'गांधी-मार्ग' के गजधर का (न) जाना



आज सुबह उठते ही पता चला कि अनुपम मिश्र नहीं रहे. 2000 के आसपास के वर्षों में उनके संसर्ग में अपना माथा साफ़ हुआ था. बहरहाल, मित्र कवि-संपादक पीयूष दईया ने उनको याद करते हुए एक छोटा सा लेख लिखा है जो उनके काम और उनके मकाम को समझने में बहुत सहायक है. प्रणाम अनुपम जी- प्रभात रंजन 
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अभिधात्मक आंख से विचार करें तो अनुपम मिश्र की विशेषज्ञता का क्षेत्र पानी व पर्यावरण के काम व सन्दर्भों से जुड़ा है। हमारे समय में यह क्षेत्र खासा तकनीकी किस्म का माना जाता रहा है जबकि अनुपम जी की पार्श्वभूमि साहित्यिक रास्ते से आती है और शायद यही वजह रही कि उनका दीप्त गद्य-कर्म गहरी काव्यात्मक संवेदनशीलता और मानवीय ऊष्मा से स्पंदित था, जिसमें अभिव्यक्ति व सम्प्रेषण के दोनों छोर अद्भुत तरह से साधे गये हैं। अनुपम जी की अन्तिम पुस्तक ’’साफ़ माथे का समाज’’ भी इसका अपवाद नहीं है। विज्ञान के एक खांटी तकनीकी विषय को इतने पठनीय व आम बोलचाल के गद्य में ढाल कर प्रस्तुत करना अपने में एक नयी ज़मीन तोड़ना है। अपनी पिछली पुस्तकों में जहां वे पारम्परिक विद्याप्रणालियों की प्राणप्रतिष्ठा करते रहे वहीं खड़ीबोली के संसार में उनके गद्य की भाषा एक ऐसे नवोन्मेष प्रतिमान व प्रस्थान का संकेत देती है कि इस विलक्षण गद्य को अनुपम-क़लम की संज्ञा दी जा सकती है। मुझे लगता है कि पारिस्थितिकी जैसे तकनीकी विषय को समझने व बरतने की अनुपम-पद्धति एक बृहत्तर सांस्कृतिक प्रक्रिया व परम्परा से जिस तरह संचालित होती है उसमें गहरी भारतीय विवेक-चेतना सक्रिय है जिसकी अन्तर्योजना व कर्मभूमि पर समाज, संस्कृति, इतिहास, परम्परा अलग अलग खण्डों के बाड़ों में सीमित नहीं है बल्कि स्वयं समग्रतः जीवन से सांझी-संगत की परस्पर संवादरत स्थिति के बतौर है। ’’साफ़ माथे का समाज’’ भी इसका जीवन्त व तर्कसम्मत साक्ष्य है जिसमें पिछले बीस-पच्चीस वर्षों में यहां-वहां लिखे-बोले गये उनके लेखों का एक चयन किया गया है। दूसरे शब्दों में, वे गांधीविद्या के ऐसे विनयशील कार्यकर्ता थे जो एक समकालीन गजधर (यह राजस्थानी भाषा का अनूठा शब्द है। यह परम्परा उन सिद्धहस्त लोगों के लिए व्यवहृत होती रही है जो वहां के समाज में डिजाइनर , इंजीनियर से लेकर आर्टीटेक्ट तक की भूमिका एक साथ निभाते हैं।) की बहुलभूमिका में रहा।
बहरहाल , हमारे समय में अब ऐसे साक्ष्य लगभग विरल है जहां शब्द और कर्म के बीच फांक नहीं बल्कि अभेद है। अनुपम मिश्र की किताबें इस सन्दर्भ में सबूत के बतौर रखी जा सकती हैं जिन्होंने व्यापक पैमाने पर समाज व सरकार को इस तरह झिंझोड़ा है कि उनमें विवक्षित विद्याप्रणालियों को अब बाकायदा अपनाया भी जा रहा है। यह अपने स्वधर्म की ऐसी पहचान है जो उत्तरपूंजीवादी दौर की अंध वैश्वीकरण-प्रक्रिया को एक सार्थक प्रतिरोध देती है और उस स्वावलम्बी कुतुबनुमा का संकेत भी जिसके आलोक में गांधी-मार्ग है। अनुपम मिश्र का नाम दरअसल पर्यावरण-प्रबन्धन के क्षेत्र में लोक-समाजों में व्याप्त प्राचीन प्रविधियों व स्वदेशी तकनीकी प्रणालियों को पुनर्नवा करने व इसके प्रति जागरुकता का प्रसार करने के अवदान तक ही प्रतिश्रुत नहीं है बल्कि उनका काम तो प्रकारान्तर से एक सकल जीवन-दर्शन के धागों से बुना है जिसे हम भारतीयता का सर्जनात्मक पुरुषार्थ कह सकते हैं। 
अनुपम जी के साथ पीयूष दईया और मैं सन 2000 में

अभी हाथ में उन की पुस्तक--साफ माथे का समाज--है। पुस्तक में संग्रहित लेखों तथा युवा अध्येता योगिता शुक्ला के साथ साठ पृष्ठों में फैले अपने लम्बे वार्तालाप में प्रकारान्तर से अनुपम जी विभिन्न उदाहरणों के माध्यम से जिन चिन्ताओं व सरोकारों को विस्तार से समझाते हैं उसके केन्द्र में यह आत्म-बोध लगातार सक्रिय है कि एक देश व समाज अपने विवेक, ज्ञान और जड़ों को खारिज या विस्मृत करके कभी खिल नहीं सकता। वे यह ठीक ही विश्लेषित करते हैं कि पिछले दो सौ सालों से विचार का केन्द्र अंग्रेजी या पश्चिम बिना सोचे-विचारे इस तरह मान लिया गया है कि जो उनकी बहस है वही हमारी है। यहां ’’बहस’’ से अनुपम जी का आशय पश्चिम की दृष्टि से लेकर उनके वातावरण , सांस्कृतिक भिन्नताएं , स्थितियां और भूगोल तक से है। फिर वे उस औपनिवेशिक/उत्तर साम्राज्यवाद की अवधारणाओं व उसकी सर्वग्रासी व्याप्ति की छानबीन करते हुए यह ध्यान दिलाते हैं कि भारत में कैसे इन दो सौ बरसों में चीजों को नष्ट कर दिया गया है। फिर चाहे मसला आधुनिकीकरण की महायोजना में ’’ विकास’’ के ढांचों का हो या आयातित’’ सामाजिक वानिकी ’’ या स्वयं को श्रेष्ठ समझते हुए उन्हें ’’प्रशिक्षण’’ या ’’साक्षरता ’’ देने का जिन्हें हाशिए के लोग कहा जाता है। अनुपम मिश्र का यह आग्रह सचमुच एक ज़मीनी बात है कि समाज से जो काम गायब हो गया है उसे फिर से समाज को उसकी पूरी प्रतिष्ठा व सम्मान के साथ लौटाना होगा--मालिक के अंहग्रस्त भाव से नहीं बल्कि एक विनम्र सेवक की भांति। अपने लेखन में एकाधिक जगह इस भूमिका को अनुपम जी ने अपने चारित्रिक लहज़े में ’’ मुंशीगिरी’’ के रूप में व्यवहृत किया है। वे यह मानते हैं कि ’’ इन सब विषयों में अगर सबसे बड़े विशेषज्ञ हैं तो वे समाज के लोग है। दूसरे विशेषज्ञों की जरूरत नहीं पड़ती समाज को। वो अपना काम खुद करना जानता है अपने इलाकें में। पानी में भी ऐसा ही है। ’’ अनुपम जी से सारी सहमति के बीचोंबीच यह मार्मिक सवाल अपनी जगह मुंह बाए खड़ा है कि आखिर समाज के अपने ये विशेषज्ञ जैसे गजधर अब कहां है ? किस हाल में या योगिता के शब्दों में ’’ इन्हें सारे विमर्श में विशेषज्ञों के बतौर शामिल क्यों नहीं किया जा रहा ?’’ हम यह अनदेखा नहीं कर सकते कि अनुपम मिश्र एक सामाजिक कार्यकत्र्ता भी है और उन्होंने ही गजधर जैसी परम्पराओं की ओर अलख जगाने का काम किया है। मगर दुर्भाग्य से--और यह सिर्फ संयोग नहीं हो सकता--कि अनुपम जी की पुस्तकों के अलावा गजधरों के महत्व पर बहुत कम काम किया गया है। ’’साफ़ माथे का समाज’’ सहित अनुपम जी की अब प्रसिद्ध पुस्तकें अनुपम जी के अब तक के कामों को सुन्दर तरह से खोलती-बखानती है स्वयं इन गजधरों का ही जमीनी लेखाजोखा भी लेती रही है। हम जानते हैं कि सरकार से लेकर स्वयंसेवी संस्थाओं तक के अरबों-खरबों रूपयों के बावजूद देशज परम्पराओं के वे सारे विशेषज्ञ जो मुख्यधारा में पुनर्स्थापन की सम्भावनाओं से वंचित है के जीवन-संसार और उनके सरोकारों व समस्याओं से लेकर उनके अस्तित्व और उनकी अपनी आवाज़ पर एकाग्र प्रयत्नों का दृश्य पर एक तरह से अभाव-सा है। इस सन्दर्भ में स्वयं अनुपम जी अपनी बुनियादी प्रतिश्रुतियों के मद्देनजर ऐसे प्रयास करते रहे, जिनके माध्यम से समाज, संसार व सरकार तक ये विरल प्राणी न केवल अपने जीवन-मुद्दों को सम्बोधित व सम्प्रेषित कर सके बल्कि उनके संग अन्तःक्रिया व साझे की स्थिति में भी आ सके। कहना न होगा कि अनुपम जी की पुस्तकें अपने पिछले कामों से आगे भी ले जाती रहीं, और ठहरे हुए समाज को गतिशील करने का यत्न भी करती रहीं। उन का जाना सचमुच पूरी पृथ्वी के लिए एक अपूरणीय क्षति है। 


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