Q.लाॅर्ड काॅर्नवालिस ने शासन के क्षेत्र में कौन-कौन से सुधार किए?उसने वारेन हेस्टिंग्स के कार्यों को कैसे पूरा किया?

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*Q.लाॅर्ड काॅर्नवालिस ने शासन के क्षेत्र में कौन-कौन से सुधार किए?उसने वारेन हेस्टिंग्स के कार्यों को कैसे पूरा किया?*
हैदर अली
 उत्तर --पिट्स इंडिया एक्ट में संशोधन कर कॉर्नवॉलिस को गवर्नर जेनरल तथा मुख्य सेनापति के रूप में नियुक्त किया गया था। यह भी व्यवस्था की गई थी कि गवर्नर-जेनरल विशिष्ट परिस्थितियों में काउंसिल के निर्णय को मानने के लिए बाध्य नहीं होगा। इसके अतिरिक्त,काॅर्नवालिस अपने कार्यकाल में नियंत्रण बोर्ड तथा इंग्लैंड के प्रधान मंत्री का भी विश्वास पात्र बना बन गया। अतः वारेन हेस्टिंग्स से अपेक्षाकृत अधिक सुविधाजनक वातावरण में उसने सुधारों को कार्यान्वित किया।

*प्रशासनिक सुधार:*

उसने अपने सुधारों के द्वारा वारेन हेस्टिंग्स द्वारा प्रारंभ किए गए कार्यो को पूरा किया। प्रशासनिक क्षेत्र में कंपनी के उच्च पदाधिकारियों की नियुक्ति सिफारिश पर होती थी। वे अक्सर उच्च घराने के लोग होते थे। अतः अपने कार्यकाल में वे ना केवल अत्याचार किया करते थे, वरन् उनका कोई विरोध भी नहीं कर सकता था। इससे आयोग एवं कर्तव्यभ्रष्ट व्यक्ति भी उच्च पद पर नियुक्त हो जाया करते थे। कॉर्नवालिस ने योग्यता के आधार पर कंपनी के कर्मचारियों की नियुक्ति के सिद्धांत को कार्यान्वित किया।
        वारेन हेस्टिंग्स ने भारतीयों के साथ नौकरी में किसी तरह का भेदभाव नहीं किया, परंतु कॉर्नवालिस ने उच्च पदों पर सिर्फ यूरोपियनों को ही नियुक्त करने की नीति अपनाई थी। वह भारतीयों पर विश्वास नहीं करता था।
       उसने स्थानीय जमींदारों से पुलिस-कार्य लेकर सरकारी कर्मचारियों के जिम्मे सुपुर्द कर दिया था। कार्नवालिस के पूर्व तक जमींदार ही अपने-अपने क्षेत्र में शांति एवं सुव्यवस्था कायम करते थे।
     उसने सैन्य संगठन को भी सुव्यवस्थित करने का प्रयत्न किया। अतः अभी तक कंपनी के सैनिकों की नियुक्ति की कोई समुचित व्यवस्था नहीं थी। अतः उसके अनुरोध पर नियंत्रण बोर्ड के सदस्य डण्डास ने इंग्लैंड में सैनिकों की भर्ती की समुचित व्यवस्था की थी।
          कंपनी के कर्मचारियों के निजी व्यापार को नियंत्रित करने का प्रयत्न क्लाइव तथा वारेन हेस्टिंग्स ने भी किया था। परंतु, कर्मचारियों के कम वेतन होने के कारण इस कार्य में उन्हें पूर्णतया सफलता नहीं मिली थी। कार्नवालिस ने कर्मचारियों के वेतन में अभिवृद्धि की तथा व्यक्तिगत व्यापार को बंद करवा दिया।
       उसने उनकी रिश्वतखोरी, भेंट- उपहार लेने की प्रथा पर भी प्रतिबंध लगाया।

 *व्यापारिक सुधार :*

 कार्नवालिस ने कंपनी के व्यापारिक क्षेत्र में भी विभिन्न सुधार किए।
    उसने सर्वोच्च काउंसिल के सदस्यों के निजी व्यापार पर प्रतिबंध लगाया तथा कमीशन के रूप में उनकी आय में अभिवृद्धि की।
    उसने कंपनी के कर्मचारियों के द्वारा माल खरीदने के लिए ठेके की प्रथा को भी बंद करवा दिया। उन्हें कमीशन एजेंट बना दिया, जिससे कि उनकी आमदनी में कमी नहीं हुई।
     अभी तक जुलाहों को कंपनी के कर्मचारियों के हाथों ही कपड़ा बेचने के लिए बाध्य किया जाता रहा था, जिससे उन्हें अक्सर हानि होती थी परंतु कॉर्नवालिस ने यह नियम बना दिया कि पेशगी रूपये के मूल्य के ही कपड़े जुलाहे कर्मचारियों को देने के लिए बाध्य होंगे। अपने और बाकी कपड़े बेचने के लिए वह पूर्ण रूपेण स्वतंत्र होंगे। इस तरह, उसने कारीगरों के हितों की सुरक्षा की।
        उसने कंपनी के व्यापार की प्रगति एवं विकास के लिए 'बोर्ड ऑफ़ ट्रेड' की स्थापना की, जिसमें प्रारंभ से 11 सदस्य थे परंतु बाद में घटकर 5 ही सदस्य रहने दिए गए। *न्यायिक सुधार:*
 उसने देश में प्रचलित कानूनों को संग्रहित कराया तथा अब इसी काॅर्नवालिस कोड़ के अनुसार न्याय प्रदान किया जाने लगा। कानूनों के संग्रह से व्यक्तिगत स्वतंत्रता की भावना को प्रोत्साहन प्राप्त हुआ।
      उसने अपील की सबसे बड़ी अदालत कलकत्ता में सदर दीवानी तथा सदर निजामत स्थापित की। यहां प्रांतीय अदालतों के निर्णयों के विरुद्ध अपील की जाती थीं। उसने प्रांतीय अदालतें ढाका, मुर्शिदाबाद तथा पटना में स्थापित कीं। इन अदालतों में जिला-जजों के निर्णयों के विरुद्ध अपील होती थी। इन अदालतों के न्यायाधीशों को वर्ष में दो बार अपने अधिकार क्षेत्रों का दौरा करना पड़ता था।
      जिला अदालत के नीचे छोटी- छोटी दीवानी तथा फौजदारी अदालतें  थी, जिनमें मुंसिफ तथा सदर आमीन न्यायधीश का काम करते थे ।
      उसने न्याय विभाग में सच्चरित्र ईमानदार तथा प्रतिभावान व्यक्तियों को आकर्षित करने के उद्देश्य से वेतन वृद्धि की। ऐसी आशा नहीं की जा सकती थी कि कम वेतन पाकर न्यायाधीश रिश्वत, भेंट उपहार आदि नहीं स्वीकार करें ।
           कार्नवालिस ने प्रशासनिक क्षेत्र में उच्च पदों पर भारतीयों को नहीं नियुक्त करने की नीति अपनाई थी, परंतु न्याय के क्षेत्र में अंग्रेज न्यायाधीशों के स्थान पर भारतीय न्यायधीशों को नियुक्त करने की नीति  उसने अपनाई।
         कलेक्टरों को अभी तक माल विभाग के मुकदमों का निर्णय करने का अधिकार था। फलस्वरुप दीवानी न्यायाधीशों तथा कलेक्टरों के कार्यक्षेत्र को लेकर संघर्ष रहता था। अतः कार्नवालिस ने जो न्यायाधीश दीवानी अदालतों के लिए नियुक्त किए थे, उनका माल विभाग से बिल्कुल संबंध नहीं रहने दिया।
बांग्लादेश एक नजर ।
 *भूमि संबंधी सुधार:*
        भूमि संबंधी सुधार के लिए तो कार्नवालिस का नाम भारतीय इतिहास में विशेष रुप से उल्लेखनीय है ।
        अभी तक भूमि के लगान के संबंध में कोई निश्चित व्यवस्था नहीं थी। प्रतिवर्ष लगान संबंधी व्यवस्था एवं प्रबंध के कारण ना केवल कृषकों को विभिन्न असुविधाओं का शिकार होना पड़ता था, बल्कि राज्य को भी अत्यधिक समय तक अधिक कर्मचारियों की सेवा लेनी पड़ती थी। फिर भी समुचित आमदनी एवं बचत नहीं होती थी।अतः उसने सर जॉन शोर तथा जेम्स ग्राण्ट कि राय से फरवरी 1790 ईस्वी में लगान व्यवस्था के क्षेत्र में 10 वर्षीय प्रबंध लागू करने की घोषणा की तथा यह स्पष्ट कर दिया की संचालक समिति की स्वीकृति प्राप्त होने के उपरांत इसे स्थाई प्रबंध बना दिया जाएगा। मार्च 1793 ईस्वी में उसने स्थाई प्रबंध की घोषणा की।
 आर. सी. दत्त के अनुसार यदि किसी जाति की संपन्नता तथा प्रसंन्नता उसकी बुद्धि तथा सफलता की कसौटी है, तो 1793 ईसवी की स्थाई भूमि-व्यवस्था भारत में ब्रिटिश जाति द्वारा किए गए कार्यों में सबसे अधिक बुद्धिमतापूर्ण तथा सफलतम कार्य है।'
        इस तरह अभी हम कॉर्नवालिस के विभिन्न सुधारों के कार्यों का आलोचनात्मक अध्ययन करते हैं तो इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि उसने वारेन हेस्टिंग्स के द्वारा किए गए कार्यो को पूरा किया तथा नागरिक शासन की इमारत का निर्माण कराया
 17 दिसंबर का इतिहास यहाँ देखें ।

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