बोर्खेज़ की कहानी 'बेबीलोन की लॉटरी'


आजकल महान अर्जेंटीनी लेखक बोर्खेज़ की कहानी बेबीलोन की लॉटरी' की बहुत याद आ रही है. किस तरह से लॉटरी के खेल में पूरा देश उलझ जाता है. शिल्प के स्टार पर इस मुश्किल कहानी का अनुवाद किया है लेखिका दिव्या विजय ने- मॉडरेटर 
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बेबीलोन के सभी लोगों की तरह मैं भी एक अधिकारीथा अर्थात एक ग़ुलाम. मैंने देखा था शक्तिमत्ता, तिरस्कार और कारावास. देखो मेरे दाँये हाथ को..यह बिना तर्जनी का है. और देखो यहाँ... मेरे  लबादे के इस छेद से तुम देखसकते हो मेरे पेट पर गुदा लाल गोदना-- यह हिब्रू का दूसरा वर्ण बेथ है. पूर्णिमा की रातों में यह चिह्न मुझे उन लोगों पर वर्चस्व प्रदान करता है जिन पर गीमेल (हिब्रू का तीसरा अक्षर) गुदा है परन्तु यह मुझे अले चिह्न (हिब्रू का पहला अक्षर) वालों के अधीन कर देता है, वे जो अमावस्या पर गीमेल गुदे लोगों के आज्ञाकारी होने के लिए बाध्य होते हैं. भोर के मद्धिम उजाले में, एक तहख़ाने में बलिवेदी के ठीक सामने खड़ा मैं पवित्र साँडों के गले काटता हूँ. एक बार, पूरे चंद्र वर्ष के लिए मैं गुमशुदा घोषित कर दिया गया था-- जैसे कि मैं रोऊँ तो भी कोई मुझ पर ध्यान दे, मैं रोटी चुराऊँ और तब भी मेरा सिर कटे. मैं वो जानता हूँ जो यूनानी नहीं जानते -- अनिश्चितता. एक पीतल कक्ष में जब मैंने हत्यारे के मौन गुलूबंद का सामना किया तब भी आनंद ने मेरा त्याग नहीं किया, आह्लाद की नदी के बीच दहशत मुझे हरा नहीं पाई.  हेराक्लाइडस पॉंटीकस ने सराहना करते हुए सूचना दी कि पाइथागोरस को स्मरण हो आया है कि वह पहले  पिरहस  और उससे पहले यूफ़ोरबसऔर उससे भी पूर्व कोई और नाशवान व्यक्ति रहा है. उसके सदृश परिवर्तनों को याद करने के लिए मुझे मृत्यु अथवा उसके पाखण्ड की आवश्यकता नहीं थी.

 मैं  उस राक्षसी और भद्दी  संस्था--लॉटरी कादेनदार हूँ जोकि अन्य देशों के लिये या तो अज्ञात है या अविकसित रूप में काम करती है या फिर गुप्त रूप से. मैं इस संस्था के इतिहास में गहराई से नहीं गया. मैं जानता हूँ मनीषी सहमत नहीं हो सकेंगे परन्तु ज्योतिष में कोई अशिक्षित व्यक्ति जितनी जानकारी चाँद के बारे में रखता होगा उतना ही ज्ञान मुझे इस संस्था के महान उद्देश्यों के बारे में है.  इस दिन तक मेरा वतन एक घनचक्कर रहा जिसमें लॉटरी वास्तविकता का एक बड़ा तत्त्व है. मेरा विचार इस बारे में इतना ही अल्प है जितना अज्ञेय परमेश्वर के अथवा मेरे हृदय के व्यवहार बारे में. अब, बेबीलोन और इसकी प्यारी मान्यताओं से दूर, मैं ताज्जुब से लॉटरी और ईशनिंदा की अटकलों  के बारे में सोचता हूँ जो सुबह-साँझ के झुटपुटे के दौरान लोग परदे में फुसफुसाते थे.
मेरे पिता बताते कि कैसे बहुत समय पहले(वर्षों? शताब्दियों?)--लॉटरी बेबीलोन में आम आदमी द्वारा खेली जाती थी. वे बताते (हालाँकि यह सच है या नहीं, मैं नहीं कह सकता) कि कैसे हज्जाम लोगों से ताम्र सिक्के लेते और उनके बदले चिह्नों से सजे-सजाये हड्डियों के या चमड़े के आयताकार पत्र देते थे. फिर दिन-दहाड़े एक ड्रॉ निकाला जाता और जिन पर किस्मत मेहरबान होती वे बिना किसी अतिरिक्त पुष्टीकरण के चांदी से मढ़े सिक्के जीत जाते.पर जैसा कि आप देख सकते हैं कि यह पूरी प्रक्रिया बिल्कुल ही आरंभिक काल में थी.

देखा जाये तो ये तथाकथित लॉटरियाँ एक विफलता ही थीं क्योंकि इनमें नैतिकता जैसा कुछ भी नहीं था. ये  लोगों की आंतरिक शक्ति को नहीं अपितु उनकी नाउम्मीदी को ही आकर्षित करती थीं. जनता का इससे दूरी बनाने का मतलब था कि इन बिकाऊ लॉटरियों को शुरू करने वाले व्यापारियों के नुकसान का शुरू होना. फिरकिसी ने कुछ नया आज़माया: सौभाग्यशाली विजेताओं की सूची के साथ-साथ दुर्भाग्यशाली लोगों के नम्बर भी सम्मिलित किया जाना.इस नये परिवर्तन के अनुसार आयताकार लॉटरियों के ख़रीददारों के पास दो बराबर मौक़े थे: वे कुछ रक़म जीत भी सकते थे या फिर उन्हें जुर्माना अदा करना पड़ सकता था- कभी-कभी तो जुर्माने के रूप में बड़ी राशि की अदायगी करनी होती थी. ऐसे स्यात् संभावित, छोटे जोख़िम (तीस ख़ुशकिस्मत नम्बरों में से एक ही बदकिस्मत होता था) ने लोगों में कुतूहल पैदा किया. बेबीलोनवासी टिकट ख़रीदने के लिए  झुण्ड में टूट पड़े. जो टिकटनहीं ख़रीदता उसे पिद्दीदिल और कायरमाना जाता जिसमें जोखिम उठाने का माद्दा ही नहीं होता. कुछ ही समय में इस न्यायसंगत तिरस्कार ने दूसरा शिकार भी ढूँढ़ लिया: अब सिर्फ़ लॉटरी खेलनेवाले लोगों को ही नहीं बल्कि हारने तथा जुर्माना भरने वालों को भी यही माना जाने लगा. कम्पनी (अब इसे इसी नाम से जाना जाने लगा) को विजेताओं की रुचि बनाये रखने और उन्हें उनका जीता हुआ इनाम देने के लिए जुर्माना अदायगी से होने वाली आय को सुनिश्चित करना ही था. हारने वालों के ख़िलाफ़ एक मुकद्दमा दायर किया गया: न्यायाधीश ने सिर्फ़जुर्माना अदा करने का बल्कि साथ ही अदालती ख़र्चे का जिम्मा उठाने या फिर कुछ दिन जेल में बिताने का फ़ैसला सुनाया. कम्पनी की ख़िलाफ़त के लिए उन लोगों ने जेल जाने का चयन किया. कुछ लोगों को मिली इस सज़ा ने तो जैसे कम्पनी की शक्ति--चर्चसंबंधी, सैद्धांतिक ताक़त में बहार ला दी.
इसके कुछ वक़्त बाद तो ड्रॉ की घोषणा में हारे हुए नंबरों के लिए जुर्माने के सूची के स्थान पर हारने पर निर्धारित कारावास के दिनों की संख्या ही टिकट के पीछे छापी जाने लगी. यह छोटी-सी बात जो कि तब संज्ञानमें नहीं ली गयी सबसे महत्त्वपूर्ण थी क्योंकि यहीं से लॉटरी में अनार्थिक तत्त्व का प्रवेश हुआ. लॉटरी खेलने वाले खिलाड़ियों द्वारा कम्पनी पर ज़्यादा से ज़्यादा हारने वाले ड्रॉ निकालने का दबाव बनाया गया.
जैसा कि सब जानते हैं, बेबीलोन के निवासी तर्क और साम्यरूपता के प्रशंसक होते हैं. यह काफ़ी असंगत था कि जीतने वालों को चाँदी के गोल सिक्के मिलें और हारने वालों की बदकिस्मती जेल में बिताये जाने वाले दिनों और रातों में मापी जाये.
कुछ नैतिकवादियों ने तर्क प्रस्तुत किया कि सिक्कों का संग्रहण ही हमेशा ख़ुशी लाने वाला नहीं होता है बल्कि शायद ख़ुशियों के अन्य रूप ज़्यादा प्रभावी होते हैं. शहर में आस-पास के निम्नवर्गीय लोगों ने एक अलग ही राग छेड़ दिया. पादरी-वर्ग के सदस्यों द्वारा बहुत ज़्यादा जुआ खेला जाता था, सो उन्होंने भय और आशा के इस भाग्यचक्र का ख़ूब आनंद लिया. जबकि ग़रीब (जिनकी वाजिब ईर्ष्या समझी जा सकती है) ख़ुद को इस विख्यात आनंददायक, विषयासक्त चक्र से दूर पा रहा था. अमीर-ग़रीब, नर-नारी सभी को लॉटरी में बराबरी का मौक़ा मिलने की इस औचित्यपूर्ण और तर्कसंगत कामना ने एक रोषपूर्ण प्रदर्शन के लिए प्रेरित किया--जिसकी याद समय भी धूमिल नहीं कर पाया. कुछ हठधर्मी लोग नहीं समझ सके (या समझने का दिखावा करते रहे) कि यह नये दौर की शुरूआत थी, इतिहास की ज़रूरी स्थिति.. एक ग़ुलाम ने एक रक्तिम टिकट चुरा ली, उस टिकट के ड्रॉ अनुसारटिकटधारककीजीभजलादेनेकानिर्धारणथा. विधि-संहिता में भी इस अपराध के लिए यही विधान था. कुछ देशवासियों ने तर्क किया कि ग़ुलाम चोर होने के नाते जलती सलाखों का अधिकारी था जबकि अन्य विशालमना चाहते थे कि जल्लाद को उसका वध  कर देनाचाहिएक्योंकियहीभाग्यनेनिर्धारितकियाथा. चहुँओरव्यवधानथा,  दुःखपूर्ण लहूलुहान दृष्टांत थे पर आख़िरकार बेबीलोन की जनता ने विपक्ष के ऊपर अपनी इच्छा थोप ही दी तथा अपने उदार लक्ष्यों को पूरी तरह से पा लिया. पहला तो कंपनी पर जन-शक्ति को मानने का दबाव पड़ा. (नयी कार्य-प्रणाली की व्यापकता और जटिलता के लिए यह एकीकरण आवश्यक था.) दूसरा, अब लॉटरी को गुप्त, नि:शुल्क तथा सभी के लिए कर दिया गया. लॉटरियों की धन-लोलुप बिक्री समाप्त कर दी गयी. एक बार दैव के रहस्य शुरू होने पर हर स्वतंत्र व्यक्ति स्वयमेव इन पवित्र लॉटरियों में शामिल होता था जो कि हर छठी रात परमेश्वर की भूल-भुलैया में आयोजित होती थीं और हर व्यक्ति का भाग्य अगली लॉटरी तक निर्धारित कर देती थीं. नतीजे तो गणनातीत थे.

एक भाग्यशाली ड्रॉ फलस्वरूप कोईव्यक्ति ‘कौंसिल ऑफ़ मागी’ में ऊँचा स्थान प्राप्त कर लेता अथवा उसके दुश्मन के लिए कारावास (सभी की प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष जानकारी में), या उसे अपने कक्ष के मन्द उजाले में वह स्त्री नसीब होती जो उस से अठखेलियाँ करे अथवा वह स्त्री जिसे फिर देख पाने की उम्मीद उसने छोड़ दी हो. और एक बदकिस्मत ड्रॉ लाता था: अंगभंग, कई तरह के तिरस्कार, यहाँ तक कि मृत्यु भी. कभी-कभी कोई एक वारदात..जैसे मैखाने में किसी का क़त्ल अथवाकिसीकारहस्यमयीदैवीकरण..तीस-चालीस ड्रॉ का प्रेरित परिणाम होती. दाँवों को संघटित करना मुश्किल था पर हमें याद रखना चाहिए कि कंपनी के लोग पहले भी (और अब भी) काफी शक्तिशाली और चालाक थे. कई मामलों में, एक साधारण-सी जानकारी कि ख़ुशनुमा दाँव मात्र अच्छे भाग्य के फलस्वरूप हैं, उन परिणामों की प्रचंडता कम कर देती.इससमस्याकोरोकनेकेलिएकंपनीनेपरामर्शमाँगेऔरयहाँतककिजादू-टोने भी करवाये. जो भी रास्ते उन्होंने इख़्तियार किये, जो षड्यंत्र उन्होंने बुने, वे सर्वदा गुप्त थे.

हर एक के अंतरतम डरों और  उम्मीदोंका पता लगाने के लिए उन्होंने नजूमियों और जासूसों का सहारा लिया. वहाँ कुछ पत्थर के सिंह थे,काफ़्कानामकएकपवित्रशौचालय था और धूल से अटी नहर में कुछ दरारें थीं. एकआमधारणाथीकियेस्थानकंपनीतकपहुँचनेकेरास्तेथे. शुभ-अशुभ इच्छाओं से ओत-प्रोत व्यक्ति गोपनीय रिपोर्ट्स उनमें जमा कराते. परिवर्ती सच्चाइयोंकीवेसभीफ़ाइलेंवर्ण-क्रम से रखी जाती थीं.

अविश्वसनीय रूप से वहाँपक्षपातऔरभ्रष्टाचारकीबातेंआरम्भ हो गयीं थीं. और जैसा कि होता ही था, कंपनी ने सीधे तौर पर कोई जवाब नहीं दिया बल्कि अपना संक्षिप्त और अस्पष्टजवाबएकमुखौटोंकेकारखानेकीरोड़ियोंपरलिखदिया. यहप्रतिवादिकाअबपवित्रधर्म-ग्रंथों में शुमार है. यह  एक सिद्धांत प्रतिपादित करती हैकिलॉटरीतोब्रह्मांडकेक्रममेंमौक़ोंकाएकअंश-भर है और भूलों का स्वीकार इन मौकों को मजबूत करता है,कोईक़ानूनउल्लंघन नहीं करता. हालाँकि सिंह,पवित्र शौचालय आदिकंपनी द्वारा अस्वीकारनहींकिये गए थे(जिनमें उनसे परामर्श लेने का अधिकार भी आरक्षित था) परन्तु वहाँ हो रहे काम की कोई आधिकारिकगारंटीनहींथी.


इस वक्तव्य ने लोगों को चुप तो करा दिया पर इससे कुछ अन्य ही प्रभाव पैदा हो गये जो लेखक के लिए भी अनजाने थे. इसने चतुराई से कंपनी की विचारधारा और कार्यों में फेर-बदल कर दिया. मेरे पास कम ही वक़्त है क्योंकि अभी बताया गया है कि जहाज़ चलने वाला है पर मैं फिर भी बताने की कोशिश करूँगा.

कितना भी अविश्वसनीय लगे पर उस समय तक किसी ने भी लॉटरी का सरल सिद्धांत रखने का प्रयास नहीं किया था. बेबीलोन के लोग चिंतनशील नहीं हैं. वे केवल भाग्य के आदेशों का पालन करते हैं तथा अपनी ज़िन्दगी, अपनी उम्मीदें, अपनी अनाम दहशत इसी के नाम समर्पित कर देते हैं.  उन्हें कभी नहीं लगा कि उन्हें इन जटिल क़ानूनों और इस से पैदा होने वाले स्थितियों और इन को स्पष्ट करने वाली गतिविधियों पर गहन शोध करना चाहिए.  ख़ैर, उस अर्द्ध-आधिकारिक वक्तव्य ने, जो मैंने बताया  कई क़ानूनी और गणितीय स्वभाव की बहसों को जन्म दे दिया. वहाँ से एक अनुमान उभरा: यदि लॉटरी बस अवसरों की एक तीव्रता भर है, कालांश में नक्षत्रों के अंतः प्रवाह का उपद्रव है तब क्या यह उपयुक्त नहीं कि अवसरों की दख़लंदाज़ी ड्रॉ के मात्र एक नहीं अपितु हर पहलू में हो ?  क्यायह बेतुका नहीं है कि एक व्यक्ति की मौत अवसराधीन है, इस दौरान मौत की परिस्थितियाँ--निजी हों या सार्वजनिक, चाहे एक घंटे तक खींची जायें या शताब्दी तक--अवसराधीन नहीं होनी चाहियें? आख़िरकार उन पूर्णतया तार्किक आपत्तियों से तुरंत भारी बदलाव आ गए. व्यवस्था की नई जटिलतायें (जो आगे शताब्दियों के व्यवहार में और भी जटिल होती गयीं ) कुछ दक्ष लोगों को ही समझ आती हैं, तथापि मैं उन्हें समझाने की कोशिश करूँगा चाहे प्रतीकात्मक रूप से ही सही.

उदाहरणतः पहला ड्रॉ एक व्यक्ति की मौत निर्धारित करता है.  उस निर्णय का पालन करने के दौरान दूसरा ड्रॉ आयोजित किया जाता है. दूसरे ड्रॉ में नौ संभावित निर्वाहकों का नाम आता है. उन नौ में से चार चाहें तो वधिक का नाम निर्धारित करने के लिए तीसरा ड्रॉ शुरू कर सकते हैं, उनमें से दो  दुर्भाग्यशाली ड्रॉ को सौभाग्यशाली ड्रॉ से बदल सकते हैं.( उदाहरण के लिए खोज में मिला ख़ज़ाना ), एक अन्य फ़ैसला कर सकता है कि मृत्यु को कितना तीक्ष्ण किया जा सकता है ( जैसे तिरस्कारपूर्ण मृत्यु या अत्याचार की मात्रा को बढ़ाना) अन्य चाहें तो सीधे-सीधे आदेश की अवहेलना कर सकते हैं. प्रतीकात्मक रूप से यही लॉटरी की योजना है. असल में ड्रॉ की संख्या अनंत हैदरअसल कोई भी फ़ैसला अंतिम नहीं है, हर फैसला कई शाखों में तक़सीम होता है. अनभिज्ञ लोगों को लग सकता है कि अनंत ड्रॉ के लिए अनंत समय चाहिए होगा पर वास्तव में समय का भी अनंत विभाजन किया जा सकता है, जैसा कि प्रसिद्ध कछुआ दौड़ की नीति-कथा में होता है. लाटरी के इन अनंत टेढ़े संयोगों की संख्या का साम्य प्लेटोवादियों के प्रेम की स्वर्गिकता और आदर्शात्मकता के साथ ठीक बैठता है.

प्रतीत होता है कि हमारी मान्यताओं की कुछ विरूपित अनुगूँज टिबेर पहुँच गयी थी. एलियस लैंप्रिडियस 'एंटीनोनस हेलीओगाबालस' की जीवनी में बताता है सम्राट डिनर पर आने वाले मेहमानों का मनचाहा भाग्य सीपियों पर लिख कर रखता था--कुछ को दस पाउंड सोना मिलता, कुछ को दस घरेलू मक्खियाँ, किसी को दस डोरमाउस और किसी को दस भालू मिलते. यहाँ यह याद दिलाना उचित है कि हेलीओगाबालस उसके नामस्रोतीय भगवान के पुजारियों के मध्य माइनर एशिया में पला-बढ़ा था.

कुछ अस्पष्ट उद्देश्य वाले निर्वैयक्तिक ड्रॉ भी निकाले जाते थे. एक ड्रॉ का आदेश था कि एक नीलमणि ताप्रोबना से यूफ्रेत्ज़ के पानी में फेंकी जाये, एक अन्य के मुताबिक़ एक ख़ास टावर की छत से पक्षी को मुक्त किया जाये. एक और के अनुसार हर सौंवें वर्ष एक रेत कण एक तट विशेष के असंख्य कणों में जोड़ा जाये (और लिया जाये). कभी तो नतीजे बहुत ही भयंकर होते.

कंपनी के उदार प्रभाव के तहत, हमारी मान्यतायें भाग्य से गहरी जुड़ गयी हैं. कोई हैरत नहीं यदि कोई ख़रीदार डैमासीन वाइन के दर्ज़न भर जार ख़रीदे तो उनमें से एक में मायाजाल या  वाइपर साँप भरे हों. एक लिपिक जो एक भूलरहित संविदा लिखना जानता हो. मैं ख़ुद जल्दबाज़ी में कही गयी बात में कुछ भव्य,  कुछ नृशंस और कुछ रहस्यात्मक ग़लतबयानी कर चुका हूँ. हमारे ग्रह के अति कुशाग्र इतिहासकारों ने अवसर को सुधारने का एक तरीक़ा खोज निकाला. यह सर्वविदित है कि इस पद्धति से प्राप्त परिणाम (साधारणतः) भरोसे लायक हैं- यद्यपि वे बिना छल-कपट को मापे नहीं खोले जाते. इसके अलावा और कोई भी कल्पना कंपनी के इतिहास जितनी दूषित नहीं हो सकती. किसी मंदिर विशेष से खोद  निकाला गया एक पुराकालीन दस्तावेज़  कल निकाली गयी लाटरी का हिस्सा भी हो सकता है अथवा शताबदियों पहले की लाटरी का हिस्सा भी. किसी भी पुस्तक का कोई भी निर्विवाद संस्करण अभी तक नहीं छपा है. पुस्तक में तथ्यों को भूलने, जोड़ने, कतर-ब्योंत करने के लिए लिपिक एक गुप्त शपथ लेते हैं. अप्रत्यक्ष असत्य भी अभ्यास में देखे गये.
 भगवान की-सी नम्रता ओढ़ कर कंपनी हर तरीके के प्रचार से ख़ुद को दूर रखती है. इसके कार्यकर्त्ता स्पष्टतया गुप्त हैं, इसके द्वारा लगातार दिए गए हुकुम ढोंगियों द्वारा अंधाधुंध फैलाई बातों से अलग नहीं हैं. वैसे- पूर्णरूपेण पाखंडी होने की शेख़ी कौन मारेगा? एकनशे में धुत्त आदमी जो तपाक से निरर्थक आदेशों को बड़बड़ाता है, एक सोया हुआ आदमी अचानक ही नींद से उठ कर साथ सोई औरत को गला घोंट कर मार देता है- क्या वे कंपनी के ख़ुफ़िया आदेशों का क्रियान्वयन नहीं कर रहे?

परमात्मा समान यह मौन कार्यप्रणाली क़िस्म-क़िस्म की अटकलों को प्रेरित करता है. एक अपमानजनक ढंग से कहता है कि कंपनी के अस्तित्त्व पर तो सैंकड़ों साल पहले ही विराम लग गयाऔर हमारे जीवन का यह पावन क्रमभंग विशुद्ध आनुवंशिकता है, पारंपरिक है. एक अन्य का विश्वास है कि कंपनी तो शाश्वत है और अंतिम परमेश्वर द्वारा पृथ्वी के सर्वनाश की अंतिम रात तक टिकी रहेगी. यहाँ तक कि एक तो घोषित करता है कि कंपनी सर्वशक्तिमान है लेकिन क्षुद्र चीज़ों को ही प्रभावित कर पाती है: एक पक्षी का आर्त्तनाद, मंडूर और धूल के रंग, सुबह-सवेरे के वे आधे सपने. एक दूसरा धर्माधिकारी का मुखौटा पहन फुसफुसाता है कि कंपनी तो कभी थी और ही होगी. कोई और घृणा योग्य तर्क देता है कि किसी के द्वारा रहस्यात्मक कंपनी की सच्चाई को नकारने या स्वीकारने से क्या फ़र्क़ पड़ता है क्योंकि बेबीलोन अवसरों के अनंत खेल के सिवाय है ही क्या! 







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