'गन्दी बात' के लेखक क्षितिज रॉय से कुछ अच्छी बातें



इस पुस्तक मेले में युवा लेखक क्षितिज रॉय का उपन्यास आने वाला है 'गन्दी बात'. आज जानकी पुल की उनसे बातचीत- मॉडरेटर 
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1.  आपने डी स्कूल से समाजशास्त्र की पढ़ाई की है। फिर हिंदी में लिखना आपको गंदी बात नहीं लगती?
'हिंदी' में लिखना है, ऐसा सोच के कभी लिखा नहीं. कहानियाँ लिखनी है जो सामने वाले को हंसा, रुला या फिर कहीं न कहीं से उद्वेलित कर सके ऐसा सोच के लिखने की सोची. दूसरी बात, डी स्कूल से पढ़ाई करने के दौरान ही मैं लेखन को काफी गंभीरता से लेने लगा था - पात्रों और घटनाओं को खोजने की जुगत में लगा रहता था, और इस दौरान मैंने पाया कि मेरे इर्द गिर्द के लोगों की सेंसिबिलिटी, चाहे वो कितने भी अंग्रेजीदां क्यूँ न दीखते हों, भीतर ही भीतर से भारतीय/ या इंडियन ही थे. और जब आप इस सेंसिबिलिटी के पीछे जाते हो तो 'हिंदी' चाहे उसका स्वरुप कुछ भी हो, उससे आपका सबका पड़ता ही है.फिर भाषा उतनी महत्वपूर्ण चीज़ नहीं रह जाती जितना की कथ्य!

२. गंदी बात बोले तो?

गंदी बात बोले तो हाशिये पर के सवाल, मुंह पर दुपट्टा बांधे हुई बॉय फ्रेंड से मिलने जाती लड़की के भीतर का गुस्सा, एमएलए साहिब की गाड़ी चलाते लड़के की खीझ, भाषाई आतंक, सही और गलत को किसी ख़ास राजनीतिक अथवा वैचारिक फ्रेमवर्क में फिट करने की जल्दी, बौद्धिकता की एकपक्षीय अवधारणा, कॉमन सेन्स का कहानियों से गायब होना और कई अनकहे सवाल जिन्हें पूछने पर हम मिनटों में किसी ख़ास तमगे से सुशोभित कर दिए जाते हैं.

आप पहले अंग्रेज़ी में लिखते थे। आपका एक उपन्यास भी अंग्रेज़ी में आया था। उसके बारे में बताइए कुछ?

इसकी शुरुआत ग्यारहवीं क्लास में, डीपीएस आर के पुरम में हुई. वहां मेरे कुछ दोस्त थे - उनमें से कोई तारंतिनों की फिल्मों का दीवाना था, तो कोई एरिक क्लैपटन और बीटल्स के गानों और उसकी पूरे सामाजिक- राजनीतिक दर्शन के बारे में बातें कर रहा था. उन्हीं दिनों में उपमन्यु चटर्जी के उपन्यासों - इंग्लिश, अगस्त और 'वेट लॉस' को पढ़ा, लगा यार मैं भी ऐसे ही लिखूंगा. साथ में घर पे पिता जी इंग्लिश के शिक्षक थे. तो खाने की मेज पर वो टेनिसन, कीट्स और शेली की कविताओं पर बात करते थे, मुल्क राज आनंद और रबिन्द्रनाथ टैगोर की कृतियों से उन्होंने ही जान पहचान करायी. तो ये कुछ लोग थे जिन्होंने इंग्लिश में लिखने से पहले इंग्लिश में सोचने पर विवश किया. फिर उसी दौरान बारहवीं के बाद मैं बोर्ड्स के रिजल्ट का इंतज़ार करता हुआ पटना में था और मैंने बड़े करीब से वहां के एजुकेशन सिस्टम के कमर्शियल आस्पेक्ट को देखा. कैसे डॉक्टर-इंजिनियर बनाने और गुमनाम से कॉलेजों में बच्चों को भेजने या कहिये सीट दर सीट बेचने का धंधा फल फूल रहा था. मेरे कुछ जान पहचान के लोग थे जो इंजीनियरिंग करने के बाद अपना जॉब छोड़ कर वहां करियर काउंसेलर बन बैठे थे, और करोड़ों पीट रहे थे. उनके साथ उठते बैठते मुझे लगा कि ये अपने आप में एक ऐसी कहानी है जो मुझे लिखनी चाहिए. और बड़े होने के बाद, पहली बार मैं बिहार को इतने करीब से देख रहा था - उसका भी असर था, वो जो रोमांटिक व्यू ऑफ़ अन एलियन बोलते हैं, मैं थोड़ी दूर से चीज़ों को देखने समझने की कोशिश कर रहा था. तो ऐसे में ही मैंने कच्चा पक्का जो समझ में आया उसे एक उपन्यास की शक्ल में लिखा और नाम दिया - सिटी सिटी बैंग बैंग. उसके बाद देश के नामचीन प्रकाशकों के द्वारा रिजेक्ट रिजेक्ट होते होते ये किताब दरयागंज के महावीर पब्लिशर्स ने सन 2013में छापी.

४. क्या है उपन्यास में आपके कुछ बताइए?

गंदी बात निहायती भिन्न सामाजिक-आर्थिक परिवेश से आने वाले, दो घनघोर अराजनैतिक युवाओं की राजनीतिक प्रेम कहानी है. एक ब्रेकअप रोमांस है ये जिसमें शहर दिल्ली विलेन है. पलायन का रोमांस भी कह सकते हैं जिसमें दो युवा अपने परिवेश से दूर दिल्ली जैसी भव्यता में अपने पटना वाले रोमांस को जीने की जिद में हैं. सन २०१३ की कहानी है जब दिल्ली में भयंकर राजनीतिक उठापटक थी और उसके बीच ये दोनों 'इश्क' जैसी गंदी बात करने निकल पड़ते हैं.

5. आप किस लेखक को अपना आदर्श मानते हैं?

आज की तारीख में लेखन का कोई ऐसा आदर्श किसी को नहीं मानता हूँ मैं; मुझे लगता है कि जब आप लिख रहे हो और वैसे में आप किसी को आदर्श मान कर उसके जैसा लिखने की कोशिश करते हैं तो वो जो नेचुरल एलिमेंट होता है लेखन का वो फंस जाता है. मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूँ क्यूंकि ग्यारहवीं- बारहवीं में मैंने काफी साहित्य पढ़ा था. इंग्लिश में उपमन्यु चटर्जी, सुकेतु मेहता, झुम्पा लाहिरी, अनिरबन बोस इन सब को पढ़ रहा था; हिंदी में मनोहर श्याम जोशी, राही मासूम रजा साब की टोपी शुक्ल और आधा गाँव, अज्ञेय की शेखर एक जीवनी पढ़ रहा था. इन सबका बड़ा गहरा प्रभाव पड़ा था मुझपे. किताबों से ज्यादा मैं उस दौर में हिंदी लेखन में हो रही ब्लौगिंग से काफी चिपका रहता था. सच पूछें तो मैंने लैपटॉप की स्क्रीन पर ग्रेजुएशन के तीन सालों में जितना पढ़ा है उतने पन्ने नहीं पलटें हैं. रवीश का कस्बा, , मिहिर ( पंड्या) का आवारा हूँ, विनीत कुमार का 'हुंकार', उदय प्रकाश का वारेन हेस्टिंग्स का सांड, कबाडखाना, प्रभात रंजन की जानकीपुल. रंगनाथ सिंह का ' बना रहे बनारस - ब्लॉग गली में इस ब्लॉग से उस ब्लॉग कई कई रात टहला हूँ और घंटों पढता था. तो मेरी ट्रेनिंग वहां स्क्रीन पर हो रही थी. वो अद्भुत लेखन का दौर था. उनमें से कई ब्लॉग अब भी हैं, कई नहीं हैं. पर वो बहुत महत्वपूर्ण समय था.

६ आप लेखन से जुड़े अपने अनुभवों के बारे में बताइए. 

मैंने ग्यारहवीं से पहले बिलकुल भी नहीं लिखा था, न ही ज्यादा पढ़ा था. मुझे क्रिकेट खेलना पसंद था और मैंने यही किया था. नवम्बर 2008 की सर्दियों में सहरसा से दिल्ली आते वक़्त इलाहाबाद जंक्शन पर गुनाहों का देवता खरीदी थी, और टूंडला जंक्शन तक पहुँचते पहुँचते दो बार भोकर पार के रो चुका था. लेकिन लिखना नहीं सीखा. दिल्ली आने पर मुझे पापा मम्मी की बहुत याद आती थी, और ऊपर से डीपीएस का माहौल भी कुछ ऐसा एलियन था कि मैं पिछली बेंच पर बैठा कल्चरल शॉक में ही जूझ रहा था. रात को घर की याद और जोर से आती तो मैं रोते रोते मैथ्स की कॉपी पर पापा को चिट्ठियाँ लिखता था. फ़ोन पर पता नहीं क्यूँ वो सब कुछ नहीं कह पाता था जो कहना चाहिए था. तो पहली बार वहीँ, चिट्ठियों से शुरुआत की. फिर बाद में प्यार हुआ तो लिखने का एक बड़ा हिस्सा रिलायंस वाले छोटे से उस फ़ोन पर लड़की को मेसेजिंग करने के दौरान हुआ. मैं उसे लम्बे लम्बे मेसेज भेजा करता था, और कोशिश करता था कि वो क्लासी हो. तो दो साल तो यही सब लिख रहा था. इसके बाद केएमसी में ग्रेजुएशन के दौरान लगा कि खर्चे बढ़ रहे हैं और लिख कर कमाया जा सकता है तो पार्ट टाइम कंटेंट राइटिंग शुरू कर दी थी - दिल्ली की कोई कंटेंट राइटिंग कंपनी थी. उस दौर में एक रात मैं बारह बारह आर्टिकल लिखता था, तीस पैसे पर शब्द की दर से. उस समय भी मैं सिर्फ और सिर्फ पैसों के लिख रहा था. फिर धीरे धीरे फेसबुक पर मन में आई कोई कहानी लिख कर डालता था जिसे अच्छा रेस्पोंस मिलने लगा था - 20- 25 लाइक और दो तीन शेयर, तो लगा ये बढ़िया है. वैसे ही करते करते नीलेश मिश्रा की मण्डली में आ गया जहाँ पहली बार आर्ट ऑफ़ राइटिंग, या कहिये की लिखने के गठन के बारे में पता चला . नीलेश हमें ट्रेन करते थे, या यूँ कहिये हमारी कहानियों पर टिपण्णी देते थे. उनकी मण्डली में बहुत सीखा - प्लाट, कनफ्लिक्ट ये सब क्या होता है पता चला. फिर उसके बाद से लिखने, और ख़ास कर फिक्शन लिखने को लेकर मैं गंभीर हो गया. मुझे धीरे धीरे समझ में आ गया था कि एक यही चीज़ है जो मैं अच्छी तरह कर सकता हूँ और यही करके मुझे खाना कमाना है.

7 आप ख़ुद को किस तरह का लेखक मानते हैं- शौक़िया या पेशेवर?

मुझे बहुत गुस्सा आता है जब कोई कहता है कि लिखना हॉबी है, उतने तक ही रहने दो. शौकिया लेखन क्या होता है मुझे नहीं समझ में आता!  मेरा स्वान्तः सुखाय टाइप की थ्योरी में कोई भरोसा नहीं है. मुझे लगता है कि इफ यू आर गुड एट समथिंग, बेटर गेट पेड एंड पब्लिश्ड! आगे सिनेमा के लिए लिखना चाहता हूँ और लिखूंगा

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