रेडियो में घुसने की छोटी कथा
पुष्यमित्र पेशे से पत्रकार हैं, मन से लेखक. 'रेडियो कोसी' उनका पहला उपन्यास है जो ज्योतिपर्व प्रकाशन से शीघ्र प्रकाशित होने वाला है. आप खुद पढ़कर देखिये कितनी रोचक कथा है- मॉडरेटर
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दीपा जी का रूटीन फिक्स था. सुबह सात बजे से दस बजे तक रसोई घर में छनर-मनर करतीं और विविध भारती सुनतीं. उसके बाद नहान-धोना, साफ-सफाई, खाना-खिलाना. फिर एक बजे से तीन बजे तक बिछौना पर पड़े-पड़े टेप रेकार्ड पर गाना सुनतीं. फिर थोड़ा बहुत घर का काम काज और छत की सैर. शाम में वही रेडियो, वही रसोई. गाना-गाना और गाना. काम धंधे के बाद यही उनकी जिंदगी थीं. कभी लता मंगेशकर तो कभी अलका याग्निक. कभी किशोर कुमार तो कभी कुमार सानू. खुद नहीं गाती, गुनगुनाती भी नहीं थीं. मगर, दिन रात सुर-ताल का मेल चलता रहता. रेडियो बंद तो टेप चालू. टेप बंद तो रेडियो. कभी-कभी सोचते कि अगर इनसे बात करना हुआ तो रेडियो में ही घुसना पड़ेगा.
प्रह्लाद के लिए रेडियो में घुसना बड़ा जरूरी था. रेडियो में नहीं घुसता तो दीपा जी को अपने दिल की बात कैसे बताता और अगर दीपाजी को दिल की बात नहीं बताता तो भगवान के रचे-रचाये उस लगन का क्या होता जो खास तौर पर उसके और दीपा जी के प्रेम कहानी के लिए तय हुआ था.
प्रेम या परेम... यह उसकी दुनिया का शब्द नहीं था. यह सिनेमा-नौटंकी से उपजा मामला माना जाता था. उसके गांव में ज्यादातर लोगों की शादी होती थी और शादी के बाद जिसको अपनी बीवी पसंद आती थी उससे वह परेम करने लगता था. जिसकी उतनी पसंदीदा नहीं भी होती वह भी कुछ दिन तो दिखावा जरूर करता. जिसको बिल्कुल पसंद नहीं आती, उसकी बात अलग है.
पहले बचपन में शादी हो जाती, तो कोई झमेला नहीं था. मगर जब से 25 के पार शादी करने का चलन शुरू हुआ तो टोला की या रिश्तेदारी की कोई लड़की मन में बसने लगी. अधिकांश लड़के मन की बात मन में रख कर बूढ़े हो जाते, मगर कुछ लोग तो सर्वगुण संपन्न भी होते थे. उनके लिए किवाड़ की ओट भी एकांत हो जाता. कुछ लोग बेधड़क होते थे, घर वालों के सामने जिद कर बैठते थे, शादी करेंगे तो इसी से. यह सब व्यापार होता था, मगर उसका नाम प्रेम नहीं होता था.
दीपा जी को पहली बार देखते ही प्रह्लाद को लग गया था कि अगर कोई उसके सपनों की रानी हो सकती है, तो वह यही है. वह नजारा प्रह्लाद के मन आज भी हूबहू कैद है, जब दीपा जी पहली बार उससे मिलने आयी थीं... हरजीत भाई का मैसेज लेकर.
उन्होंने पीले रंग का सूट पहन रखा था, हाथ में रंग-बिरंगी छतरी थी और बाल हवा में लहरा रहे थे. शायद कुछ ही देर पहले शैंपू किया होगा. उस अधबने मकान की दीवारों को पेंट कर रहे प्रह्लाद ने जब दीपा जी को देखा तो लगा कि इस लड़की को और सुंदर बनाने के लिए अब किसी और रंग की जरूरत नहीं है. इसे इस बिना रंगे दीवार के सामने खड़ा भर कर देने से नेरोलेक पैंट का विज्ञापन पूरा हो जायेगा.
दीपा जी ने बाद में बताया कि पहली नजर में वे भी उसे देखकर चकित रह गयी थीं. वह नजारा कुछ ऐसा था ही. प्रह्लाद रस्सियों के सहारे दीवार में लटका बिल्कुल स्पाइडर मैन लग रहा था. उसके शरीर पर जगह-जगह पड़े पेंट के धब्बे स्पाइडर मैन लुक को और रीयल बना रहे थे. दिलचस्प बात यह थी कि दीपा जी को स्पाइडर मैन की फिल्में काफी पसंद आती थीं. खास तौर पर उस सीन में जब वह हीरोइन को बचाने के लिए अचानक हाजिर हो जाता और संकटग्रस्त हालात के बीच से एक हाथ से उसे उठा कर गायब हो जाता. वे स्पाइडर मैन के स्टीकर खरीदा और अपने कमरे में चिपकाया करती थीं.
आज भी वे उसे कभी-कभी स्पाइडर मैन कह कर बुलाती हैं और कहती हैं तुम मेरे लिए मेरे घर, शहर और जीवन में स्पाइडर मैन बनकर ही आये थे. मगर प्रह्लाद समझ नहीं पाता कि उसके जैसा कोसी कछार का गरीब लड़का किसी के लिए स्पाइडर मैन कैसे बन सकता है.
प्रह्लाद की जिस बात ने दीपा जी के मन में उसकी छवि को पुख्ता किया वह उसकी मुस्कुराहट थी. दीपा जी कहती हैं, उसके मुस्कुराहट में सहजता है और उस सहजता में अपनेपन का इशारा... जैसे कोई बरसों पुराना बिछड़ा हुआ मीत हो... जैसे बचपन में खोया कोई खिलौना जवानी में मिल जाये... जैसे किसी फेवरिट फिल्म का कोई कैरेक्टर अचानक सामने खड़ा हो जाये...
मगर.... मगर.... मगर....
इस बात का यह मतलब बिल्कुल नहीं था कि पहली नजर में दोनों में प्यार हो गया और दोनों ने मन ही मन इस बात को स्वीकार कर लिया. यह बात तब की थी जब प्रह्लाद स्पाइडर मैन की तरह रस्सियों में लटका था और दीपा के शैंपू किये बाल बेवजह लहरा रहे थे. मगर प्रह्लाद तीन मिनट के अंदर नीचे आ गया और घर पहुंचते ही दीपा ने वह पीला सूट उतार कर नाइटी पहन लिया और बाल बांध कर किचेन में घुस गयी.
वह प्यार नहीं, सिर्फ इशारा था... एक संकेत कि दोनों के बीच एक बेहतर संबंध की बेहतरीन संभावना है.
मगर इस इशारे को कितने लोग डिकोड कर पाते हैं. अपने देश में प्यार का एक ही अंजाम माना जाता है ...शादी... और प्यार का पहला संकेत पाने वाला महज पांच मिनट बाद शादी की संभावनाओं के बारे में सोचने लगता है. लड़कियां सोचती हैं कि क्या किसी विध्न-बाधा के बिना उनकी शादी हो सकती है. वहीं लड़के सोचते हैं कि अगर कोई बाधा है तो उसे कैसे पाटा जा सकता है.
हालांकि इस मामले में ऐसा कुछ नहीं हुआ. धरातल पर आते ही दोनों को अहसास हो गया कि वे एक दूसरे के लिए नहीं बने हैं. दोनों की दुनिया अलग-अलग है. एक बिहारी कामगार है तो दूसरी मध्यम वर्ग की पंजाबन. प्रह्लाद के मन में एक टीस सी उभरी. मगर दीपाजी के साथ अगर ऐसा कुछ हुआ भी होगा तो मन के किसी अंधेरे कोने में दिया जल कर बुझने जैसी बात रही होगी. उसका अहसास भी उन्हें शायद ही हुआ हो.
वैसे भी दीपा जी दो साल पहले एक भीषण किस्म के दर्द से गुजर चुकी थीं. उस दर्द ने उनके मन को कड़ा बना दिया था. उनकी नजर में प्रह्लाद की खासियत महज इतनी थी कि वह बुरा लड़का नहीं था. लड़कियों के लिए अच्छे और बुरे पुरुषों की कैटोगरी बनाना एक जरूरी काम होता है. जो बुरे होते हैं, उनसे वे दूरी बनाकर रहती हैं और जो अच्छे होते हैं उनके पास आने पर भी वे सहज महसूस करती हैं. बुरे लड़कों की निगाहें बुरी होती हैं और स्पर्श भी.
वैसे भी यह एक छोटा सा वाकया था. कहानी एक घंटे में भी खत्म हो सकती थी, अगर प्रह्लाद की नौकरी नहीं छूटती और हरजीत भाई उसे अपने घर से सटे दुकान में काम करने का ऑफर नहीं देते. मगर नियति ने दुबारा अपना जाल फेंका. अब स्पाइडर मैन बिल्कुल करीब आ गया था. कई महीनों के लिए. वह पीली सूट वाली लड़की को रोज दस बार देखने लगा और हर बार और अधिक देखने की तड़प के साथ.
पीली सूट वाली लड़की के बुलेटप्रूफ हृदय में अभी प्यार का तीर नहीं चुभा था. अभी वह नियति के फरेब से अनजान थी. अभी भी प्रह्लाद एक ऐसा लड़का था जो बुरा नहीं था. उसके पास आने पर वह असहज नहीं होती. दुपट्टा संभालने की जरूरत नहीं थी. एक नयी बात यह हुई थी कि उसे पता चल गया था बिहारी इतने बुरे नहीं होते जैसा आम तौर पर दूसरे लोग कहते हैं. ये लोग तो औरतों को इज्जत देना जानते हैं.
मगर क्या यह एक बीज था... जो भी हो, अभी दीपा जी ने रेडियो पर लता के मशहूर गीत... ठोकर न लगाना हम खुद हैं... गिरती हुई दीवारों की तरह... सुनते वक्त प्रह्लाद के बारे में नहीं सोचती थी. जबकि प्रह्लाद जब भी दीपाजी को इस तरह के गाने सुनता पाता... सोचने लगता कि कैसे गाना बदल दें और दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे का गाना... मेरे ख्वाबों में जो आये... लगा दें.
वह दुकान की खिड़की से बार-बार आंगन में झांकता. दिन भर में गिनती सौ को पार कर जाती. मगर एक बार भी दीपा जी की नजर उस खिड़की की तरफ नहीं होती. वे चाय के टाइम, नास्ते के टाइम, खाना-खाने के वक्त ही थे जब दीपा जी को उसका ख्याल आता था. इन्हीं हालात में प्रह्लाद ने सोचा था कि अब रेडियो में ही घुसना पड़ेगा. ...और वह दिन आ ही गया जब प्रह्लाद ने दीपा जी के रेडियो में घुसने का उपाय ढूंढ लिया.
यह भी नियति की ही चाल थी, वरना कहां दीपा जी और कहां रेडियो कोसी. दोनो असंभव बातें संभव हुईं और आज उसके जीवन का हिस्सा हैं.

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