* *प्रश्न: अकबर के धार्मिक विचारों की विवेचना करें।* अथवा *अकबर की सुलह- ए- कुल के विषय में आप क्या जानते हैं?* अथवा *अकबर की धार्मिक नीति का वर्णन करें* अथवा *दीन-ए-इलाही के संदर्भ में अकबर की धार्मिक नीति का परीक्षण करें।* अथवा *दीन-ए-इलाही अकबर की मूर्खता का प्रतीक था। उसकी बुद्धिमता का नहीं।"आलोचना करें।*

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*अकबर की धार्मिक नीति*
*प्रश्न: अकबर के धार्मिक विचारों की विवेचना करें।*
 अथवा
*अकबर की सुलह- ए- कुल के विषय में आप क्या जानते हैं?*
 अथवा
*अकबर की धार्मिक नीति का वर्णन करें*
 अथवा
*दीन-ए-इलाही के संदर्भ में अकबर की धार्मिक नीति का परीक्षण करें।*
अथवा
*दीन-ए-इलाही अकबर की मूर्खता का प्रतीक था। उसकी बुद्धिमता का नहीं।"आलोचना करें।*

*उत्तर-अकबर के धार्मिक विचार:* प्रारंभ से ही अकबर के विचार उदार, व्यापक और महान थे। कालांतर में विभिन्न धर्मों को मानने वाले विद्वान, संत, धर्मगुरू आदि के संपर्क में आने का अवसर उसे मिला; जैसे ---हिंदुओं के पुरुषोत्तम और देवी; जैन धर्म के हरिविजय सूरी, विजय सेन सूरी, भानु चंद्र उपाध्याय जिनचंद्र, पारसी धर्म के दस्तूर मेंहर जी राणा आदि; जिनका प्रभाव उसके ऊपर पड़ा और उसका दृष्टीकोन उदार होता गया।
 इनके अतिरिक्त सिक्ख गुरुओं में गुरु अमरदास,  गुरु अर्जुन देव, ईसाई पादरी फादर मान्सुरेट आदि से भी उनकी भेंट हुई थी। इस प्रकार, अकबर ने सभी धर्मों से अच्छी बातों को सीख कर और उसमें धार्मिक सहनशीलता बढ़ती गई। वास्तव में, अकबर प्रारंभ से ही धर्म के प्रति धर्मांध ना होकर जिज्ञासु था।
             *मालसन* के अनुसार, " आरंभ से ही अकबर का मस्तिष्क सच्चाई की खोज करने वाला तथा बाल की खाल निकालने वाला था। यह वह दिमाग था जो किसी भी धर्म को, उसमें बिना खोज किए, ग्रहण करने के लिए तैयार नहीं था।"
             *सुलह-ए -कुल और इबादत खान:* अकबर की धार्मिक नीति में क्रमिक विकास होता गया। धर्म के प्रति इस जिज्ञासा ने अकबर को अधिक प्रभावित किया और उसने 1575 इसमें फतेहपुर सीकरी में एक 'इबादतखाना' नामक भवन बनवाया,  जहां हिंदू ,इस्लाम, इस्लाम जैन पारसी ईसाई सूफी आदि विभिन्न धर्मों के विद्वानों को बुला कर उसके साथ धार्मिक गोष्ठियां में वह भाग लेता था। फलतः धर्मांधता में उसका विश्वास उठ गया और वह इस निर्णय पर पहुंचा कि सभी धर्मों के मूल सिद्धांत एक ही है और उन्हें ही सत्य माना जा सकता है । 1579 ईस्वी में इस्लाम धर्म के संबंध में उसने अपने को सर्वोच्च निर्णायक घोषित किया और इस प्रकार कट्टर 'उलेमाओं' के प्रभाव को घटाकर धार्मिक क्षेत्र में भी स्वयं मुसलमानों का नेता बन गया।
               उसका शासन इस्लामी कानूनों और हिदायतों की अनुसार नहीं चलता था, वर्ण 'सुलह -ए- कुल' का अर्थ होता है सभी के साथ शांति व्यवहार अर्थात सार्व लौकिक सहिष्णुता।
              *दीन-ए- इलाही:* 1582 इसवी में उसने 'दीन-ए-इलाही' नामक दिने धर्म का प्रतिपादन किया। इसमें प्रायः सभी धर्मों के सारतत्व लिए गए थे। इसमें बाह्य आडंबर एवं रीति-रिवाज नाम मात्र के थे। इसमें हृदय की पवित्रता और आचरण की शुद्धता पर विशेष जोर दिया जाता था। अबुल फजल को इस धर्म का पुजारी कहा जा सकता है। इस धर्म के अनुयायियों को अपना जीवन धर्म तथा अपनी संपत्ति, मर्यादा आदि सभी को सम्राट की सेवा में त्याग देने के लिए तैयार रहना पड़ता था। अकबर ने इस धर्म को बलपूर्वक किसी पर लादने की कोशिश नहीं की और ना इसका प्रचार ही किया। इस कारण इस धर्म के अनुयायियों की संख्या बहुत ही कम थी और राज दरबार के बड़े-बड़े सरदार तथा सरकारी अफसरों ने भी इसे नहीं अपनाया था। यही कारण है कि इस धर्म को कभी लोकप्रियता प्राप्त नहीं हुई और अकबर की मृत्यु के साथ ही इसका भी अंत हो गया।
 *विद्वानों के विचार*
*स्मिथ, हेग ,बदायूनी* जैसे विद्वानों ने दीन-ए-इलाही की कटु आलोचना की है।
डॉक्टर अमित के अनुसार,  "दीन-ए-इलाही" अकबर की बुद्धिमता का नहीं, वरन् मूर्खता का स्मारक था।" किंतु, वास्तव में इन आलोचनाओं में अतिश्योक्ति अधिक है। *लेनपूल के अनुसार,  "यह धार्मिक विचारधारा में एक प्रयोग मात्र था। यह हिंदू और मुसलमानों को एक कड़ी में बांधने वाली राजनीतिक आवश्यकता थी।"      
         इसी प्रकार कर्नल मलसन के अनुसार, "उसने दोनों जातियों (हिंदू और मुसलमानों की कटुआ स्मृति को भुला देने के लिए दीन-ए-इलाही धर्म की नींव डाली।")।
        अकबर वास्तव में राजनीतिक उद्देश्य के लिए धार्मिक एकता की स्थापना करना चाहता था।मौलवी-मुल्लओं के विरोध की परवाह न करते हुए उसने राजनीतिक और सांस्कृतिक एकता को ध्यान में रखकर इस धर्म को चलाने का प्रयास किया था।
         सभी मुस्लिम शासकों में अकबर की धार्मिक नीति सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। जिस धार्मिक सहिष्णुता और उदारता का परिचय उसने दिया वैसा दृष्टीकोण न  केवल भारत में अपितु तत्कालीन यूरोप के किसी भी शासक ने भी नहीं अपनाया था। उसके इस उदार दृष्टिकोण एवं नीति के लिए अनेक कारण उत्तरदायी समझे जाते हैं ---------

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*1.* *पैतृक एवं वातावरण का प्रभाव:* बचपन से ही अकबर पर उदार वातावरण एवं परिस्थिति का प्रभाव पड़ा था। पैतृक दृष्टिकोण से कहा जा सकता है कि उसका दादा बाबर सुन्नी मुसलमान होते हुए भी उदार था;  उसका पिता हुमायूँ,  सुन्नी होते हुए भी धर्मांन्ध ना था। उसकी माता हमीदा बानू शिया थी और अत्यंत उदार तथा सहिष्णु विचारवाली थी। स्वभाविक था कि अकबर पर परिवार का प्रभाव पड़ता।

 *2.* *शिक्षक एवं संरक्षक का प्रभाव:* अकबर का संरक्षक बैरम खां शियाा होने पर भी काफ़ी उदार था। साथ ही उसे जो भी शिक्षक मिले, जैसे शेख बयाजिद, यूनीन खाँ एवं अब्दुल लतीफ, सभी उदार विचारधारा के थे।

 *3.* *सूफियों का प्रभाव:* अकबर पर सूफियों का भी प्रभाव पड़ा था। वह बचपन से ही सूफियों के संपर्क में आया था। बाद में शेख मुबारक और उसके दो पुत्रों अबुल फजल और फैजी का उस पर बड़ा प्रभाव पड़ा। दिल्ली में हुआ शेख ताजुद्दीन से भी काफी प्रभावित हुआ था।
 *4.* *राजपूतों के संपर्क का प्रभाव:* उसके ऊपर राजपूतों का भी विशेष प्रभाव पड़ा। राजपूत कन्याओं के साथ विवाह करने के कारण उन रानियों के विचारों का भी उस पर प्रभाव पड़ा। हिंदुओं के ऊपर से अधिक प्रतिबंध हटा दिए गए और उन्हें अनेक सुविधाएं दी गई।इन रानियों को भी हिंदू धर्म के अनुसार पूजा-अर्चना करने, त्योहार मनाने, दान पुण्य करने आदि की पूरी स्वतंत्रता थी।
 *मूल्यांकन:*
      अकबर ने धार्मिक सहिष्णुता की जिस नीति का अवलंबन और पालन किया था; वह भारत के मध्यकालीन इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। उसने सभी धर्मों के अनुयायियों को पूर्ण स्वतंत्रता दी। धर्म और राजनीति में अंतर करते हुए उसने सभी धर्मों के प्रति एक सहिष्णु और उदार नीति अपनाई। सरकारी नौकरियों में धर्म के आधार पर नहीं, योग्यता के आधार पर नियुक्ति की जाने लगी।
             अनेक लोगों की यह धारणा है कि अकबर इस्लाम धर्म की मान्यताओं को छोड़कर काफीर बन गया था। किंतु, ऐसी बात ना थी। अकबर सुन्नी मुसलमान ही बना रहा, इस्लाम धर्म के प्रति उसकी आस्था बनी रही। किंतु, उसमें धार्मिक कट्टरता नहीं थी और ना अपनी मान्यताओं को किसी पर थोप नहीं की उसने कोशिश की।
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