लद्दाख में कोई रैंचो नहीं रहता

आज दिल्ली विश्व पुस्तक मेले का आखिरी दिन है. इस मेले में एक किताब रामजी तिवारी की आई है 'लद्दाख में कोई रैंचो नहीं रहता'.  वाणी प्रकाशन से प्रकाशित इस किताब में अंडमान, लद्दाख, थाईलैंड, केरल और बलिया के एक पिछड़े इलाके के यात्रा संस्मरण दर्ज हैं. सुबह सुबह किताब का एक अंश, जो लद्दाख यात्रा को लेकर है- मॉडरेटर 
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सुबह हम अलची की प्रसिद्द मोनेस्ट्री को देखने के लिए जाते है | सिंधु नदी के ठीक किनारे पर स्थित यह मोनेस्ट्री लद्दाख में सबसे पुरानी और सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती है | इस मोनेस्ट्री की कला और पेंटिंग्स पर लद्दाखी कम और आरंभिक बुद्धिस्ट तथा कश्मीरी परम्परा का प्रभाव अधिक दिखाई देता है | अलची गाँव में ही लद्दाख की बहुप्रतिक्षित जल विद्युत परियोजना का निर्माण कार्य चल रहा है | 45 मेगावाट की प्रस्तावित इस परियोजना को 2010 में ही तैयार हो जाना था, लेकिन उस समय सीमा के दो वर्ष गुजर जाने के बाद भी यह निर्माण के दौर में ही है | पूरे लद्दाख में बिजली की समस्या बहुत गंभीर है | माँग 50 मेगावाट की और उत्पादन 5 मेगावाट का | काम कैसे चलेगा | अधिकतर होटलों, सैन्य मुख्यालयों और सरकारी प्रतिष्ठानों में बिजली की आवश्यकता जेनरेटरों के द्वारा पूरी की जाती है | मेजबान अंकल के चेहरे की नसें पुनः लद्दाख की उपेक्षा की ओर मुड़ती हुई तनने लगती हैं | “क्या श्रीनगर और दिल्ली में बैठे लोग इस बात को नहीं जानते कि लद्दाखी लोगों के जीवन में भी उजाले की आवश्यकता है |”

अलची से लेह लौटते समय हम पुनः जैसलमेर सरीखी उस खुली जगह से गुजरते हैं, जहाँ लामाओं की मुद्रा में मुंडन कराये कतारबद्ध उन पहाड़ों ने आसमान को तम्बू जैसा अपने मस्तकों पर टांग रखा है | 30 किमी लंबे इस तम्बू की वजह से ही इस पहाड़ में इतनी समतल जगह बन पाई है | आगे लेह में प्रवेश करते हुए हम ‘हाल आफ फेम’ देखने के लिए रुकते हैं | इसे देखते हुए यह अनुमान लगाया जा सकता है कि, शान्ति और सहिष्णुता की इस भूमि ने अपने आपको सुरक्षित रखने के लिये स्वातंत्रोत्तर इतिहास में भी काफी कुर्बानियां दी हैं |

शाम को लद्दाखी संस्कृति पर बात छिड़ जाती है | अंकल कहते हैं कि “हमारी संस्कृति भारतीय और कश्मीरी संस्कृति से कम और तिब्बती संस्कृति से अधिक मेल खाती है | भूगोल, पर्यावरण, जीवन, मृत्यु, धर्म, विवाह, संगीत, साहित्य, भाषा और लिपि आप जिस भी विधा में तुलना करें, इसकी  साम्यता तिब्बती संस्कृति से ही मिलती है | यहाँ फसलों का मौसम चार–पांच महीनों का ही होता है, जिसमे मुख्यतया गेंहू और जौ की फसलें उगाई जाती हैं | अर्थव्यस्था का आधार सेना, पर्यटन और सरकारी सब्सिडी पर ही टिका हुआ है | खेती और पशुपालन का आधार इसे थोडा मजबूत बनाता है, लेकिन इतना नहीं कि लद्दाख दुनिया के साथ कदम मिला सके |

लद्दाख के पिछडेपन में उसके भूगोल से अधिक उसकी उपेक्षा का योगदान है | आप शिक्षा को ही लीजिए | इंटरमीडिएट की पढ़ाई के बाद की शिक्षा पलायन से ही संभव है | पूरे लद्दाख में केवल एक ही कालेज है | अब आप स्वयं तय कीजिये कि इतने बड़े क्षेत्रफल को वह कैसे उच्च शिक्षा प्रदान कर सकता है | हाल ही में की गयी विश्वविद्यालय की घोषणा भी कारगिल के खाते में चली गयी है | यहाँ न तो कोई इंजीनियरिंग कालेज है, और न ही मेडिकल कालेज | व्यावसायिक शिक्षा के नाम पर भी लद्दाख में नील बटा सन्नाटा ही है |”
ओह....! अंकल जब भी बोलते हैं , बात लद्दाख की बदहाली और उसके प्रति बरते गए भेदभाव की तरफ ही क्यों बढ़ जाती है ? उन्हें देखकर यह तय करना बहुत मुश्किल हो जाता है कि वे अपने हाथों को किसलिए मल रहे हैं ? क्या यह सर्दी का एहसास है या लद्दाखी समाज की उपेक्षा का प्रतिबिम्ब ...?

वे पूछते है  “ऐसी स्थिति में चंडीगढ़ , जम्मू और दिल्ली भेजकर अपने बच्चे- बच्चियों को उच्च शिक्षा दिला सकने की क्षमता कितने लोगों के पास हो सकती है ?’ भला हो लद्दाख को जनजातीय दर्जा देने वाले दो दशक पुराने उस कानून का, जिसने पोलियो से ग्रसित हमारी पीढ़ियों को एक बैशाखी तो मुहैया करा दी |” क्या बात है ...? तो उन्होंने बच्चों को पढाने की संभावित कल्पना में भी श्रीनगर का नाम नहीं लिया |

अगली सुबह हम पैंगोंग झील की यात्रा के लिए निकलते हैं | 150 किमी की दूरी पर लेह से पूरब दिशा की ओर स्थित इस यात्रा का रास्ता एक घंटे तक आनंद लेने की इजाजत देता है, जब तक यह मनाली जाने वाली मुख्य सड़क के रूप में चलता है | लेकिन 30-40 किमी बाद जैसे ही मनाली का रास्ता हमें पूरब दिशा की ओर धकेलता हुआ दक्षिण की ओर निकल जाता है, हमारे पास उस पर आगे बढते हुए दम साध लेने के अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं बचता है | एक बार जब चढाई शुरू होती है, तो फिर रुकने का नाम नहीं लेती | हम मैदानी लोगों के लिए पहाड़ी चढाई वैसे ही आफत बनकर आती है, लेकिन यह चढ़ाई तो किसी दु:स्वप्न से कम नहीं | गाड़ी में खाई की तरफ बैठा हुआ आदमी यह अंदाजा भी नहीं लगा सकता कि यहाँ से फिसलने के बाद वह कहाँ जाकर टिकेगा | चढाई के साथ ही पहाड़ों का गंजापन दूर होने लगता है और उनके माथे पर दुधिया बर्फ की शक्ल में जुल्फें दिखाई देने लगती हैं |

इस रास्ते का सबसे ऊँचा ‘पास’ चांग-ला 17000 फीट की ऊँचाई पर स्थित है | भारतीय सेना के कुछ छोटे-छोटे डब्बे नुमा घरों के अलावा यहाँ एक काफी शाप भी है | ड्राइवर राम्चोस यहाँ उतरने के पहले कुछ हिदायतें भी देता है | “बहुत धीरे चलियेगा, साँस यहाँ बहुत उखडती है |” लद्दाख में चार दिन बिताने के बाद हम सांस उखडने का मतलब जानने लगे हैं | हम पूरी सावधानी बरतते हैं, लेकिन शून्य से पांच डिग्री नीचे के तापमान में 17000 फीट की ऊँचाई पर फेफड़ों में भरने लायक आक्सीजन जुटा पाना मुश्किल ही नहीं, वरन असंभव दिखाई जान पड़ता है | बर्फीली हवाए हमारे गरम कपड़ों का मजाक उड़ाती हुई लगातार आजू-बाजू से निकलती रहती हैं | काफी पीने का मजा इतना भी आ सकता है, पहली बार महसूस होता है | बस अखरता है तो यहाँ का रेट चार्ट | मेरे हिसाब से इसके रेट-चार्ट को कैफे-डे की कनाट-प्लेस स्थित दूकान से बदल देना चाहिए |

दूर, जितनी दूर निगाह जाती है, बर्फ की चादर ही दिखाई देती है | पेड़, पौधे, घास, झाड़ियाँ, जीव-जंतु किसी का भी अता-पता नहीं | इस दुधिया धरातल पर सड़क की शक्ल में कई किलोमीटर लंबा, काला सा सांप पड़ा है, जिसकी पीठ पर रेंगती हुई हमारी गाड़ी अक्साई चीन की तरफ बढ़ रही है | एक घंटे रेंगने के बाद वह सांप चौड़ा होकर घाटी में बदल जाता है, और तब पता चलता है कि लेह में रह रहे सैन्य बलों के जवान फिर भी भाग्यशाली हैं | हर दस पन्द्रह किलोमीटर बाद पड़ने वाली उन सैन्य चौकियों के मुकाबले तो काफी भाग्यशाली, जहाँ आदमियों को देखने के लिए उनकी आँखे तरसती रहती हैं | लगभग दो दशक पहले आम जनता के लिए खोली गयी इन जगहों पर जाने के लिए आज भी परमिट की आवश्यकता पड़ती है |

झील की झलक 10 किमी पहले से ही मिलने लगती है | हम उसके किनारे पहुचते है | और तब उत्साह में यह भूल ही जाते हैं, कि समतल दिखने वाले इन किनारों की ऊँचाई भी समुद्र तल से 13000 फीट की है | खैर लद्दाख में इस समझने के लिए किसी विशेषज्ञ का साथ होना जरुरी नहीं है | ठीक 100 मीटर की चहलकदमी आपको औकात में रहना सिखा देती है | दुर्गापूजा से कालीपूजा के बीच का समय होने के बावजूद सैलानी यहाँ बहुत कम हैं | भारतीय पर्यटन मानचित्र पर इस समय को बंगाली सीजन के नाम से जाना जाता है | असम से लेकर गुजरात तक और श्रीनगर से कन्याकुमारी –अंडमान तक लगभग हर साल इनसे हमारा सामना होता है | बंगालियों के लिए प्रसिद्द इस सीजन में घूमने के कई फायदे हैं | बच्चो की पढ़ाई अपने मध्यांतर में होती है, लगभग पूरे देश का मौसम खुशनुमा होता है और उससे बढ़कर एक दशक पुराना मेरा अनुभव यह बताता है कि यह मौसम कम बजट वाले पर्यटकों के लिए सर्वाधिक मुफीद और उपयुक्त है | बंगाली भद्र जन मूल्यों को रियायत की निम्न संभव सीमा तक घटा चुका होता है, जिसमे आपको अतिरिक्त मेहनत की आवशयकता नहीं पड़ती |
हम झील के किनारे-किनारे टहलते हैं, जहाँ के पहाड़ थोड़े शर्मीले हैं | उन्होंने पानी के इस विपुल भण्डार के लिए 150 किमी लम्बी और 2 से 8 किमी चौड़ी जगह छोड़ रखी है | अब यह अलग बात है कि खारे पानी की सर्वथा अनुपयुक्त उस झील पर भी हमने देश की लकीरें खींच दी हैं | लकीर के 45 किमी तक पश्चिम में भारत और उसके 100 किमी पूरब तक चीन का हिस्सा पड़ता है | दूर पहाड़ों को दिखाते हुए वहाँ गश्त में तैनात सेना के जवान चीन की सीमा के आरम्भ होने की बात बताते हैं | सवाल तुरत ही मन में कौंधता है “जब यहाँ के बाद रास्ता समाप्त हो जाता है, तब सीमा रेखा की देखभाल कैसे होती है ..?” वे बताते हैं “हमारी और उनकी छोटी छोटी टुकडियां हफ्ते-दो हफ्ते की पैदल चढाई के बाद अपनी सीमाओं को जांचती परखती रहती हैं |” मतलब कि रास्ते की सैन्य चौकियां इनके मुकाबले काफी भाग्यशाली हैं |...क्या बात है ..? तो जीवन की तरह भाग्य भी कुल मिलाकर आनुपातिक ही होती है |

झील का रंग पहाड़ों के अनुसार बदलता रहता है | सूरज की किरणें किनारों पर पड़ने वाले पहाड़ों के रंग को पानी के ऊपर चढ़ा देती हैं | और जब किरणें बादलों की ओट में सो रही होती हैं, तब पहाड़ भी अपने रंगों पर नींद की चादर डाल देते हैं |

“लेकिन रैन्चों ( फिल्म -3 इडीयट का नायक ) कहाँ खड़ा हुआ था ? और किस जगह पर खड़े होकर उसने यह व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त किया था कि ‘चुम्बन’ करने के दौरान नाक बीच में नहीं आती ?”

हमारी उत्कण्ठा का ख्याल रखते हुए हमारा ड्राईवर रामचोस गाड़ी को झील के किनारे-किनारे 8 किमी और आगे ले जाता है | वों हमें उस लम्बी, पतली सी जगह की तरह इशारा करते हुए उतार देता है | हर कोई आमिर और करीना की स्टाइल में अपना पोज देता है | कि तभी दूसरे दल के ड्राइवर की झल्लाहट हमारे कानों में गूंजती हैं | “तंग आ गया हूँ इस सवाल को सुनते सुनते कि रैन्चों कहाँ खड़ा हुआ था | यह लद्दाख है, कोई दिल्ली- बम्बई नहीं, जहाँ खड़े होने की जगह भी इतनी महत्वपूर्ण होती है | रैन्चों खुद भी नहीं बता सकता कि वह कहाँ खड़ा हुआ था |” वह अपनी बात को समझा देने पर उतारू है | टूटी-फूटी हिंदी में उसका गुस्सा आखिर फूट ही पड़ता है “लद्दाख में कोई रैन्चों नहीं रहता |” और फिर लद्दाखी में एक कहावत कहता है, जिसका अर्थ हमारा ड्राईवर बाद में हमें समझाता है | “यह भूमि आदिकाल से पवित्र रही है , किसी के आने जाने से इस पर कोई फर्क नहीं पड़ता |”

माहौल थोडा गंभीर हो जाता है | वापसी में हमारा ड्राईवर इस बात का खुलासा करता है कि “यहाँ के स्थानीय लोगों का गुस्सा इस बात के कारण बढ़ जाता है, जिसमे किसी के आने-जाने से इस जगह की प्रसिद्धि को जोड़ा जाता है | हमारी हजारों साल की सभ्यता पर यह एक सवालिया निशान जैसा है, जिसमे हमारी कोई गलती नहीं | अब यदि शेष भारत हमें नेपाली और चीनी समझता है, या रैन्चो के कारण लेह को जानता पहचानता है तो यह उसकी समझ-सीमा हो सकती है | उसे हम क्यों सहन करें |”

रात को लगता है कि हमने अगली सुबह ‘खारदुंग-ला’ टॉप पर जाने के लिए परमिट बनवाकर गलती ही की है | इतनी थकान के बाद कल 18000 फीट की चढाई कैसे चढ़ी जा सकती है | लेकिन सुबह अपनी भूमिका को चरितार्थ करती हुई हमें ठोक पीटकर पुनः खड़ा कर देती है | हम लेह से निकलने वाले तीसरे सबसे महत्वपूर्ण रास्ते पर, जो कि उत्तर दिशा में जाता है, आगे बढते हैं | इसी सड़क पर दुनिया की सबसे ऊँची मोटर प्रयुक्त सड़क है | यह सड़क लद्दाख की प्रसिद्द नुव्रा घाटी होते हुए सियाचीन के आधार शिविर तक जाती है | हम जैसे ही लेह से 10 किमी आगे निकलते हैं, चढाई का दौर आरम्भ हो जाता है | और एक बार जब यह दौर आरम्भ हो जाता है, तो ऐसा लगता है कि ‘पैंगोंग झील’ जाते समय की चढाई फिर भी गनीमत वाली है | तीखे मोड़ और संकरे रास्तो के किनारे की खाईयां आपको जीवन से निर्लिप्त बना देती है | उन पर गुजरते हुए यह एहसास होने लगता है कि कल और उसके बाद की योजनाओं पर यहाँ से उतरने के बाद ही सोचना ठीक रहेगा | इस वक्त केवल और केवल वर्तमान ही हमारे साथ चल रहा होता है | भविष्य का महीन धागा तो किसी भी मोड़ पर हमसे छूट सकता है |

हम दिन के एक बजे खारदुंग-ला टॉप पर पहुचते हैं | हिदायते हमारे पास पड़ी हुई हैं | आधे घंटे से अधिक वहाँ नहीं रुकना है, हल्का गुनगुना पानी पीना है, केवल चहलकदमी करना है | बिलकुल...अब हिदायतों के बिना भी हम लोग यही करते रहते हैं  | इस भरी दोपहरी में भी सूरज पर ग्रहण लगा हुआ है | हम सेना के शिविर में पहुचते हैं | बर्फीली हवाएं अपने शबाब पर हैं | यहाँ लगा मापक यन्त्र तापमान को शून्य से 6 डिग्री नीचे बताता है | सेना के अधिकारी कहते हैं “यहाँ हर दूसरे व्यक्ति को आक्सीजन लेने की आवश्यकता पड़ती है | और वह भी तब, जब उसे आधे घंटे से कम ही रुकने की इजाजत है |”  ओह ... ! तो लोग खारदुंग-ला टॉप पर केवल आक्सीजन लेने के लिए ही आते हैं ..?  बाद में ऐसा लगता है कि वहाँ आधे घंटे रुकने की हिदायत लिखकर निरर्थक श्रम ही किया गया है | इससे अधिक रुकने की हिम्मत आखिर है भी कितने लोगों में ?

सियाचीन का आधार शिविर यहाँ से 184 किमी है | सेना के अधिकारी महोदय, जो कि एक डाक्टर हैं, बताते हैं कि सियाचीन पर तैनाती से पहले प्रत्येक सैनिक को महीनों की अनुकूलन प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है | बिना उसके शून्य से सदा नीचे रहने वाले उस तापक्रम पर जीवन को दो-चार दिन भी नहीं चलाया जा सकता | चाहें उन्हें पहनने और ओढ़ने के लिए कितनी ही बेहतर सुविधाएँ क्यों न प्रदान की गयी हों | 18400 फीट की ऊँचाई वाला यह रास्ता अपनी दुर्गमता के लिए तो कुख्यात है ही, दिल और रक्तचाप के मरीजों के लिए किसी शामत से कम नहीं | अक्टूबर में पड़ी ताजा बर्फ इस बात की गवाही देती है कि आने वाली सर्दियों में यहाँ क्या होने वाला है | हाँ.....यहाँ आने वाला कोई भी ड्राईवर अपने यात्रियों को नहीं खोजता, वरन यात्री ही उस ड्राइवर को खोजते और कोसते हैं कि इसे यहाँ इसे चाय पीने की तलब क्यों पड़ी है | उन्हें लगता है कि पांच मिनट और रुकने के लिए फेफड़े में कम से 100 सांसे और भरनी होंगी, और इधर ठीक अगली सांस के लाले पड़े हुए हैं |

जैसे–जैसे हमारी गाड़ी वापस नीचे उतरने लगती है, भविष्य की योजनाओं को भी हमारे भीतर उतरने के लिए सीढ़ी मिलती जाती है | उन योजनाओं को, जो अभी तक हमारी साँसों के साथ ‘खारदुंग-ला’ टॉप पर अटकी हुई थी | हम होटल में लौटते हैं, जहाँ संकेतों की भाषा में एक दूसरे से बात होती है कि यदि नींद खुली तो रात का खाना खायेंगे, अन्यथा सुबह इसके बारे में सोचेंगे कि खाना खाने की जीवन में कितनी भूमिका होती है | बिस्तर पर पड़ते ही कम्बल, शरीर के लिए स्वीच की भूमिका निभाता है | कि जिसको ओढते ही हमारी सारी हलचलें बंद हो जाती हैं | सिवाय धडकनों के |

अगली दिन लेह शहर को देखने का इरादा मन में आता है | इस आराम वाली सुबह के बाद दोपहर में  उसके मुख्य बाजार में पहुचता हूँ | सिहरन भरी ठण्ड के बीच की गुनगुनी धूप में भी बाजार खाली पड़ा हुआ है | यहाँ जैसे-जैसे सूरज घाटियों में उतरता जाता है, खालीपन भी सूनेपन में बदलता जाता है | ‘तो आखिर यह भरता कब है ..?’  ओह ...!  इस प्रश्न का उत्तर प्रश्नकर्ता के मन मिजाज पर निर्भर करता है | यदि उसके पास दरियागंज, कनाट प्लेस, चौपाटी और धर्मतल्ला वाला मापक यन्त्र है, तब तो यह उन जगहों की मध्य रात्रि जैसा भी कभी नहीं भरता | इस शहर के भरने का अपना अलग ही पैमाना है | जुलाई और अगस्त के महीनों में जब यहाँ पर्यटक आते हैं, तब यह थोडा भरा दिखाई देता है, अन्यथा अक्टूबर के इस महीने में बाजार के इस मुख्य मुहाने पर बैठकर आप अपने छोटे बेटे-बेटी के साथ वही खेल खेल सकते हैं, जिसे बचपन में हम अपने गाँव कस्बे की सड़क के किनारे बैठकर खेला करते थे | बाएं से आने वाली गाड़ी हमारी और दायें से आने वाली तुम्हारी | हाँ....लेह के इस मुख्य बाजार में गाड़ियों के साथ-साथ आप आदमियों को भी जोड़ सकते हैं |


                                                               रामजी तिवारी
                                                               बलिया , उ.प्र.
                                                              मो.न.- 09450546312


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