यह देशभक्ति का 'दंगल' है!



 आम दर्शकों के नजरिये से भी सिनेमा को समझना चाहिए. रोहिणी जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में कोरियन विधाग में शोधार्थी हैं. यह उनका 'दंगल' है- मॉडरेटर 
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बातों को शॉर्ट करके कहना या लिखना आता नहीं मुझे इसीलिए भूमिका कई बार ज़्यादा लम्बी हो जाती है असली बात से, फिर भी कोशिश करूँगी कम में ज़्यादा बात कहने की।
सिनमा और उसको हॉल में जाकर देखने को लेकर मैं कभी भी ज़्यादा उत्साहित नहीं रही, कारण शायद बचपन है मेरा जो अधिकांशतः अपने से बड़े उम्र के भाई बहनो के बीच में बिता जिनकी उम्र मुझसे कम से कम 8 या 10 साल अधिक थी। जब तक मैं सिनमा देखने लायक उम्र में पहुँची उन लोगो की ऐसी चीज़ों को लेकर पागलपन वाला दौर शायद गुज़र चुका था और इसके अलावा रही बात स्कूल से भाग कर या बंक करके दोस्तों के साथ सिनमा देखने वाली हरकत की तो वो कभी किया नहीं जिसका मलाल है मन में। सिनमा को लेके ऐसा पागलपन जो पहले दिन पहली शो का टिकट बुक करने पे मजबूर कर दे आज भी नहीं पाया है जबकि अब घर से अलग रहते हुए तक़रीबन 11 साल तो हो ही गये।
हाँ तो असली बात पे आते है और वो यह कि ऊपर कही गयी सारी बातें फ़ेल हो जाती हैं जब आते हैं 'लगान' वाले आमिर खान। ऐसा पहले नहीं था लेकिनतारे ज़मीन परके बाद से आमिर के सिनेमा का मन ही मन इंतज़ार रहता है और लगता है पूरा साल जैसा भी बीते साल के अंत में आमिर की एक अच्छी मूवी देख लूँगी और सब पुराना भूल जाएगा। और उसके बाद से शायद ही कोई साल ऐसा बीत होगा जब आमिर ने मुझे या अपने दूसरे फ़ैन्स को मायूस किया हो। इस साल भी ऐसा ही रहा कुछ। पहले दिन पहला शो का टिकट बुक हो गया भाई साहब वो भी नोटेबंदी के इस दौर में कैश दे कर। पहुँच गये हम आमिर को देखने दंगल में। और इस बार तो उनके साथ साक्षी भी थी तो डबल जैक्पाट वाला मामला समझिए।
मेरी सोच के हिसाब से दंगल जैसी फ़िल्में हमारे या बॉलीवुड के लिए नई नहीं हैं। मेरी कॉम, चक दे इंडिया जैसी फ़िल्में हैं जो खेल और उसमें भी औरत को केंद्र में रख कर बनायी गयी हैं जिन्हें  दर्शकों ने सराहा भी और स्वीकार भी किया।
फिर बात आती है की दंगल में ऐसा क्या है? तो दंगल में है उसका मुख्य पात्रमहावीर सिंह फोगटजो एक पहलवान है और कुश्ती ही उसकी पहचान और ज़िंदगी दोनों। सनक से भरा एक ऐसा इंसान जिसका सपना अपने लिए नहीं बल्कि अपने देश के लिए कुश्ती में गोल्ड मेडल लाने का है और जिसे वो भूल नहीं पाता लेकिन उसकी एक ग़लती उसे अपने सपनो से दूर कर देती है और वो ये कि महाबीर सिंह एक ऐसे देश में पैदा हुआ है जिस देश में डॉक्टर, इंजीनियर या कलेक्टर के अलावा कुछ भी बनना कुछ बनना नहीं होता।लेकिन वो उन सैकड़ों लोगों की तरह नहीं जो नून तेल लकड़ी के इंतज़ाम में अपने सपने और सनक को भूल जाए, वो ठान लेता है कि उसका बेटा ये सपना पूरा करेगा लेकिन  एक बार फिर सपनों में सेंध लग जाती है जब महावीर के घर पैदा होती हैं सिर्फ़ बेटियाँ।और तभी मूवी में आता है ट्विस्ट और कहानी असल मायने में यहीं से शुरू होती है।
 
सिनेमा कई तरह के उतार चढ़ाव से होते हुए आगे बढ़ती है, मसलन जब मुख्य पात्र गीता नैशनल गेम जितने के बाद चंडीगढ़ जाती है तो कहीं ना कहीं दर्शक इस डर में रहता है कि नयी मिली उड़ान से गीता भटक ना जाए क्यूँकि अब महावीर सिंह जो  उसका पिता कम कोच ज़्यादा है उसके साथ नहीं होगा और गीता के इंटरनेशनल खेलों में लगातार मिली हार से दर्शकों का ये डर सही भी साबित हो जाता है। यहाँ स्क्रिप्ट फिर से उसी stereotype को दिखाती हुई इस कहावत को चरितार्थ करती है की पढ़ोगे लिखोगे होगे नवाब और खेलो कूदोगे होगे ख़राब, मतलब अपने लक्ष्य के प्रति सजग रहो तभी सफलता मिलेगी वरना जहाँ भी थोड़ा भटके वो तुमसे दूर हो जाएगा। इस सिनेमा में भी गीता के माध्यम से यही दिखाने की कोशिश की गयी है कि अगर वो शहर आकर भी अपने पिता द्वारा तय पुराने नियमों को अपनाते हुए आगे बढ़ती तो उसे कभी निराशा हाथ नहीं लगती। जबकि गीता की हार का कारण उसका मौज मस्ती या अपने तरीक़े से जीने की शुरुआत करना नहीं बल्कि उसकी ट्रेनिंग में आया बदलाव होता है जिसे सिनेमा के अंतिम भाग में दिखाया भी जाता है जब महावीर सिंह की बहस गीता के कोच से होती है। उसके नए कोच द्वारा दी गयी ट्रेनिंग गीता के पहले की ट्रेनिंग के ठीक विपरीत थी जिसे ना तो गीता समझ पायी थी ना ही उसका कोच और गीता का पर्फ़ॉर्मन्स ख़राब हो रहा था। लेकिन सिनेमा इस बिंदु पे फ़ोकस करने के बजाय पिता के अनुशासन वाले बिंदु को ज़्यादा उजागर करती हुई दिखती है और इस वजह से एक ख़ास दर्शक वर्ग को पसंद भी आती है।
 
कोच और उसके रवैए से भारत में स्पोर्ट्स और उससे जुड़े लोग और पूरे सिस्टम की असलियत को दिखाने की छोटी सी कोशिश की गयी है,जो मेरी कोम और चक दे इंडिया के बनिस्पत कमज़ोर लगेगी या यूँ कहें की डायरेक्टर ने इस पर ज़्यादा फ़ोकस करना ज़रूरी नहीं समझा।

सिनेमा बाप बेटी के मनमुटाव को दिखाते हुए आपको बांधे रखती है।प्लॉट में बहुत कुछ प्रत्याशित सा है लेकिन डाइयलॉग्स मारक हैं और आपका ध्यान एक सेकंड के लिए भी इधेर उधर नहीं भटकता। इन सब के बीच मुझे जो बात थोड़ी से खली वो ये की आमिर ने साक्षी के पात्र के साथ ज़्यादा जस्टिस नहीं किया क्यूँकि समाज के ख़िलाफ़ इस अनोखे लड़ाई में महाबीर की पत्नी कहीं पीछे नहीं हटी, वो सारी समस्याओं के बावजूद हर दूसरी भारतीय पत्नी की तरह हर वक़्त अपने पति के सपने और उसके इच्छाओं का सम्मान करते हुए डटी रही।बेटा पैदा ना कर पाने का मलाल महाबिर से ज़्यादा उसकी पत्नी को है। लेकिन फिर ये भी कहा जा सकता है कि किसी सिनेमा में दिखाने के लिए बहुत कम चीज़ें ही हो सकती हैं यहाँ समय की सीमा के कारण  एलिमिनेसन नॉट सिलेक्शन (Elimination not Selection) वाली पद्धति पे चलना पड़ता है और आमिर ने भी वही किया है।हालाँकि दंगल में ज़्यादातर किरदार और कहानी को आगे बढाने का माध्यम औरतें (गीता, बबीता ) हैं फिर भी ये सिनेमा नारी वादी सोच को लेकर बनायी हुई नहीं कही जा सकती।ये कहानी उस सोच को दिखाती है की एक ऐसे में समाज जहाँ बेटियों को गर्भ में ही मार दिया जाता है वहाँ एक सनकी बाप अपनी बेटियों को कुश्ती के लिए तैयार ही नहीं  करता बल्कि देश के लिए लड़वाकर गोल्ड मेडल भी लेकर आता है।

देखने को बहुत सी बातें और भी हैं जो देखी जा सकती हैं जैसे कि ये सपना उन लड़कियों का अपना नहीं था इसमें महाबीर सिंह का मेल ईगो उसकी बेटियों से बड़ा था उसने अपने सपने के आगे अपने बेटियों के सपनो के बारे में सोचा नहीं वग़ैरह वग़ैरह। सारी बातें दूसरे नज़रिए से देखी जाए तो सही भी लेगेंगी और जायज़ भी लेकिन फिर से वही कहना चाहूँगी इस बुरे दौर में अच्छा देखना ही ताक़त दे सकता है हमें, कुछ देर के लिए ही आप कुछ और ना सही बस उन दो लड़कियों के बारे में सोचिए जो शायद चूल्हा चौका करते हुए और 3-4 बच्चों को पालते हुए अपना जीवन बिता देती और उन्हें पता भी नहीं चल पाता उनके भीतर के उस ताक़त का जो उनके अंदर थी और जिसे उनके सनकी बाप के सनकपन ने निखार दिया।

यक़ीन मानिए अगर महाबीर सिंह ने गीता और बबीता को पहलवान नहीं बनाया होता तो वो कुछ और भी नहीं बन पातीं। इसीलिए अगर नहीं देखा है अभी तक तो हल्के मन से जाइए और जाकर सिनेमा देख आइए।

और सबसे आख़िरी में वो बात जो इस दौर के लोगों और सरकार दोनों के लिए ज़रूरी है वो ये की सिनेमा में दो बार राष्ट्रगान बजवा कर आमिर ने आपने पाप का प्रायश्चित कर लिया है।


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