इरशाद खान सिकंदर की कहानी 'बग्गड़ बाबा'



इरशाद खान सिकंदर की यह कहानी आजकल के माहौल के बहुत अनुकूल लगी. लिखने में जोर भी है- मॉडरेटर                        

प्रस्तुत गद्य कोई रचना नहीं अपितु एक घटना है! और मैं कोई रचनाकार नहीं केवल सूत्रधार हूँ! मेरा मानना है कि कुछ घटनाएँ बाक़ायदा मनुष्य शरीर धारण करके माँ की कोख से पैदा होती हैं,और जीवन पर्यन्त घटित होती रहती हैं!
जैसे कि ‘’बग्गड़ बाबा’’ को ही ले लीजिए!
उनपर मुसलमान होने का आरोप था,अब ये आरोप कितना सही था और कितना ग़लत, ये तो ख़ुदा ही बेहतर जाने,मैं तो केवल इतना बता सकता हूँ कि किन सबूतों और दलीलों की बिना पर लोग उन्हें मुसलमान सिद्ध करने पर तुले हुए थे!
देखिये साहब, पहली बात तो ये है कि उनका नाम रहमतुल्लाह ख़ाँ था और जिसपर अल्लाह की रहमत होगी वही न रहमतुल्लाह होगा?
सो तस्वीर साफ़ है, अगर वो मुसलमान न होते तो रहमतुल्लाह न होते! और ख़ाँ भी तो मुस्लिमों ही की पंजीकृत जाति है! सो  इन दलीलों से  कई बार सचमुच यक़ीन  होने लगता था कि वो मुसलमान ही हैं! अब ये और बात है कि वो अपने अस्ल नाम रहमतुल्लाह को स्वंय भी भूल चुके थे और अपने तख़ल्लुस ‘’बग्गड़ बाबा’’ से पुकारे और पहचाने जाते थे!  वो कहते हैं न कि ज़िंदगी से बड़ा कोई दूजा उस्ताद नहीं तो साहब इसी ज़िंदगी नामक उस्ताद ने उन्हें ‘’बग्गड़ बाबा’’ तख़ल्लुस अता किया था! ये बेशक़ीमती तख़ल्लुस उन्हें कैसे प्राप्त हुआ इसकी भी एक लम्बी कहानी है जिसे मैं संक्षेप में सुनाने का प्रयास करता हूँ
...हुआ यूँ कि जब रहमतुल्लाह साहब छोटे थे तो एक दिन उनके वालिद पर अल्लाह की रहमत हुई और “अब्बा हुज़ूर” के ज़ेह्न में ये रौशन  ख़याल आया कि रहमतुल्लाह को मदरसे में दाख़िल करा दिया जाय (सच तो ये है कि अब्बा हुज़ूर अपनी मुसीबत मुदार्रिसों के मत्थे मढ़ना चाहते थे )आनन फ़ानन में दाख़िला हो भी गया!
जनाब रहमतुल्लाह कुल जमा तीन दिन ही मदरसे गये और इन्ही तीन दिनों ने उन्हें जीवन भर के लिये बग्गड़ बना दिया! उन दिनों मदरसों में एक रिवाज आम था,वो ये कि ,मदरसे की जो ज़मीन खेती के लिये होती थी उसमें मज़दूरों के बजाय तालिबे इल्म यानी विद्यार्थी ही काम किया करते थे! रहमतुल्लाह को मदरसे में दाख़िला मिलते ही जो पहला सबक़ दिया गया वो ये था कि रहमतुल्लाह भी अन्य बच्चों के साथ आज खेत में हरी मिर्च की रोपाई करेंगे! घटना में आगे बढ़ने से पहले एक  अतिरिक्त किंतु अति आवश्यक बात ये भी  सुनते चलिए..’’कुछ फ़सलें ऐसी होती हैं जिनकी बोआई होती है अर्थात उनके बीज खेत में छिड़क दिये जाते हैं और कुछ फ़सलों के बीज, पहले खेत में छिड़के जाते हैं, और वो बीज जैसे ही अपने दुनिया में होने का एहसास कराने लगते हैं उन्हें जड़ से उखाड़ लिया जाता है और पुनः अपने मनचाहे खेत में लगाया जाता है, इस मुन्तक़िल करने की प्रक्रिया को रोपाई कहते हैं!तो साहब इस तरह प्याज़,धान,और हरी मिर्च इत्यादि की रोपाई होती है’’!
आइये अब हम लौटते हैं अपनी मुख्य घटना पर... तो बात चल रही थी  ‘’कि रहमतुल्लाह भी अन्य बच्चों के साथ आज खेत में हरी मिर्च कि रोपाई करेंगे’’!
तो साहब रहमतुल्लाह भी अन्य बच्चों के साथ खुरपा और खाँची में बेहन(हरी मिर्च के उन नन्हे पौधों को ‘बेहन’ कहा जाता है) धरे खेत की जानिब चल दिये...यक-ब-यक रहमतुल्लाह के कोमल मन में एक विचार आया कि
‘’ससुर हम इहाँ पढ़ै आये हैं कि मजूरी करै’’!!
और उनका चेहरा कठोर हो गया! मन ही मन सोचे कि
‘पढ़ै लिखै की अइसी तइसी छोलब घास चराइब भईंस,पीयब मट्ठा,बनबै पट्ठा’!!! इस ख़़याल के कई हमख़़याल भी ज़ेह्न में आये और  आते चले आये इतने में खेत भी आ गया! और तभी जब एक सीनियर बच्चे ने ज़रा रौब से अपनी सीनियरटी झाड़ते हुए उन्हें काम समझाना शुरू किया तो वो पटककर उस बच्चे की छाती पर चढ़ बैठे,और अपने तकिया कलाम ‘ससुर’ के साथ संबोधन आरम्भ किया –
‘’ससुरू एतना रौब से हमरे बाप बोलैं त हम उनके गाँ...मा पैना (डंडा) कै देई, तूं हा कवने खेत की मुरई(मूली)...??
नीचे पड़ा हुआ बच्चा इस एक वार में ही रहमतुल्लाह् से रहम की भीख माँगने लगा और बाक़ी बच्चे सहम कर खड़े हो गये..रहमतुल्लाह को अन्ततः रहम आ गया और रह्तुल्लाह ने वही नीचे गिरे बच्चे के सीने से उठते हुए अपना पहला ऐतिहासिक भाषण दिया’-
‘’ससुर लोग कान खोलके सुन ल्यो,आज अउर आज के बाद, मदरसा हो चाहे मदरसा से बहरे, हम जइसा कही वइसै कि ह्यो, नाही त ससुर लोग ई खुरपा सीधा तोहरे लोग के ओही मा जाई....’’
इस तरह बड़ी देर तक वो अपने नियम क़ानून बच्चों को समझाते रहे और उन्होंने अपने इस ऐतिहासिक भाषण की अंतिम पंक्ति में सबको समझाया कि आज ‘बेहन की रोपाई कैसे होगी?
 उन्होंने एक बच्चे से कहा कि
‘बेहन क जड़ खुरपा से काट द्यो’
बच्चे ने तत्काल हुक्म की तामील की! अब कहा कि
‘बेहन खेत मा रोप द्यो अउर कटी जड़ लइ जायके कहूँ लामे (दूर) फेँकि आव””न रहै बाँस न बजै बाँसुरी..अ धियान रहै कि केहू जनि मोलबी साहब से न बतायो अ बतायो त ई हमार खुरपा याद रख्यो! ....
तो साहिबो ये था रहमतुल्लाह का मदरसे में पहला दिन!
अब आइये सिलसिला तोड़े बग़ैर अगले दिन पर भी बात कर लेते हैं!
अगले दिन  जब रहमतुल्लाह साहब मदरसे पहुँचे तो उन्हें सबक़ दिया गया कि वो आज बच्चों के साथ पत्तियाँ बुहारने बाग़ में जायेंगे..अभी कल का गुस्सा शान्त नहीं हुआ था कि आज फिर जले पर नमक  छिड़क दिया गया..रहमतुल्लाह साहब ज़ाहिरी तौर पर बड़ी ही शालीनता से एक आज्ञाकारी शिष्य की तरह ‘’खरहरा’’ और ‘खँचोली’ उठाये अन्य बच्चों के साथ बाग़ की तरफ़ रवाना हो गये. अब इस घटना में आगे बढ़ने से पहले कुछ बातों को समझ लेना बहुत ज़रूरी है! उस ज़माने में होता ये था कि जो बच्चे और उस्ताद मदरसे में ही रहते थे, उनके भोजन के लिये अनाज चंदे की शक्ल में गाँव के सभी घरों से इकठ्ठा किया जाता था ये अनाज इकठ्ठा करने का काम आमतौर पे जुमेरात को किया जाता था! बच्चे झोला लेकर घर घर जाते और लोग झोले में आटा,चावल,दाल वगैरह डाल दिया करते थे इस चंदे को ‘’चुटकी’’ कहा जाता था! आज के समय में इसे शिक्षा कर कह सकते हैं!
इस तरह जो अनाज इकठ्ठा होता उससे मदरसे में रहने वाले लोगों का एक सप्ताह का काम चल जाता था !अब भोजन को पकाने के लिये ईंधन भी तो चाहिए?
सो कुछ बच्चों को बाग़ में भेजकर पत्तियाँ बुहरवाई जाती थीं, पत्तियों से बेहतर  मुफ़्त का  ईंधन कहाँ मिलता?
साथ ही साथ आप लोग ये भी जान लें कि ‘’खरहरा’ एक प्रकार का बड़ा झाडू होता है और ‘खँचोली’ ग्रामीणों द्वारा विशेष रूप से तैयार किया गया एक बड़ा लकड़ी का टोकरा होता है जो भूसा, घास, या अन्य इसी तरह की वस्तुओं को ढोने में उपयोगी होता है!
तो...रहमतुल्लाह और उनके अन्य साथी खरहरा और खँचोली लेकर बाग़ की जानिब पत्तियाँ बुहारने चल पड़े!
रास्ते भर रहमतुल्लाह बिल्कुल शांत भाव से चलते रहे! और अन्ततः बाग़ तक पहुँच गये!लेकिन बाग़ में पहुँचते ही शान्ति भंग हो गयी और तूफ़ान ने अपने उग्र रूप में दस्तक दे ही दी!
‘’ससुर लोग कबो अपने घर मा एक गिलास पानी अपने हाथ से लइके नाईं पीये होइहो अउर हियाँ चले आये हौ पाती बहारै..??
कल की सभा में जो बच्चे शामिल थे वो इस गर्जना से तुरंत सकते में आ गये और अपने अपने स्थान पर सहम कर खड़े हो गये उनके देखा-देखी अन्य बच्चे भी उसी तरह खड़े हो गये! हज़रत रहमतुल्लाह ने अपनी लम्बी तक़रीर के आखिरी जुमले में हुक्म दिया..
’’ससुर लोग मुँह का ताक रहे हो? ‘खँचोली’ अ ‘खरहरा’ तूर(तोड़)डालो..अ नाहीं त इहे खरहरा तोहरी गाँ...मा डालके हम तूर देबै..’’
पता नहीं बच्चों पर इस अंतिम वाक्य का असर हुआ या पूरी तक़रीर का, बच्चों ने खरहरा और खँचोली को तोड़ दिया! किंतु एक बच्चे के भय ने प्रश्न का रूप धारण कर लिया उसने पूछा कि
‘मोलबी साहब क कउन जवाब दिहा जाई...??
इस गुत्थी को भी रहमतुल्लाह ने तत्काल सुलझाया...
‘’देखौ..सब लोग ई खरहरा खँचोली उठाय ल्यो अउर रोवत रोवत मोलबी साहब के पास चलो अउर उनसे कह्यो की बड़का गाँव वाले मिलके हम सबका बहुत मारिन हं..खरहरा खरहरा मारिके, खरहरा खँचोली तूर दिहिन हं... अ कहिन हं कि आज के बाद अगर एह मुँह देखाई देहौ त अबकी खपड़ोई(खोपड़ी) फोर देब! अ हाँ केहू जनी ढेर हुसियारी मत देखायो नाहीं त ई खरहरा याद रख्यो सीधा तोहरे लोग के ओही मा जाई ......’’
बच्चों ने रहमतुल्लाह् साहब की बात का अक्षरशः पालन किया ..तो ये था रहमतुल्लाह साहब का मदरसे में दूसरा दिन.!
अब तीसरे  अंतिम व ऐतिहासिक दिन का भी वर्णन सुन लीजिए ....
’’ससुरा एक बच्चा गद्दार निकल गया उसने मोलबी साहब को पिछले दोनों दिनों की कहानी विस्तारपूर्वक सुना दी थी.
मोलबी साहब ये कहानी सुनते ही पाजामे से बाहर हो गये (हालाँकि उन्होंने लुंगी पहनी हुई थी लेकिन क्या किया जाय मुहावरा यही है)
मोलबी साहब ने रहमतुल्लाह को सबक़ सिखाने की ठानी..मन ही मन कई प्रकार की सज़ाएँ  सोचने के बाद आखिर में वो इस नतीजे पर पहुँचे कि रहमतुल्लाह का सर मुंडवाकर उसे मुर्ग़ा बना दिया जाय और बच्चों से उसके सर पर कुटकी (चोट)मरवाई जाय! ये सज़ा मोलबी साहब को सबसे उपयुक्त लगी और उन्होंने नाई को अपने औज़ारों के साथ मदरसे बुलवा लिया,
उधर एजाज़ नाई मदरसे में हाज़िर हुए इधर हज़रत रहमतुल्लाह..
मोलबी साहब ने एक इशारा किया तो बच्चों ने लपककर रहमतुल्लाह को दबोच लिया! और अल्लाह ताला के बाद जिसके आगे सभी लोग सर झुकाते हैं यानी एजाज़ नाई के आगे पेश कर दिया..
एजाज़ नाई अपना उस्तरा तेज़ करने लगे और रहमतुल्लाह साहब ने अपनी गालियों का पोथा खोल लिया ..
एजाज़ नाई अपने ख़ानदान के जिन सदस्यों को ख़ुद नहीं जानते थे रहमतुल्लाह ने अपनी कथा में उनका भी वर्णन बड़ी सुंदरता से किया!
और एजाज़ नाई इस कथा से इतने प्रभावित हुए कि बग़ैर वक्त गँवाए उन्होंने उस्तरा रहमतुल्लाह की खोपड़ी पर फेरना शुरू कर दिया..
रहमतुल्लाह जी चार चार बच्चों की  बलशाली भुजाओं में क़ैद होने के सबब कुछ देर छटपटाकर शान्त हो गये और ख़ामोशी से सर मुंडवाने लगे..
अभी उनका आधा ही मुंडन हुआ था कि उन्हें एजाज़ नाई के जिस्म के उस भाग में जहाँ इस वक्त उनकी नज़र पड़ रही थी कोई कटहल सी भारी वस्तु झूलती नज़र आई..रहमतुल्लाह की निगाहें वहीं टिक गयीं
इधर लड़कों का  बल भी कुछ कम हो गया था और उनकी पकड़ ढीली पड़ गयी थी इसी दरमियान एजाज़ नाई ने ज्यों ही रहमतुल्लाह के सर से उस्तरा हटाया और चाहा की एक बार और उसकी धार तेज़ कर लें..रहमतुल्लाह साहब ने निशाना साधकर एक मुक्का उस कटहल सी लटकती वस्तु पर दे मारा और लड़कों की पकड़ से छूटकर अपना अधमुंडा सर लिये भाग खड़े हुए!
एजाज़ नाई अपना कटहल थामे वहीं लेट गये और उनके चेहरे पर एक्सप्रेशन तो ज़बरदस्त आये किंतु आवाज़ नहीं आई!
हाँ मोलवी साहब ने ज़रूर खुदकलामी की ‘’बहुतै बग्गड़(बिगड़ैल) है....’’
ये था हज़रते रहमतुल्लाह का मदरसे में तीसरा व अंतिम दिन!
उसके बाद  रहमतुल्लाह कभी मदरसे न गये और इन तीन दिनों में घटित घटना पूरे इलाक़े में आग की तरह फ़ैल गयी और मोलवी साहब की ज़बान से निकला ‘’बग्गड़’ लफ़्ज़ उनका तख़ल्लुस बन गया!
इस घटना के बाद पूरा गाँव उन्हें ’बग्गड़’ ही पुकारने लगा!
बड़े बुज़ुर्ग बग्गड़वा कहते हमउम्र बग्गड़ या बग्गड़ भाई कहते कुछ जो बहुत आत्मीयता दिखाते वो बग्गड बाबू कहते!
उम्र के साथ साथ बग्गड़ की ज़िंदगी में जो मुख्य घटनाएं घटीं उनमें से कुछ का उल्लेख निम्नलिखित है...
-‘पढ़ै लिखै की अइसी तइसी छोलब घास चराइब भईंस.... वाली कहावत को चरितार्थ करने के लिये उन्होंने फ़ौरन अब्बा हुज़ूर से ज़िद करके भैंस तो नहीं किंतु एक गाय मंगवा ली..और उस गाय की सेवा में रम गये और घास छीलना गाय चराना मट्ठा पीना उनके प्रमुख शौक़ हो गये...

- धीरे धीरे उनका बग्गड़पन विकराल रूप धारण करता चला गया और वो देहात की सभी गालियाँ कंठस्थ कर गये जब वो गालियाँ  भी उन्हें कम पड़ने लगीं तो उन्होंने नई नई गालियों का स्वयं आविष्कार आरम्भ कर दिया जिनका यहाँ मौखिक उदाहरण पेश करना संभव नहीं है..संक्षेप में ये जान लें कि यदि उन गालियों को एकत्रित किया जाता तो एक अच्छा-ख़ासा ‘गालीकोश’ तैयार हो सकता था ठीक वैसे ही जैसे ‘शब्दकोष’ मुहावराकोश इत्यादी होते हैं ...

-एक समय पर बग्गड़ के जीवन में एक दुर्घटना भी घटी यानी कि उनकी शादी हो गयी.और उसके बाद उनके घर में कई छोटी-छोटी घटनाओं यानी बच्चों ने जन्म लिया लेकिन सब के सब नालायक़! किसी में भी बाप वाली बात नहीं थी वो कहते हैं न कि ‘’शेर की कोख में सियार जनम लेता है’’ सो वही हाल यहाँ भी था.

- धीरे धीरे बग्गड़ की कीर्ति इस क़दर फ़ैल गयी कि दूर-दराज़ के गाँव में भी जहाँ कहीं कुछ भी अव्यवहारिक होता लोग फ़ौरन उसे बग्गड़ से जोड़ देते! परिणामस्वरूप कई दंतकथाएं और कई क़िस्से बग्गड़ के नाम से स्वतः ही जुड़ते और प्रसिद्ध होते गये..

पुराने लोग नई पीढ़ी के बच्चों को बग्गड़ (जो कि उम्र के ऐतेबार से अब बाबा कहलाने लगे थे)के क़िस्से सुनाते और बच्चे उन क़िस्सों को बड़ी श्रद्धा से सुनते...

-बग्गड़ बाबा के विषय में ये प्रसिद्ध था कि वो एजाज़ नाई और मदरसे पर अपनी विशेष श्रद्धा रखते हैं और इन दोनों का ज़िक्र आते ही वो बड़ी देर तक अपनी श्रद्धा प्रकट भी करते हैं ..
किंतु इस अध्याय में कुछ नई चीज़ें भी पता नहीं कब कैसे जुड़ गयीं!
वो ये कि बग्गड़ बाबा एजाज़ नाई और मदरसे की तरह अल्लाह मियाँ और जमातियों से भी विशेष लगाव रखते हैं किसी ने इस अध्याय में एक कड़ी और जोड़ी कि वो सलाम करने पर सलाम करने वाले की सात पुश्तें बखान डालते है..’जितने मुँह उतनी बातें’..

-नई पीढ़ी ने एक दिन फ़ैसला कर लिया कि अब सुनी-सुनाई बातों पर बिल्कुल यक़ीन नहीं किया जाएगा एजाज़ नाई और मदरसे वाली बात तो सिद्ध हो चुकी है बाक़ी बातों को भी आज़माकर देखा जाय यानी जमात, अल्लाह मियाँ, और सलाम...

...तो साहिबो गाँव के लड़के योजनाबद्ध तरीक़े से एक दिन,  एक एक कर बग्गड़ बाबा के रास्ते में आने लगे और उन्हें सलाम करने लगे..
बग्गड़ बाबा ने जवाब तो किसी के भी सलाम का नहीं दिया लेकिन ताबड़तोड़ तीन सलाम की चोट अपने ऊपर बर्दाश्त न कर पाए! और ज्यों चौथे सलाम का वार हुआ तो बाबा ने सलाम करने वाले को लाठी लेकर दौड़ा लिया साथ ही साथ उसकी सात पुश्तों को भी याद किया अंत में ये तर्क दिया कि ‘’ससुरु हम का हज करके आये हैं कि हमका सलाम क र थ्यो!’’ ?
सो प्रैक्टिकल करने के बाद नई पीढ़ी ने मान लिया कि सलाम वाली बात झूठ नहीं है.नतीजतन छोटे बड़े सब उन्हें रोज़ सलाम करने लगे और उसके बाद क्या होता होगा आप स्वंय कल्पना कर सकते हैं!
अब रह गया मामला अल्लाह मियाँ और जमात का तो तय हुआ कि जमात जब आएगी तब देखेंगे फिलहाल अल्लाह मियाँ वाले मुआमले को देख लेते हैं!
सो अगले दिन जब बाबा खेत जोत रहे थे तो एक लड़का उधर से गुज़रा उसने जान बूझकर बाबा को सलाम नहीं किया सिर्फ़ ये कहा कि
 ‘’बाबा आज जुमा है कुछ वक्त अल्ला मियाँ के लिये भी निकाल ल्यो’’ !बाबा चुप रहे
थोड़ी देर बाद उधर से एक दूसरे सज्जन भी गुज़रे उन्होंने भी कहा ‘’बाबा कबो नमाजो वमाजो पढ़ लिहा करो...
अभी उन साहब का जुमला पूरा भी नहीं हुआ था कि धूप और पसीने से तर बाबा की खोपड़ी भन्ना उठी
 ‘’बहनचो...अगर हम नमाज पढ़ै जाई त हर जोतै तोहरे बाप अइहें कि अल्ला मियाँ..?हमरे आगे क पैदा आये हौ हम्मै चरावे...’’?
वो साहब अब इससे आगे का बखान यानी बग्गड़ बाबा की ज़बानी अपने पुरखों को आशीर्वाद नहीं दिलवाना चाहते थे सो दुम दबाकर भाग खड़े हुए!
लेकिन इससे ये तय हो गया कि बग्गड़ बाबा की अल्लाह मियाँ से भी ठनी हुई है ..और उस दिन से  सलाम के साथ लोग उन्हें नमाज़ के लिये भी निरंतर प्रेरित करने लगे!
अब बच गया था मुआमला जमात का सो वो मुबारक दिन भी आ ही गया गाँव में जमाती लोग आये, तो गाँव के लड़कों ने उन्हें बग्गड़ बाबा के घर का रास्ता दिखा दिया.
बग्गड़ बाबा उस वक्त अपनी गाय का पगहा(गले की रस्सी)खोल रहे थे जमाती लोग पहुँचे सबने कोरस में बाबा को सलाम किया बाबा ने जवाब में अपने अब्बा हुज़ूर की तरफ़ बरामदे में इशारा करते हुए कहा कि
‘’मालिक ओहर(उधर)हैं ओहर जाव’’
जमातियों ने कहा कि उन्हें उनसे ही बात करनी है बाबा बोले
‘’मालिक जब ऊ हैं त हमसे का बात करिहौ जउन भी बात करै क होय उनहीं से करौ हमार भेजा न चाटौ’ 
मौलाना भी कहाँ हार मानने वाले थे उन्होंने अंततः बग्गड़ बाबा को इस बात पर राज़ी कर लिया कि वो दो मिनट सिर्फ़ उनकी बात सुन लें फिर जैसा उनका मन कहे करें..और क़ुदरत का करिश्मा देखिए मौलाना की दो मिनट की दीन ईमान की बात का बग्गड़ बाबा के ज़ेह्न पर इतना गहरा असर हुआ कि  उनके अन्दर सोया ईमान जाग पड़ा और वो उसी समय मुसलमान हो गये और इस गुफ़्तगू में उन्हें ख़याल भी न रहा कि रोज़ जिस गाय को वो ख़ुद चराने जाते थे आज इन्तेज़ार करते करते स्वंय चरने चली गयी है!
मौलाना साहब के इसरार पर बग्गड़ बाबा सब सुध बुध खोकर मस्जिद की तरफ़ संभवतः अपने जीवन की पहली नमाज़ अदा करने  चल पड़े!
बाबा के इस परिवर्तन का किसी को अनुमान न था सो तमाम लड़के जो इधर उधर ख़ास मकसद से खड़े थे! बेचारे अपना सा मुँह लेकर आहिस्ता आहिस्ता वहाँ से खिसकने लगे और इस नातीजे पर पहुँचे कि बग्गड़ बाबा की जमातियों से ख़ूब छनती है!
ऐसा नहीं है कि बग्गड़ बाबा कभी नमाज़ नहीं पढ़ते थे!
साल में दो नमाज़ ईद और बकरीद तो वो ईदगाह में अदा करते ही थे किंतु मस्जिद में उनकी ये पहली फ़र्ज़ नमाज़ थी!
हाँ ये सत्य है कि उन्हें वुज़ू बनाना नहीं आता था उसका सबब भी आप लोग समझ ही सकते हैं !

शाम का समय है सूरज मुश्किल से हाथ भर डूबने को रह गया है बाबा असर की नमाज़ पढ़के चले आ रहे हैं और मन ही मन सोच रहे हैं कि कोई उनसे पूछे ‘’बाबा कहाँ से आ रहे हो ‘?
और वो गर्व से बताएं कि
‘अल्लाह के घर से’’
लेकिन अफ़सोस कोई पूछने वाला न मिला
“ससुरु लोग ख़ाली सलाम करने के लिये बाबा को ढूँढते हैं!
बाबा अभी अपने दुआरे की तरफ़ मुड़े ही थे कि दुआरे पर काफी भीड़ दिखाई दी! भक् से बाबा का कलेजा मुँह को आ गया! बाबा लगभग दौड़ते हुए अपने दुआरे तक पहुँचे! भीड़ को चीरते हुए आगे बढ़कर देखा तो उनकी गाय मरी पड़ी है! कैसे मरी? कोई कह रहा है साँप ने काट लिया तो कोई कह रहा है किसी ने जहर दे दिया सच्चाई खुदा ही जाने ....लेकिन बग्गड़ बाबा ने गला फाड़कर रोते हुए सबकी शंका का समाधान किया
‘’सब गलती वोह नमाज की है न हम नमाज पढ़ै जातें न हमार गाय मरत!
किसी ने बाबा को समझाने की कोशिश की कि बाबा ई गलत बात है नमाज अपनी जगह अ मरनी  हरनी अपनी जगह ए में नमाज क कवन दोष?
 बाबा को उस समय उनका मश्वरा ज़ह्र लग रहा था अगर ऐसा नाज़ुक मौक़ा न होता तो वो उनको बताते लेकिन अभी तो पीड़ा  से उनकी छाती फटी जा रही  थी और उनके दिलो दिमाग़ में ये बात घर कर चुकी थी कि सारा क़ुसूर नमाज़ ही का है बग्गड़ बाबा की आँखों से मूसलाधार बारिश हुए जा रही थी जो कई दिनों तक चलती रही!पुराने लोग बताते हैं कि अबसे पहले अपनी अम्मा के मरने पर वो इस क़दर रोये थे!

गाय मरने के अगले ही दिन की बात है सुबह का वक़्त है  सूरज अपनी माँद से एक हाथ बाहर निकल आया है  बाबा खटिया(चारपाई)पर बैठे घास पीट रहे हैं और गाय का बछड़ा खूँटे में बँधा बड़े ही वियोग से पाँय पाँय कर रहा है
संभवतः वो अपनी माँ को पुकार रहा है!
बाबा की आँखों से आँसू टुप टुप घास पर गिर रहे हैं
 बछड़े की  पाँय पाँय बार बार बाबा के कानों से टकराती है!
बाबा अचानक उठते हैं और किचकिचाकर बछड़े को दो डंडा खींचकर मारते हैं और फट पड़ते हैं
‘’ससुरु एक नमाज पढ़ा त तोहरी महतारी चली गयी अब्बै दुई रकात पढ़ देब त तोरहू झंझट साफ़ होई जाई नाहीं त चुप्पै रह्यो)’’
और आँसुओं की एक तेज़ धार उनके गालों पर दौड़ने लगी
फिर उन्हें ख़याल आया कि यार रो तो हम दोनों ही रहे हैं बस हमारे रोने में बड़प्पन है अउर इसके रोने में लड़कपन!
ये ख़याल आते ही वो बछड़े के क़रीब आये और बड़े ही अपनेपन से ढाँढस बंधाते हुए उसके सर पे हाथ फेरा तो बछड़ा पाँय पाँय करके चुप हो गया!

बग्गड़ बाबा की पहली नमाज़ ही आखिरी साबित हुई ऐसा नहीं कि इस घटना के बाद वो कभी मस्जिद नहीं गये एक दिन हुआ ये कि उनका बछड़ा कुलाँचे मारता हुआ मस्जिद के अन्दर घुस गया था तो बग्गड़ बाबा उसे पकड़ने के लिये मस्जिद के अन्दर गये थे! सुनते हैं कि इमाम साहब ने इसपर बग्गड़ बाबा को फटकार भी लगाई
‘’क्या बग्गड़ भाई आपको इतनी तमीज़ तो होनी चाहिए कि ये अल्लाह का घर है’’
और इस फटकार पर बग्गड़ बाबा लज्जित भी हुए थे
‘’अब का कहें इमाम साहब  ई बात हम त अच्छी तरह समझ रहे हैं लेकिन जानवर का कइसे समझाई’’!?
अब साहब इस घटना की अंतिम कड़ी भी सुन लीजिए जिस तरह बग्गड़ बाबा का सम्पूर्ण जीवन विवादास्पद रोमांचक और मनोरंजक रहा उसी तरह उनकी मौत भी अद्भुत रही!

बग्गड़ बाबा उन लोगों में से थे जो नहाने को पानी की बरबादी समझते थे लेकिन बुढ़ापे में एक दिन उनपर नहाने की धुन सवार हुई और वो कुएं पर पहुँच गये जुमे का दिन था सो कुँए पर उन लोगों की ज़ियादा भीड़ थी जो आमतौर पे सिर्फ़ जुमे को ही नहाते और नमाज़ पढ़ते थे!
सबने लाख समझाया कि बाबा हट जाओ आपको तो नमाज़ पढ़ना नहीं है नमाज़ियों को पहले नहाने दो पर बाबा टस से मस न हुए!
ख़ूब देर तक नहाते रहे और जब जी भर गया तो घर लौट आये!
घर लौटकर उन्होंने अपने एक बेटे को बुलाया और उससे कहा कि वो उनके लिये अभी कफ़न लेकर आये! बाबा की इस अव्यवहारिक मांग पर बेटा तनिक भी आश्चर्यचकित न हुआ क्योंकि बग्गड़ बाबा कभी भी कुछ भी लीक से हटकर कर सकते थे! जब बेटे और पड़ोसियों के लाख समझाने पर भी वो अपने कफ़न की मांग पर अड़े रहे तो लोगों ने हार मानकर बेटे को समझाया कि
‘’बुढ़ापे का दिमाग़ है जो कहते हैं लाकर दे दो ई शुरू के ही ज़िद्दी हैं आज कवनो नई बात थोड़ी है...’’
सो बेटे ने वादा किया कि वो अभी जुमा  पढ़ने जा रहा है जुमा बाद वो बाज़ार जाकर कफ़न ले आएगा! वो मान  गये  उन्हें  कोई जल्दी नहीं थी उन्होंने वहाँ एकत्रित लोगों को सम्बोधित किया
 ‘’हमार कहा सुना माफ़ कि ह्यो’’
लोग बाबा की बात पर मुस्कुराते हुए तितर-बितर हो गये उस दिन जो भी उनसे मिला उन्होंने सबसे कहा
 ’हमार कहा सुना माफ़ कि ह्यो’
जुमे बाद जब बग्गड़ बाबा के बेटे ने उन्हें कफ़न लाकर दिया तो बड़े खुश हुए और ख़ुशी ख़ुशी वो वो कफ़न ओढ़कर सो गये और  सोते सोते उन्होंने फिर दोहराया ‘’हमार कहा सुना माफ़ कि ह्यो’’
(समाप्त)
संपर्क सूत्र-9818354784
मेल- ik.sikandar@gmail.com

    



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