तृतीय अंग्रेज मराठा युद्ध के कारण एवं परिणामों की विवेचना करें। अथवा लॉर्ड हेस्टिंग्स की मराठा नीति की विवेचना करें।

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*तृतीय अंग्रेज मराठा युद्ध के कारण एवं परिणामों की विवेचना करें।*
 अथवा
*लॉर्ड हेस्टिंग्स की मराठा नीति की विवेचना करें।*

 उत्तर---1831 ईस्वी में जॉर्ज बार्लो तथा लॉर्ड मिंटो के बाद लॉर्ड हेस्टिंग्स भारत का गवर्नल जनरल होकर आया ।उसके राज्य की सबसे महत्वपूर्ण घटना थी मराठों के साथ अंग्रेजों का तृतीय युद्ध, जिसमें भारतीय राजनीति से मराठों का पतन हो गया और ब्रिटिश साम्राज्य की राह से एक बड़ा रोड़ा दूर हो गया।
          लॉर्ड वेलेसली ने मराठों की ताकत को खत्म करने की कोशिश की थी, लेकिन जॉर्ज बार्लो तथा मिंटो की शांतिपूर्ण नीति से मराठों को एक बार पुन संगठित होने का अवसर प्राप्त हुआ था। परंतु मराठों में आपसी फूट, कलह, हत्या और षड्यंत्र का बाजार इस कदर गर्म था कि वे इस अवसर से फायदा ना उठा सके। उनकी राजनीतिक , प्रशासनिक तथा आर्थिक व्यवस्था छिन्न भिन्न हो चुकी थी। होल्कर, सिंधिया तथा भोंसले आदि कोई सरदार इस स्थिति में नहीं थे कि वह अंग्रेजों का मुकाबला कर सकें । परंतु इन्हें ब्रिटिश प्रभाव में और भी अधिक जकड़ने के उद्देश्य से हेस्टिंग्स ने इन्हें अलग-अलग संधि करने के लिए बाध्य किया।
        पेशवा के मंत्री त्रयंबकेजी ने अंग्रेजों के मित्र और गायकवाड के मंत्री गंगाधर शास्त्री की हत्या करवा दी। इस घटना से लाभ उठा कर अंग्रेजों ने पेशवा की अंग्रेजी विरोधी गतिविधियों को नियंत्रित करने के उद्देश्य से 1817 में उसे *'पूना की संधि'* करने के लिए बाध्य किया।
        इसके अनुसार पेशवा को मराठों के प्रधान पद से पद से पदच्युत कर दिया गया तथा उससे तथा कोंकण तथा कुछ अन्य क्षेत्र छीन लिये गए।
लाॅर्ड काॅर्नवालिस ने शासन के क्षेत्र में कौन कौन से सुधार किए?उसने वारेन हेस्टिंग्स के कार्यों को कैसे पूरा किया ।यहाँ पढ़ें ।
        इसी प्रकार दौलतराव सिंधिया को भी 1817 ई. में 'ग्वालियर की संधि' स्वीकार करने के लिए विवश किया गया। इसके अनुसार पिंडारियों के विरुद्ध सिंधिया ने कंपनी को मदद करने का वचन दिया। उसने राजपूताना के राज्यों पर से भी अपने सभी दावों का परित्याग कर दिया।
     भोंसले परिवार के अप्पा साहब ने 'नागपुर की संधि' के द्वारा सहायक संधि की शर्तों को स्वीकार किया। बदले में अंग्रेजों ने उसे नाबालिक परसोजी का संरक्षक स्वीकार किया।
          इन संधियों का तत्कालीन परिस्थितियों में काफी महत्व था। इससे मराठों के साथ संबंधों में अंग्रेजों की स्थिति काफी रक्षात्मक हो गई। लेकिन इन संधियों के बावजूद मराठा अंग्रेजों की पराधीनता स्वीकार करने को तैयार ना थे। वे संपूर्ण समर्पण के पहले एक बार अंग्रेजों से दो-दो हाथ कर लेना चाहते थे।
       जिस दिन सिंधिया ने सहायक संधि पर हस्ताक्षर किया। उसी दिन पेशवा ने खुली बगावत की। उसने अंग्रेज रेजीडेंट के कार्यालय पर आक्रमण कर आग लगा दी परंतु किरकी के युद्ध में वह बुरी तरह प्राप्त हुआ। इसी समय नागपुर के अप्पा साहब, मलहारराव होल्कर ने भी युद्ध की घोषणा कर दी। परंतु सीताबल्दी की लड़ाई में भोंसले तथा महीदपुर की लड़ाई में होल्कर की पराजय हुई।
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*परिणाम---::*

 अप्पासाहब पंजाब भाग गया जहां उसकी मृत्यु हो गई। नर्मदा नदी के उत्तर के भोंसलेे के सभी क्षेत्र ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिए गए। एक छोटे भाग का राजा रघुजी भोंसले द्वितीय के नाबालिक पोते को बनाया गया। होल्कर ने 'मंड़सोर की संधि' के द्वारा सहायक संधि की शर्तों को स्वीकार किया। नर्मदा नदी के दक्षिण के सभी क्षेत्र अंग्रेजों के हवाले कर दिए गए। होलकर के दरबार में एक अंग्रेज रेजीडेंट रख दिया गया।
 पेशवा ने भी 1818 ई. में कोरगाँव  तथा अष्टि के युद्धों में हारने के बाद आत्म समर्पण कर दिया। मराठों की राष्ट्रीय एकता का प्रतीक पेशवा का पद समाप्त कर दिया गया और पेशवा को  8 लाख  ₹  सालाना देकर बिठुर में  रहने की आज्ञा दी गई । पेशवा के  मंत्री त्रयम्बकजी को अपना शेष जीवन चुनार के किले में व्यतीत करना पड़ा। पेशवा के राज्य से सतारा का राज्य अलग करके उसकी गद्दी पर शिवाजी के वंशज प्रताप सिंह को बैठाया गया।
      अंग्रेजी शिकंजा से मुक्ति के लिए मराठा का यह अंतिम प्रयास था।इस युद्ध के परिणाम स्वरूप भारतीय राजनीतिक  से सदा के लिए मराठों का खत्मा हो गया और अंग्रेजों को बहुत बड़ी शत्रु से छुटकारा मिला।

18 दिसंबर का इतिहास यहाँ देखें ।

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