जब नाश मनुज पर छाता है वह नारायण बन जाता है
नॉर्वे-प्रवासी मूल मिथिला निवासी पेशे से डॉक्टर वेशे से व्यंग्यकार प्रवीण कुमार झा आजकल फेसबुक पर किसिम किसिम का संगीत ज्ञान देने लेने में लगे थे. लेकिन यूपी की चुनाव लीला देखकर लगता है उनसे रहा नहीं गया. प्रकट हुए नारायण अवतार में- मॉडरेटर
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कुरूक्षेत्र में पानी पटाया जा रहा है, कल युद्ध की तैयारी है। पांडव नेट-प्रैक्टिस कर रहे हैं। कौरव अपने लोग गिन रहे हैं कि पूरे सौ हैं कि नहीं। थोड़ी देर गिनती की, फिर अक्कर बक्कर बम्बे बो, अस्सी-नब्बे पूरे सौ कर पूरा कर दिया और सब तितर-बितर हो गए।
नारायण अपने रूम में टाँग पसारे पेपर पढ़ रहे हैं। पेपर में क्या है? दृष्टद्युम्न ने अस्वत्थामा को ट्वीट कर अपशब्द कहे, और अस्वत्थामा के फौलोवरों ने ट्रॉल कर दुर्गति कर दी। इसकी कड़ी निंदा की जा रही है। रोज का यही ड्रामा है। बाकी अखबार तो वही। मत्स्य प्रदेश में रथ पलटा। विराट में कर्फ्यू। कुछ देर में नींद आ गई, आँख खुली तो सामने गुलदस्ता लेकर अर्जुन।
"नारायण! चलिए, रथ आपको ही चलाना है।"
"पूरी उमर तुम्हारी रथ चलाऊँ? मेरे भी कुछ स्वप्न हैं।"
"कैसे स्वप्न?"
"सुना है, राजनीति में पार्टी बदले बिना मोक्ष नहीं मिलता।"
"उमर हो गई, अब कौन घास देगा आपको?"
"पूरी सेटिंग हो चुकी है। मैनें पार्टी बदल ली है। अब मोक्ष की प्राप्ति होकर रहेगी।"
अर्जुन रोते-धोते निकले, दरवाजे की कुंडी में फँसकर कुर्ता भी फट गया।
उधर अलग ही ड्रामा चल रहा है। अश्वत्थामा और गुरू द्रोण मुँह फुलाए बैठे हैं।
"जानते हो अश्वत्थामा? मुझे धर्म ईष्ट है, तुम्हे सत्ता।"
"आपकी बात समझ नहीं आई पिताश्री।"
"तुम्हें खूब समझ आई। तुम स्वांग रच रहे हो।"
"सच पूछिए तो आपकी बात किसी को भी समझ नहीं आती। खैर छोड़िए, आपके भाव से लग रहा है, आप नाराज हैं।"
"रण में मैं और काका कृपा आगे रहेंगें, तुम पीछे।"
"अब साफ है आवाज। अच्छा किया सुपारी थूक दिया। ये अजीबो-गरीब आइडिया देता कौन है आपको? कहाँ बुढ़ापे में आगे लड़ेंगें?"
"हम लड़ेंगें। बस कह दिया सो कह दिया।"
"लड़िए, जरूर लड़िए। मार्गदर्शन आपका ही होगा, रथ पर हम सवार होंगें।"
"कौन सा रथ? अपने पास तो साइकिल थी।"
"हाँ हाँ! वही। सवार मैं रहूँगा। आपसे न चल पाएगी अब। और ये सब दुश्मनों की चाल है। उल्लू बना रहे हैं आपको।"
"मुझे कोई उल्लू नहीं बना सकता बच्चे।"
"आप नारद-वारद के चक्कर में न पड़ें, वो नारायण का आदमी है।"
"नारायण ने तो खुद पार्टी बदल ली।"
"तभी तो। और एक बात। ये लोग चिल्लायेंगें 'अश्वत्थामा हत'। तो पूरा सुन लेना। 'नरो वा कुंजरो वा' भी। ये नहीं कि घुटने टेक दिए।"
"बेटा आशु! तुम तो सवा सेर निकले। चिरंजीवी भव।"
"कहाँ डुप्लीकेट आशीर्वाद दे रहे हैं आप? चिरंजीवी तो मैं हूँ ही। कहिए, विजयी भव।"
"तू साइकल दे, तो कहता हूँ।"
"अरे रखो आशीर्वाद। मैं नहीं देता साइकल-वाइकल।"
"जब नाश मनुज पर छाता है.."
"फिर कहीं का डायलॉग कहीं मार रहे हैं आप। चलिए, सो जाइए। सुबह रण है।"
रणभेरी बिगुल बजा रहे हैं। कौरव चद्दर तान कर सो रहे हैं। अर्जुन को ड्राइवर नहीं मिल रहा, रथ पर बैठकर चने खा रहे हैं। नारायण हेडलाइन्स पढ़ने में व्यस्त हैं। चाय की चुस्की के साथ। गुरू द्रोण और कृपा आँख बंद कर ध्यान-मग्न हैं। बीच-बीच में अस्वत्थामा साइकल की घंटी बजाकर चिढ़ा रहे हैं। शूतपुत्र कर्ण का लिंग परिवर्तन होकर कर्णावती हो गया है, और उन्हें पूर्वाभास हो रहा है कि रथ दलदल में फँसेगा। धृतराष्ट्र संजय को सुबह से ढूँढ रहे हैं, कि न्यूज एंकरिंग करें। संजय इस्तीफा देकर नया 'वेंचर' तलाश रहे हैं।
अब कुरूक्षेत्र में बस मैं हूँ और वेद व्यास हैं। मैं भूमि पर चित और वेद व्यास मेरे छाती पर सवार हैं। मैं त्राहि माम् करता उछला और फिर विलायती स्प्रिंग गद्दे में धँस गया।

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