खोदा पहाड़ निकला अकबर!
अकबर इतिहास के ऐसे नायक हैं जिनके साथ इतिहास ने सदा न्याय किया है. आम तौर पर साहित्य में वे किरदार नायक बनते आए हैं जिनके साथ इतिहास न्याय नहीं कर पाता. चाहे महाराणा प्रताप हों या दारा शिकोह इतिहास में इनके ऊपर जितना नहीं लिखा गया है साहित्य में लिखा गया है. बार-बार लिखा गया है. शाज़ी ज़मां के ‘अकबर’ को पढ़ते हुए यह सवाल सबसे पहले कौंधा था. आखिर अकबर की कौन सी छवि लेखक प्रस्तुत करना चाहता है. वह छवि जो इतिहाससम्मत है या वह जिसे अंकित करने में इतिहास चूक गया या तथ्यों के अभाव में इतिहास जिसको लेकर मौन है?
लेखक ने ‘अकबर’ की भूमिका में ही लिखा है कि इसमें ‘एक एक घटना, एक-एक किरदार, एक-एक संवाद इतिहास पर आधारित है.’ यानी लेखक कहता तो इसे उपन्यास है लेकिन इतिहास के हिसार से निकलना नहीं चाहता है. असल में शुरू में पढ़ते हुए, लिखने की शैली के कारण ‘अकबर’ जीवनी लगती है लेकिन अकबर के जीवन की घटनाएँ सिलसिलेवार तरीके से किताब में दर्ज नहीं की गई है. यह किताब शुरू होती है अकबर के जीवन की उस घटना से जिसको हालते अजीब कहा गया है. जब एक तरह से हाल की अवस्था में जाकर अकबर धर्म के बारे में ऐसा कुछ कहने लगा था जो कि उसने कभी पहले नहीं कहा था, बाद में नहीं कहा. उसका मन बेकाबू हो गया था. वह प्रसंग किताब में बहुत लम्बा चलता है.
बहरहाल, अकबर की सेक्युलर छवि को शाज़ी ने अपने इस तथाकथित उपन्यास में पुष्ट करने की बार-बार कोशिश की है. किताब में आम तौर पर ‘अकबरनामा’ के हवाले हैं और बदायुनी की लिखी एक ऐसी किताब के जो आधिकारिक नहीं है. किताब में अनेक प्रसंगों, अनेक हवालों के माध्यम से यह दिखाने की कोशिश की गई है कि भारत का जो बहुसंख्यक हिन्दू समाज था वह किस कदर अकबर से घुला-मिला हुआ था. एक प्रसंग में लेखक ने दिखाया है कि ब्राहमण भी अकबर को अपना गुरु मानने लगे थे.
मुझे इस किताब में सबसे अच्छा किस्सा बीरबल का लगा. शाज़ी ने बताया है कि बीरबल अकबर के सबसे नजदीकी थे, एक तरह से अकबर के मुंहलगे. इतिहास ने जिस बीरबल को हाजिरजवाब चुटकुलेबाज़ बना कर छोड़ दिया था उसके बारे में शाज़ी की इसी किताब से यह पता चला कि असल में उनको वीरवर की उपाधि दी गई थी जो कालांतर में बीरबल हो गई. वे बहुत वीर थे. बहरहाल, शाज़ी का यह दिखाना कि अकबर सबसे अधिक ग़मज़दा बीरबल की मौत पर हुए थे एक तरह से अकबर की उसी सेक्युलर छवि को पुष्ट करने के ख्याल से लिखा गया लगता है.
सवाल यह है कि क्या पहली बार अकबर की सेक्युलर छवि को किसी किताब में प्रस्तुत किया गया है? यही इस किताब की सबसे बड़ी मुश्किल है यह अकबर की पहले से बनी बनाई छवि को तथ्यों के घटाटोप से पुष्ट करने की कोशिश करती है. इसमें कोई शक नहीं है कि तथ्यात्मक रूप से इस किताब में कुछ भी गलत नहीं है. यहीं एक उपन्यास के रूप में यह असफल लगने लगता है और जीवनी के रूप में इसलिए मुकम्मल नहीं लगती क्योंकि किताब में जीवन की घटनाओं को विस्तार से नहीं लिखा गया है. हाँ, अंत में एक क्रोनोलोजी उनके जीवन की घटनाओं की दी गई है. प्रसंगवश, किताब में अकबर के मौत का प्रसंग बहुत भावुक है, वह जरूर किसी किस्सागो जैसा लिखा लगता है.
सबसे अधिक अकबर की भाषा चौंकाती है. ऐतिहासिक उपन्यासों के साथ यह चुनौती होती है कि उसमें किस तरह की भाषा को अपनाया जाए. प्राचीन इतिहास के किरदारों, प्रसंगों को लेकर जब भी लिखा जाता रहा है तो लेखक के पास संस्कृत की ओट लेने की सुविधा रहती है. चाहे ‘मुर्दों का टीला’ हो या ‘वैशाली की नगरवधू’. लेकिन मध्यकालीन मुग़ल नायक के जीवन पर लिखी गई इस किताब की भाषा क्या हो? यह एक बड़ा सवाल रहा होगा लेखक के सामने. इसीलिए किताब की शुरुआत खालिश उर्दू से होती है. अंत तक आते आते वह भाषा तत्सम प्रधान हिंदी में बदल जाती है.
इसमें कोई शक नहीं है कि ‘अकबर’ में बादशाह अकबर के कुछ दुर्लभ चित्रों का इस्तेमाल किया गया है, कवर पर ढाल है, अन्दर भी कुछ दुर्लभ चित्र हैं. लेकिन लेखक और राजकमल के संपादक जिसको बहुत बड़ी घटना समझ रहे हैं वे शायद यह भूल जाते हैं कि किताब अंततः अपने पाठ के कारण याद की जाती है. पाठकों के ऊपर लिखे का ही प्रभाव अंकित रह जाता है.
अंत में, शाज़ी ज़मां का ‘अकबर’ सही को सही कहने की एक कोशिश भर है उससे अधिक कुछ भी नहीं. लेखक जीवनी और उपन्यास के गुंजलक में ऐसा उलझा है कि आधा तीतर आधा बटेर बनकर रह गई है किताब. बचपन से अकबर महान के किस्से हम सब पढ़ते आए हैं. यह अकबर महान का वयस्क पाठ है, बचपन की भावुकता के साथ. बहुत सारे हवालों- बहुत सारे उद्धरणों के साथ.
अंत में, एक बात और प्रकाशक की ओर से बार बार यह कहा जा रहा है कि लेखक की 20 साल की शोध का परिणाम है अकबर. इसके लिए बस इतना ही कि लगता है लेखक के पढने की रफ़्तार धीमी है. वर्ना इस किताब में हवाले तो उन्हीं किताबों के हैं जो आसानी से उपलब्ध रहे हैं, 'अकबरनामा' जैसी किताबें तो इन्टरनेट पर भी उपलब्ध हैं. जिसके हवाले किताब में सबसे अधिक दिए गए हैं. यही कहना होगा- खोदा पहाड़ निकला अकबर.
प्रभात रंजन
समीक्षित पुस्तक- अकबर; लेखक- शाज़ी ज़मां; प्रकाशक- राजकमल प्रकाशन; मूल्य- 350 रुपये(पेपरबैक)

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