शंख घोष की प्रतिनिधि कविताएँ
शंख घोष को ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला तो हम ने उत्पल बैनर्जी साहब से उनकी कविताओं के लिए अनुरोध किया. उत्पल जी को आभार के साथ शंख घोष की कवितायें उत्पल बैनर्जी के सुन्दर अनुवाद में उन्हीने के नोट के साथ- मॉडरेटर
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शंख घोष समकालीन बंगला कविता में एक श्रेष्ठ नाम हैं, इसके साथ ही वे अप्रतिम गद्यकार और आलोचक भी हैं. बंगला साहित्य में अमूमन रचनात्मक लेखक और कवि ही आलोचक होता है. 60 से अधिक पुस्तकों के रचयिता शंख घोष अपनी अनूठी बिम्ब योजना, काल सापेक्ष कथ्य और कविता की अपनी विशिष्ठ बनक के लिए अपार लोकप्रियता अर्जित कर चुके हैं. वे जीवन भर विभिन्न शिक्षा प्रतिष्ठानों में अध्यापन करते रहे. 1992 में आप जादबपुर विश्वविद्यालय से सेवामुक्त होकर सम्प्रति पूर्णकालिक लेखक के रूप में कार्य कर रहे हैं. 1960 में आप अमेरिका के आयोवा में आयोजित लेखकों की कार्यशाला में शामिल हुए थे. आपने दिल्ली विश्वविद्यालय, विश्वभारती विश्वविद्यालय और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस स्टडीज, शिमला में भी अध्यापन किया है. आपको नरसिंहदास पुरस्कार, साहित्य अकादमी पुरस्कार, रवींद्र पुरस्कार, सरस्वती सम्मान, साहित्य अकादमी का अनुवाद का पुरस्कार प्राप्त हो चुका है. 2016 का ज्ञानपीठ पुरस्कार से आपको विभूषित किया गया है. 2011 में आपको भारत सरकार ने पद्म भूषण से नवाज़ा था. `आदिम लता गुल्ममय ', `एक मूर्ख, जो सामाजिक नहीं', `कवि का अभिप्राय', `बाबर की प्रार्थना' आदि आपकी अत्यंत लोकप्रिय रचनाएँ हैं. यहाँ कुछ कविताओं के हिंदी अनुवाद प्रस्तुत हैं.
-- उत्पल बैनर्जी
1.
आकांक्षा कातूफ़ान
इसगहन निस्पंद निर्जनतामें
अँधेरीसाँझ की अजस्रनिःसंग हवा में
तुमउठाओ --
बादलकी तरह शीतल, चाँद की तरहविवर्ण
अपनासफ़ेद ज़र्द चेहरा
विराटआकाश की ओर!
दूरदेश में काँपउठा हूँ मैं
आकांक्षाके असह्य आक्षेपसे --
तुम्हारेचेहरे के सफ़ेदपत्थर को घेरकाँप रहे हैं
आर्तनाद, प्रार्थना की अजस्रउँगलियों की तरहक्षीण
घुँघरालेबाल
अँधेरीहवा में!
बादलोंके आकाश में
कोईपुंज भारी होउठा है
औरउसके बीच
इच्छाकी विद्युल्लता तेज़ीसे झलक जातीहै बारम्बार
प्रचंडवेग से फटपड़ना चाहती है
प्रेमकी अशांत लहर
अस्थिरकर देता हैअंधकार का निस्सीमव्यवधान
मग्नथिर मिट्टी कीसघन कांति।
तुमथामे रहो --
बादलों-सा शीतल, चाँद-जैसा विवर्णअपना चेहरा
रो-रोकर क्लान्तमूल मिट्टी कीलहर-जैसे स्तन
प्रार्थनामें अवसन्न व्याकुलजीर्ण
दीर्घप्रत्याशा का हाथ
उसीविक्षुब्ध विराट आकाश कीओर --
औरउसे घेरता हुआअंधकार -- बिखरते केश
निस्सीमनिस्संग हवा मेंअजस्र स्वरों केवाद्य!
धीरे-धीरे तत्परयह सृष्टि
जिसतरह मधुरतम क्षणोंमें
वज्रबनकर टूट पड़ताहै उसकी आकांक्षाका मेघ
तुम्हारीउद्धत उत्सुक विदीर्णछाती के बीचोंबीच
मिलनकी संपूर्ण कामनाके साथ!
इसकेबाद
भीगीअस्त-व्यस्त
इसभग्न पृथ्वी काकूड़ा-करकट बुहारतीहुई
आएसुंदर, शीतल, ममतामयी सुबह!!
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2.
बादलों-जैसाइन्सान
मेरेसामने से
बादलों-जैसा वहइन्सान चला जारहा है
उसकीदेह को थपकनेसे
लगताहै पानी झरनेलगेगा
मेरेसामने से
बादलों-जैसा वहइन्सान जा रहाहै
उसकेपास जाकर बैठनेपर
लगताहै छाया उतरआएगी
वहदेगा, या किलेगा? वह आश्रयहै, या किआश्रय चाहता है?
मेरेसामने से
बादलों-जैसा वहइन्सान चला जारहा है
उसकेसामने जाकर खड़ेहोने से
होसकता है मैंभी कभी बादलबन जाऊँ!
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3.
डर
सी. आई. टी. रोडके मोड़ पर
कंकड़ोंपर हाथ फैला
सोईहुई है मेरीबिटिया
सीनेके पास रखाहै तामचीनी का कटोरा।
आजदिन भर झरतीरही बारिश उसकीभिक्षा पर
इसलिएमैं समझ नहींपाया
पानीकौन-सा था, रुलाई कौन-सी!
उसदिन जब खोगई थी
बंदगली की भँवरोंमें
औररो उठी थी
जैसेरोती हैं अनाथलड़कियाँ।
मैंनेकहा था
क्योंडरती हो
मैंतो तेरे पीछेही था।
लेकिनमुझे भी डरलगता है
जबसो जाती हैवह
औरउसके होंठों की कोरोंपर
बादलोंको चीरती
ढुलकआती है एकटुकड़ा रोशनी।
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4.
देह
देहके भीतर कुछघट रहा है, डॉक्टर
मुझेठीक-ठीक नहींपता कि
उसकानाम किस तरहलिया जाता है
आइनेके सामने बैठो
तोभारी हो उठतीहैं आँखें
दर्दउठता है पेशियोंके भीतर
भीतरसे फूट रहीहै पीली रोशनी
लेकिनवह तो गोधूलिकी आभा है
गोधूलिक्या ख़ून मेंदिखाई देती है?
ख़ूनमें दिखाई देतीहै गोधूलि?
तोक्या बेहतर हैचले जाना?
देहके भीतर कुछघट रहा है, डॉक्टर
मुझेउसका नाम नहींपता।
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5.
हमारी अंतिमबातें
हमारीअंतिम बातें ढुलकरही हैं अंधकारकी ओर
हमारीअंतिम बातें ...
मरेहुए लोगों कीआँखों से
भरगया है आधाआकाश
हमारेशब्दों के उसपार
आजरात ताड़ केझुरमुट के भीतरसे
उठआ रहे हैंयुवकों के हृत्पिण्ड
हमजिनके नाम तकनहीं जानते
उनकेख़ून के लिएरास्तों पर रखेगए हैं कलश
हमलोग शान सेउनके पास सेगुज़र जाते हैं
औरहमारी बातें गोलहोकर जगमगाती हुई
ढुलकजाती हैं पिछलेदिनों की ओर!
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6.
जन्मदिन
तुम्हारेजन्मदिन पर औरक्या दूँगा सिवायइस वचन के
किकभी फिर हमारीमुलाक़ात होगी।
मुलाक़ातहोगी तुलसीवट पर
मुलाक़ातहोगी बाँस केपुल पर
सुपारीवनके किनारे मुलाक़ातहोगी।
हमघूमेंगे शहर मेंडामर की टूटीसड़कों पर
गुनगुनीदोपहर या अविश्वासोंकी रातों में
लेकिनहमें घेरे रहेगीअदृश्य
उसीतुलसी अथवा पुलअथवा सुपारी की
कितनीही सुंदर तन्वंगीहवाएँ।
हाथउठाकर कहूँगा
यहदेखो
सिर्फ़दो-एक दर्दबचे रह गएहैं आज भी।
जबजाने का समयहोगा
तोइस तरह देखूँगाकि भीग जाएँगीआँखें
हृदयको दुलराएगा उँगलियोंका एक पंख
मानोहमारे सम्मुख कहींकोई अपघात नहीं
औरमृत्यु नहीं दिगंततक।
तुम्हारेजन्मदिन पर औरक्या दूँगा सिवायइस वादे के
किकल से हरेकदिन मेरा जन्मदिनहोगा!
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7.
खुलने लगेहैंतोरण
यहचिट्ठी किसे लिखूँगामैं अभी तकनहीं जानता
लेकिनलिखनी ही पड़ेगी
लिखनापड़ेगा कि अबसमय हो आयाहै
समेटलेने का समय....
अबउठना ही पड़ेगा
अबकोई काम नहींकि जिसे अधूराछोड़ सकें
नीचेझुककर पानी कीछाया में देखलेने होंगे सभीचेहरे
सबकेचेहरों पर हैमेरी छाया
औरमेरी देह मेंव्याप्त
कितनेलोगों, कितने दिनों काअविरल विश्वास।
कहाँसे आया थाइतना सब? जमारह गया ....
इसबार लिखना हीपडे़गा।
लिखनाही पड़ेगा किमैं भी हूँ
मैंभी हूँ तुम्हारेसाथ हाथ मिलानेके लिए
औरजिसे लिखूँगा उसनेभी शायद
अबआना शुरू करदिया है
स्वप्नमें खुलने लगेहैं ...
खुलनेही लगे हैंरास्तों पर बनेहुए तोरण।
00
8.
मणिकर्णिका
चतुर्दशीके अंधकार मेंबह रही हैगंगा
उसकेऊपर हमारी पालवाली नाव कीसाँसें
हमारेचेहरों से टकरारही थी
मणिकर्णिकाकी आभा
हमकिसी के भीचेहरे की ओरनहीं देख रहेथे
केवलहाथ से डेकको छू रहेथे
पानीकी दो-एकबूँदों का
माथेपर लग रहाथा तिलक
दिनके समय जिसेदेखा था चांडाल
रातको वही हमारामाझी था
उनकीआँखों की पुतलियोंमें
किसीतरह का भेदनहीं था
पानीपर उड़ती आरही थी चिनगारियाँ
भस्मघुलती जा रहीथी हवा में
पंजरके भीतर डुबकीलगा रहा थेऊदबिलाव
अबहम
दक्षिणमें हरिश्चंद्र घाटकी ओर
घुमालंेगे नाव
दोनोंओर दिखाई देरहे हैं
कालूडोम के घर
चतुर्दशीके अंधकार मेंबह रही हैगंगा
एकश्मशान से दूसरेश्मशान जाते हुए
हमकिसी के भीचेहरे की ओरनहीं देख रहेथे।
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9.
संकेत
मुझेयाद है तुम्हारासंकेत
मैंठीक पहुँच हीजाऊँगा समय रहते।
आइनेके सामने खड़ेहोने के बहुत-से बहानेहैं
उनसब को हटाकर
पिछलेसाल के बाक़ी-बक़ाये में डूबेमन
इनसबको भूलकर
इसकेउसके उनके साथमुलाक़ात हो जाने
बातेंकहने-सुनने
इनसबको पोंछकर
दिन-दोपहर की ओटमें
पहुँचही जाऊँगा आजतुम्हारे संकेत की शामको
भग्न-हाट केथके व्यापारियों केपड़ोस से होकर
गाँवके सिवान केश्मशान में
जहाँपीपल के झुकआए चेहरे कीओर
टकटकीलगाए देख रहाहै
ठण्डगूँगा जल ...
00
10.
उस दिनअनंतमध्यरात
उसदिन अनंत आधीरात को
राहमें हुई थीबारिश
टूटगए थे घरऔर पेड़ों कोमिली थी हवा
सुपारीकी टहनियों कीफुनगी पर
रुपहलेपानी की प्रभाथी
औरअँधेरे में थी-- हृदयहीन अँधेरे में
ज़मीनपर सुला दीगई नावें
उनकेसीनों में जमगई थी बारिश
भीगीछाल की साँसें
किसीशून्यता के भीतरस्तब्ध हो गईथीं
मिट्टीऔर आकाश नेसिर्फ़ पुल बनकरबाँधी थी धारा
जीवनऔर मृत्यु केठीक बीचोबीच
वायवीयजाल को कँपाते
उतरआए थे अतीत, अभाव और अवसाद
पत्थरकी प्रतिमा ने
इसीलिएपत्थर पर रखाथा अपना सफे़दचेहरा
औरचारों ओर अविरलझर रही थीबारिश
बारिशनहीं, शेफाली, टगर, गंधराज थी वेबूँदें
घरविहीनदेह के उड़तेजाते मलिन इशारोंसे
वेपोंछ लेना चाहतेहैं अपने जीवनके अंतिम अपमान
सीनेमें हुई थीबारिश
उसदिन अनंत आधीरात।
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मूलबँगला से अनुवाद: उत्पलबैनर्जी

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