2016 में अनुवाद की कुछ किताबें
2016 की अनुवाद पुस्तकों पर एक लेख आजकल पत्रिका के लिए लिखा था. आज प्रस्तुत कर रहा हूँ- प्रभात रंजन
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हिंदी इस अर्थ में भी अखिल भारतीय भाषा कही जा सकती है कि हिंदी में प्रकाशित होने वाली पुस्तकों में प्रत्येक साल एक बड़ा हिस्सा विभिन्न भाषाओँ से अनूदित पुस्तकों का भी होता है। हिंदी में केवल के अंग्रेजी के माध्यम से ही अनुवाद-पुस्तकों का प्रकाशन नहीं होता है बल्कि हिंदी ने अनुवाद के माध्यम से भी विभिन्न भाषाओं के बीच पुल बनाने का काम किया है। यह एक अजीब विरोधाभास जैसा लगता है कि एक तरफ यह कहा जाता है कि हिंदी में किताबों की बिक्री कम होती है, उसका बाजार सिकुड़ रहा है लेकिन दूसरी तरफ यह सच्चाई भी है कि हिंदी में अनूदित पुस्तकों का बाजार बड़े पैमाने पर बढ़ रहा है। मुझे अंग्रेजी में प्रेम कहानियों के प्रसिद्ध युवा लेखक रविंदर सिंह का कथन याद आता है। उन्होंने एक बातचीत में कहा था, ‘मैं अंग्रेजी में लिखता हूँ क्योंकि उसका बाजार बड़ा है। लेखन मेरा कैरियर है और अंग्रेजी में लिखने से मेरी रोज़ी-रोटी चलती है। लेकिन मैंने अपने घर-परिवार के लोगों को, उड़ीसा में अपने शहर के लोगों को अपने किताबों के हिंदी अनुवाद ही भेंट में देता हूँ। क्योंकि वे हिंदी अधिक सहजता से पढ़-समझ पाते हैं। उस भाषा से वे खुद को रिलेट कर पाते हैं।’
हमने शायद ही इस बात की तरफ ध्यान दिया हो कि हिंदी में जिन लेखकों को सबसे अधिक रॉयल्टी मिलती है उनमें कई लेखक ऐसे हैं जो मूल रूप से हिंदी में नहीं लिखते। कुछ लेखकों के उदहारण दिए जा सकते हैं, तसलीमा नसरीन हैं, जो मूल रूप से बांगला लेखिका हैं लेकिन उनकी हर पुस्तक बांगला के साथ सबसे पहले हिंदी में प्रकाशित होती हैं। अंग्रेजी सहित बाकी भाषाओं में उनके अनुवाद बाद में ही होते हैं। इसी तरह चेतन भगत अंग्रेजी के ही सबसे अधिक बिकने वाले लेखक नहीं हैं बल्कि हिंदी में उनके उपन्यास अनुवाद के माध्यम से बड़ी तादाद में बिकते हैं। इसी तरह गुलजार, जावेद अख्तर जैसे उर्दू लेखकों के उदाहरण भी दिए जा सकते हैं जो मूल रूप से उर्दू में लिखते हैं, हिंदी फिल्मों के कारण उनकी अपार लोकप्रियता है और उनकी किताबें हिंदी में ही छपकर ही पाठकों तक पहुँचती है। इसी तरह मुनव्वर राना हैं, जो उर्दू के लोकप्रिय शायर हैं, लेकिन उनको एक बड़े अवाम तक मुशायरों के अलावा हिंदी में प्रकाशित उनकी किताबों ने भी पहुंचाया। उनको अपनी उर्दू किताबों से कई गुना अधिक रॉयल्टी हिंदी में प्रकाशित किताबों के लिए भी मिलती है। हालत यह है कि मुनव्वर राना की किताबें उर्दू से पहले हिंदी में छपा करती हैं। गुलजार की भी यही हालत है कि उनकी जितनी किताबें उर्दू में प्रकाशित नहीं हुई हैं उससे कहीं अधिक किताबें हिंदी में छपी हैं।
यही हाल उर्दू के लगभग सभी शायरों का है। उनको बड़ा पाठक वर्ग हिंदी में प्रकाशित किताबों के माध्यम से ही मिलता है। इस साल उर्दू शायरी की प्रकाशित किताबों में जौन एलिया के किताबों की धूम रही। एक अनाम से प्रकाशक एनीबुक प्रकाशन ने जौन एलिया के कविता संग्रह ‘गुमान’ का हिंदी में प्रकाशन किया जिसकी खूब चर्चा रही और ऑनलाइन बिक्री में भी धूम मची रही। जौन एलिया के बारे में यह कहा जाता है कि मजाज़ के बाद उर्दू के वे शायद दूसरे ऐसे शायर हैं मरने के बाद जिनकी ‘कल्ट फोलोविंग’ बढ़ती गई है। इसी साल उनकी शायरी का एक संकलन ‘मैं जो हूँ जौन एलिया हूँ’ वाणी प्रकाशन से ने भी प्रकाशित किया, जाने-माने विद्रोही शायर मुनीर नियाजी की चुनिन्दा शायरी की किताब ‘देर कर देता हूँ’ का प्रकाशन भी इसी साल इस प्रकाशन द्वारा किया गया।
पाकिस्तान की नए दौर की शायरा हुमैरा राहत की शायरी का संकलन ‘पांचवीं हिजरत’ का प्रकाशन राजपाल एंड संस प्रकाशन ने किया। जो लोग मुशायरों में जाते हैं उनके लिए राहत इन्दौरी का नाम अनजाना नहीं है। मंचों के सबसे लोकप्रिय शायर राहत इन्दौरी की शायरी की किताब इस साल मंजुल पब्लिशिंग हाउस से से आई- नाराज़। राहत साहब सामाजिक-राजनीतिक मसाइल को अपने शेरों में बखूबी पिरोना जानते हैं और इसीलिए दुनिया भर के मुशायरों में उनकी धूम रही है। लेकिन उनकी शायरी की किताबें अक्सर उर्दू से पहले हिंदी में ही छपती रही हैं। यह दिलचस्प बात है कि उर्दू शायरी की किताबें तो हिंदी में खूब छपती हैं लेकिन उर्दू गद्य के अनुवाद हिंदी में बहुत कम छपते हैं।
इसी तरह अंग्रेजी की की चर्चित किताबों के हिंदी अनुवाद प्रकाशित करने का ट्रेंड रहा है जो इस साल भी जारी रहा। इसके पीछे प्रकाशकों का तर्क यह रहता है कि अंग्रेजी में छपकर चर्चित हो जाने के बाद उन किताबों को हिंदी में अनुवाद करवाकर प्रकाशित करने से उनका अलग से प्रचार-प्रसार नहीं करना पड़ता। अंग्रेजी में चर्चा होने के कारण उनको हिंदी के पाठक भी हाथोहाथ लेते हैं। भारतीय अंग्रेजी के विश्वविख्यात लेखक सलमान रुश्दी की आत्मकथा ‘जोसेफ एंटन’ के प्रकाशन के बाद से ही उसकी खूब चर्चा हुई थी। वाणी प्रकाशन ने उसका हिंदी अनुवाद उसी नाम से प्रकाशित किया। सोशल मीडिया पर किताब किताब की पर्याप्त चर्चा हुई। एक उदाहरण फिल्म पत्रकार-लेखक यासिर उस्मान की पुस्तक ‘रेखा’ का दिया जा सकता है। यह किताब मशहूर अभिनेत्री रेखा की आधिकारिक जीवनी तो नहीं है लेकिन रेखा के रहस्यमय जीवन और उनकी फ़िल्मी सफ़र को लेकर बहुत रोचक शैली में लिखी गई इस पुस्तक की अंग्रेजी में खूब चर्चा हुई। जगरनॉट जैसे एक नए प्रकाशन से प्रकशित इस पुस्तक को प्रकाशक ने ‘रेखा’ नाम से हिंदी में भी प्रकाशित किया। इसी तरह अंग्रेजी के युवा लेखक हांसदा सोमेन्द्र शेखर को युवा साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिल चुका है. उनके कहानी संग्रह ‘आदिवासी शैल नॉट डांस’ की बड़ी चर्चा रही। किताब में आदिवासियों के जीवन, उनकी जीवन-शैली को काफी उन्मुक्त रूप से वर्णित किया गया है। इस साल इस किताब का प्रकाशन ‘आदिवासी नहीं नाचेंगे’ के नाम से राजपाल एंड संस प्रकाशन से हुआ। यह अच्छी पहल कही जा सकती है क्योंकि आमतौर अंग्रेजी के युवा लेखकों की पुस्तकें हिंदी में कम ही छपती हैं या जब तक उनको लेकर खूब चर्चा न हो जाए या किसी तरह का विवाद न हो जाए तब तक हिंदी में उनके अनुवाद की तरफ ध्यान नहीं दिया जाता है।
हिंदी में जिन विषयों पर रोचक शैली में, तथ्यपरकता को ध्यान में रखते हुए पुस्तकों का लेखन नहीं किया जाता है उन किताबों को भी हिंदी में प्रकाशित किया जाता है और पाठकों के बीच ऐसी किताबों को हाथोंहाथ लिया जाता है। इसके उदाहरण के लिए देवदत्त पट्टनायक की पुस्तकों को देखा जा सकता है। पिछले कुछ वर्षों में उन्होंने मिथक-कथाओं, पौराणिक कथाओं को नए सिरे से आम पाठकों के लिए लिखना शुरू किया। उनको एक नई विधा के आरंभकर्ता के रूप में देखा जाता है। मिथक कथा लेखक के रूप में, टीवी चैनलों पर मिथक कथाओं के व्याख्याकार के रूप में उन्होंने अपना एक बड़ा पाठक वर्ग बनाया है। पिछले अनेक सालों से अनेक प्रकाशकों ने उनकी किताबों का प्रकाशन किया है। इस साल भी उनकी कई किताबें हिंदी में अनुवाद के माध्यम से आई। उनकी किताब ‘बिजनेस सूत्र’ का प्रकाशन मंजुल बुक्स ने किया। इस किताब में यह बताया गया है कि व्यापार को लेकर भारतीय पौराणिक मान्यता क्या रही है? प्राचीन काल में भारत में व्यापार की क्या पद्धतियाँ थीं। वे भारतीय पारम्परिकता से सबसे बड़े स्वयंभू व्याख्याकार हैं। उनकी एक किताब इस साल और प्रकाशित हुई ‘भारत में देवी का स्वरुप’, जिसमें देवी की कथाओं के आधार पर देवी के भारतीय स्वरुप को समझाने की कोशिश की गई है। देवदत्त पट्टनायक की लिखने की शैली बहुत रोचक है। वे आधुनिक शैली के कथ्वाचक हैं इसलिए एक तरह की किस्सागोई उनकी किताबों में दिखाई देती है जो पाठकों को बांधे रखने में बहुत सफल कही जा सकती है। रूपा प्रकाशन से देवदत्त पट्टनायक की एक अन्य किताब अनुवाद के माध्यम से हिंदी में प्रकाशित हुई है, ‘मेरी गीता।’ गीता की न जाने कितनी व्याख्याएं लिखी गई हैं, न जाने कितनी टीकाएँ लिखी गई लेकिन देवदत्त पट्टनायक की इस किताब का पाठ भी कम रोचक नहीं है। उनके लेखन की सबसे बड़ी ताकत यह है कि वे प्राचीन, पारंपरिक पाठों को समकालीनता से जोड़ देते हैं जिससे युवाओं में उनका बहुत बड़ा पाठक वर्ग बना है।
इसी तरह एक और लेखक हैं जो रस्किन बांड। वे भारतीय अंग्रेजी के सदाबहार लेखक हैं। वे उन दुर्लभ लेखकों में हैं जिनके पाठक हर उम्र से आते हैं। गढ़वाल के पहाड़ी इलाकों को लेकर उन्होंने इतना अधिक और इतने प्रकार का लेखन किया है कि वह अपने आप में एक मिसाल है। बहरहाल, हिंदी में भी उनका नाम पाठकों में सुपरिचित है और हर साल उनकी अनेक किताबें हिंदी में प्रकाशित होती हैं। इस साल उनकी दो किताबें राजपाल एंड संस प्रकाशन से आई। एक, वे आवारा दिन, जो उनकी कहानियों का संकलन है और एक बार फिर किशोर उम्र से लेकर बड़ी उम्र तक के पाठकों के लिए समान रूप से पठनीय है। दूसरी किताब भी इसी प्रकाशन से आई, ‘अँधेरे में एक चेहरा’। इस पुस्तक में भी कहानियां हैं लेकिन उनका सन्दर्भ अलौकिक जीवन से है। रस्किन बांड ने एक बार कहा था कि वे भूत-प्रेत में विश्वास नहीं करते लेकिन उनको हर समय, हर जगह भूत नज़र आते -जंगल में, सिनेमा के बाहर भीड़ में और बार में। पिछले पाँच दशकों में लिखी उनकी सभी अलौकिक कहानियाँ इस पुस्तक में संकलित हैं। एक बार फिर यह कहने की जरुरत नहीं लगती कि हर उम्र के पाठकों के लिए इस संग्रह की कहानियां पठनीय हैं।
हिंदी में पाठकों का बड़ा वर्ग ऐसा है जो स्कूल-कॉलेजों में पढता है। लेकिन हिंदी में सबसे कम लेखन इसी वर्ग को ध्यान में रखकर किया जाता है। यानी ‘एक्सक्लूसिव रूप’ से इस पाठक वर्ग के मनोरंजन के लिए हलके-फुल्के ढंग के उपन्यास या अन्य तरह की किताबें नहीं लिखी जाती हैं। इसी वर्ग के पाठकों ने पहले चेतन भगत को अपनाया, बाद में उन्होंने रविंदर सिंह की प्रेम कथाओं को अपनाया। असल में हिंदी में श्रेष्ठ साहित्यिक समझी जाने वाली किताबों की बहुतायत है, लोकप्रिय के नाम पर जासूसी उपन्यास भी लिखे पढ़े जा रहे हैं, लेकिन आज के इस तकनीक संपन्न, सूचनासंपन्न युग में युवाओं का जीवन पूरी तरह से बदल चुका है। वे पुराने साहित्य से रिलेट नहीं कर पाते हैं, उनके जीवन सन्दर्भों को समझ नहीं पाते हैं लेकिन चेतन भगत या रविंदर सिंह के उपन्यास उनको अपने जीवन के आसपास लगते हैं। वे उसके सन्दर्भों, उसके पात्रों के साथ खुद को अच्छी तरह से जोड़ पाते हैं। इसी कड़ी में एक और नाम है सुदीप नागरकर का। आजलक के युवाओं में सुदीप नागरकर के उपन्यासों को पढने का ट्रेंड है। उसका पहला उपन्यास हिंदी में आया है- वो स्वाइप करके उतर गई मेरे दिल में। आज के जीवन सन्दर्भों में बनते बदलते रिश्तों की एक रूमानी कथा को तकनीकी दक्ष युवाओं की भाषा में कही गई है। पुस्तक का प्रकाशन राजपाल एकं संस ने किया है।
बात आज के जीवन सन्दर्भों, रिश्तों की हो रही है तो इससे मुझे एक और उपन्यास की याद आ गई। इसका प्रकाशन भी इसी साल हुआ है। फ्रेंच भाषा के लेखक डेविड फ़ोइन्किनोस का एक उपन्यास है ‘डेलिकेसी’। 2011 जब यह उपन्यास प्रकाशित हुआ था तब इसकी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर खूब चर्चा हुई थी। 2011 में इस उपन्यास को फ्रेंच बेस्टसेलर किताब का पुरस्कार मिला था। इसके ऊपर एक चर्चित फिल्म भी बनी थी। 2016 में यह उपन्यास हिंदी में आया। बहुत अच्छी तरह से इसके युवा लेखक ने इस उपन्यास में यह दिखाया है कि यह युग अनिश्चितता का है, कुछ भी निश्चित नहीं है, ऐसे में सोच समझ कर बनाये गए रिश्तों के बीच अचानक कोई औचक सम्बन्ध कायम हो जाता है और जीवन की दिशा बदल जाती है, निरुद्देश्य सी होती जा रही जिंदगी को एक मकसद मिल जात है। बहुत रोचक शैली में लिखा गया एक गंभीर उपन्यास है।
बात फ्रेंच उपन्यास की चल रही है तो याद आया कि 2014 में फ्रेंच लेखक पैट्रिक मोदियानो को साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला था। इस साल राजपाल एंड संस से उनके उपन्यास का मूल फ्रेंच से अनुवाद प्रकाशित हुआ- मैं गुमशुदा। मैं गुमशुदा, 2014 में साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित लेखक पात्रिक मोदियानो का सबसे महत्त्वपूर्ण उपन्यास माना जाता है और उनकी अन्य कृतियों की तरह इसकी पृष्ठभूमि भी उनका प्रिय शहर पेरिस है। मैं गुमशुदा कहानी है डिक्टेटिव गी रोलाँ की, जो अपना असली अस्तित्व और बीती ज़िन्दगी की हकीकत जानने की खोज पर निकल पड़ता है। गी रोलाँ अपनी याददाश्त खो चुका है और शायद इसलिए अपने अतीत को जानना-समझना उसके लिए बहुत ज़रूरी है। जैसे-जैसे गी अपने जीवन के बीते वर्षों की परतें हटाता है तो उसे लगता है कि वह अपनी ज़िन्दगी में कई रूप, कई अस्तित्व धारण कर चुका है।
बात जासूस की आई तो जासूसी उपन्यासों के अनुवाद की भी चर्चा कर लेते हैं। जो नेस्बो नॉर्वे के अत्यंत प्रसिद्ध जासूसी कथा लेखक हैं। उनके उपन्यास ‘द बैट’ का हिंदी अनुवाद इस साल यात्रा बुक्स-वेस्टलैंड से प्रकाशित हुआ है- एक हसीना का क़त्ल नाम से। सिडनी के अंडरवर्ल्ड की पृष्ठभूमि में लिखे गए इस उपन्यास में गहरा शोध किया गया और रहस्य-रोमांच की एक कथा के माध्यम से ऑस्ट्रेलिया के नस्लभेदी समाज की एक अलग ही तस्वीर प्रस्तुत की गई है।
हिंदी में एक और परिघटना धीरे धीरे घटित हो रही है। अंग्रेजी के प्रकाशक धीरे धीरे हिंदी में पुस्तकों का प्रकाशन कर रहे हैं। सेज बुक्स अंग्रेजी के एक प्रमुख प्रकाशक माने जाते हैं। हाल के वर्षों में नेताजी सुभाषचन्द्र बोस के जीवन को लेकर फिर से खूब चर्चा हुई। कई किताबें आई। माधुरी बोस की किताब ‘द बोस ब्रदर्स ऐन इन्डियन इंडेपेंडेंस: ऐन इनसाइडर्स अकाउंट’ का हिंदी अनुवाद प्रकाशित हुआ ‘बोस बन्धु और भारतीय स्वतंत्रता एक करीबी का विवरण’। माधुरी बोस सुभाषचन्द्र बोस की पड़नतिनी हैं। इस किताब के हिंदी में आने का अपना महत्व है।
किताबों की ऑनलाइन खरीदारी के कारण हिंदी किताबों में अनुवाद का बाजार तेजी से विकसित हुआ है। इसके माध्यम से अंग्रेजी में चर्चित किताबों के हिंदी अनुवादों का प्रचार भी हो जाता है और बिक्री भी बेहतर हो जाती है। हालात ऐसे हो गए हैं कि साल में हिंदी छपने वाली चर्चित किताबों में मूल रूप से हिंदी में लिखी गई किताबों के बरक्स अनूदित किताबों की धमक बढ़ने लगी है। अनेक प्रकाशक ऐसे हैं जो अनुवाद को प्रकाशित करने को प्राथमिकता देते हैं.
लेखक-प्रभात रंजन
A-39, allahabad bank society, mayur kunj, near noida checkpost, delhi-110096

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