हैदर अली

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*हैदर अली की जीवनी एवं उपलब्धियों की विवेचना करें.*
 अथवा
*हैदर अली के अधीन मैसूर के उत्कर्ष का वर्णन करें .*
अथवा
*हैदरअली का मूल्यांकन करें .*

उत्तर---जिस समय बंगाल और कर्नाटक में राजनीतिक उथल-पुथल हो रहे थे और अंग्रेज अपना पांव जमाने में लगे हुए थे, उसी समय मैसूर में धीरे-धीरे हैदर अली के नेतृत्व में एक नई शक्ति पनप रही थी। हैदर अली ने अपना प्रारंभिक जीवन एक साधारण सैनिक के रूप में शुरू किया। परंतु अपनी प्रतिभा तथा योग्यता के बल पर उन्नति करता हुआ डिंडिंगुल का फौजदार तथा मैसूर राज्य का प्रधान सेनापति बन बैठा। अवसर से लाभ उठाते हुए उसने अपने संरक्षक दीवान नानराज से सत्ता हड़प ली और 1769 ईस्वी में मैसूर के राजा की मृत्यु के उपरांत गद्दी पर अधिकार कर लिया।
           उसने दक्षिण की अराजकता की स्थिति से लाभ उठाकर अपनी शक्ति का क्रमशः  विकास किया और वेडनोर, सुण्ड़,कनारा,गुटी सेर आदि इलाकों पर कब्जा जमा लिया। हैदर अली की अप्रत्याशित उन्नति ने मराठों, निजाम और अंग्रेज तीनों को सचेत कर दिया। अतः हैदर अली के विरुद्ध 1766 में तीनों ने एक त्रिगुट कायम किया। तीनों की सम्मिलित शक्ति का सामना करना हैदर के लिए एक दुष्कर कार्य था ।अतः हैदर ने कूटनीति से काम लिया और इस त्रिगुट को भंग करने का प्रयास किया। सबसे पहले मैदान में मराठा आए और उन्होंने हैदर पर आक्रमण करने की कोशिश की। haider ने धन देकर इसे त्रिगुट से अलग कर दिया।
       इसके बाद 1767 में निजाम की सेना ने जोसेफ स्मिथ के नेतृत्व में मैसूर पर आक्रमण किया लेकिन शीघ्र ही हैदर के प्रभाव में आकर वह अंग्रेजों का साथ छोड़ हैदर से मिल गया। अब मैदान में केवल अंग्रेज थे।चंगाम और त्रिनोमाली के युद्धों में अंग्रेजो की विजय भी हुई और निजाम पुनः अंग्रेजो से जा मिला। लेकिन इन घटनाओं से हैदर घबराने वाला व्यक्ति ना था। हैदर ने बहादुरी के साथ अंग्रेजों का सामना किया और मंगलोर पर कब्जा जमाता हुआ मद्रास के पास 5 मिल भीतर तक जा पहुंचा। अब अंग्रेजों ने हैदर से संधि की प्रार्थना की, (1769). जिसकी शर्ते हैदर की इच्छा अनुसार रखी गई. इसके अनुसार दोंनों पक्षों ने एक -दुसरे के जीते हुए इलाके तथा युद्ध बंदियों को लौट आने का आश्वासन दिया। अंग्रेजों ने यह भी वचन दिया कि भविष्य में यदि कोई दूसरी शक्ति हैदर पर आक्रमण करेगी तो अंग्रेज उसकी सहायता करेंगे। इस शर्त ने दूसरे अंग्रेज मैसूर युद्ध का बीजारोपण किया।
04 दिसंबर का इतिहास यहाँ देखें ।

*द्वितीय अंग्रेज मैसूर युद्ध:*
        1769 इसवी की संधि की शर्तों का पालन अंग्रेज करना नहीं चाहते थे क्योंकि ये शर्त अंग्रेजो के लिए बहुत अपमानजनक थी और इन्हें उन्होंने लाचारी की अवस्था में कबूल किया था। संधि को परखने का मौका शीघ्र हाथ आया। 1771 ईस्वी में मराठों ने हैदर के राज्य पर आक्रमण किया, किंतु अंग्रेजों ने हैदर की कोई शिकायत नहीं की। haider घायल साँप की तरह इसका प्रतिशोध लेने के लिए अवसर की प्रतीक्षा करने लगा। यह अवसर उसे 1779 इसलिए प्राप्त हुआ और उसने मराठा और निजाम को मिलाकर अंग्रेजों के विरुद्ध संयुक्त मोर्चा गठित किया।
         इसी समय अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम के परिणाम स्वरुप भारत में अंग्रेज और फ्रांसीसी जुझ पड़े और अंग्रेजों ने फ्रांसीसियों के इलाके माही पर अधिकार कर लिया। चूँकी माही haider के राज्य में था, अतः हैदर ने अंग्रेजो के इस कार्य का विरोध किया और फ्रांसीसियों को समर्थन प्रदान किया। इसके बाद अंग्रेज और हैदर के बीच युद्ध शुरू हो गया जो द्वितीय आंग्ल मैसूर युद्ध कहलाता है। अंग्रेजों के लिए यह बहुत संकट का काल था, क्योंकि परिस्थिति से लाभ उठाकर फ्रांसीसी एक बार पुनः खोई शक्ति को प्राप्त करने की चेष्टा करने लगे ।
हैदर ने अंग्रेजों के मित्रराज्य कर्नाटक पर आक्रमण किया और उसकी राजधानी आकोर पर अधिकार कर लिया। अंग्रेजों की स्थिति कितनी गंभीर थी इसका पता इसी बात से लगता है कि सर अल्फेड़ लाॅयल ने लिखा है---"  The fortunes of the company in India had fallen to their lowest watermark. "
       अब हेस्टिंग्स ने प्रसिद्ध सेनापति सर आयर कूट को एक बड़ी सेना के साथ हैदर का दमन करने के लिए भेजा. उसने बरार की raja, निजाम तथा महादजी सिंधिया को त्रिगुट से अलग कर दिया। लेकिन अकेला होने पर भी haider ने बहादुरी से अंग्रेजों का मुकाबला किया,  किंतु 1781 इसवी के पोर्टोनोवा के युद्ध में वह बुरी तरह हार गया। अंग्रेजों ने नागपट्टनम तथा त्रिनकोमाली पर अधिकार कर लिया। कर्नल ब्रेथवेट की सेना ने मैसूर की सेना को करारी पराजय दी। इसी प्रकार छिटपुट संघर्ष चलता रहा। फ्रांसीसियों ने अपने जहाजी बेड़े के साथ हैदर की सहायता करने की कोशिश की। लेकिन निरंतर लड़ने के कारण haider का स्वास्थ्य गिरने लगा। अन्त में वह लड़ाई के मैदान से हट गया और 1782 में उसकी मृत्यु हो गई। अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध का संचालन अब उसके योग्य पुत्र टीपू सुल्तान ने किया। कई युद्धों में टीपू की विजई भो हुई। इसी प्रकार अंग्रेज तथा टीपू में हार जीत का क्रम चलता रहा । अंत में 1784 में अंग्रेजों और टीपू  के बीच मंगलोर की संधि हो गई और इसी के साथ द्वितीय अंग्रेज मैसूर युद्ध समाप्त हुआ ।इसके अनुसार दोनों पक्षों ने एक दूसरे के जीते हुए इलाके तथा युद्ध बंदियों को लौटा दिया ।

03 दिसंबर का इतिहास जाने
*मूल्यांकन*

हैदर अली को भारतीय इतिहास में बहुत ऊंचा स्थान प्राप्त है। वह इतिहास के योग्यतम शासकों में से एक था। यद्यपि वह अशिक्षित था, किंतु कतिपय उच्च गुणों की उस में कमी नहीं थी। उसकी कुशाग्र बुद्धि तथा स्मरण शक्ति एवं साहस अद्भुत था। वह एक कुशल शासक था। वह एक निरंकुश शासक था, किंतु प्रजा कल्याण की भावना उसमें विधमान थी। उसने ईमानदारी एवं योग्य व्यक्तियों को शासन के उच्च पदों पर नियुक्त किया। वह हिंदू मुसलमान में भेद नहीं करता था। उसके मंत्रियों में अधिकांश ब्राह्मण थे। अग्नि में जले रंगनाथ के मंदिर जो उसने पुनर्निर्माण करवाया था।
        haider प्रधान न्यायधीश भी था ,काजियों के द्वारा नगर में तथा ग्राम पंचायतों के द्वारा गांव में न्याय कार्य निपटाया जाता था। दंड विधान कठोर था।
        हैदर ने अपनी सेना का संगठन आधुनिक ढंग पर फ्रांसीसियों की सहायता से किया। पैदल ,अश्वारोही तथा तोपची हैदर की सेना के महत्वपूर्ण अंग थे।
      एक अति साधारण परिवार में जन्म लेकर सैनिक के पद से सेनापति के पद तक और मैसूर का शासक बन जाना उसकी नैसर्गिक योग्यता का प्रमाण प्रस्तुत करती है ।उसने मैसूर को एक छोटे से राज्य से भारत की एक बड़ी शक्ति के रूप में परिवर्तित कर दिया। वह 5 भाषाओं का ज्ञाता था। यद्यपि वह निरक्षर था। धर्म के मामले में वह सहिष्णु था, धर्मांध नहीं जैसा कि कुछ पाश्चात्य इतिहासकारों ने उसे बदनाम करने की चेष्टा की है। वह वीर सेनानी एवं अंग्रेजों का कट्टर शत्रु था। वह वचन का पक्का व्यक्ति था। भारतीय इतिहास में इन गुणों के कारण वह सदा अमर रहेगा।
05 दिसंबर का इतिहास यहाँ पढ़ें ।

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