शब्द खोलते हैं एक द्वार



चित्रकार सीरज सक्सेना उन विरल कलाकारों में हैं जो साहित्यिक आस्वाद रखते हैं, लिखते हैं और जिनकी रचनाएँ पसंद आती हैं उनके ऊपर भी लिखते हैं. पारुल पुखराज की कविताओं को पढ़ते हुए उन्होंने खुद ही शब्दों को कविता की तरह बरतते हुए रचा है. पढियेगा- मॉडरेटर 
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शब्द रचते हैं लोक जिसके तत्व हमारे आस-पास घट रहे, बह रहे ,फिसल रहे समय और पर्यावरण से ही लिए गए हैं। हमारा जीवन जिन संवेदनों से बना हैं ,गुँथा हैं उन्ही का शब्द रूप हैं ये कविताएँ। शब्द हमारे अपने हैं।  शब्द केनवास पर उनके शब्द बिखरे हैं कविता पंक्ति में निबद्ध हैं। जिनका व्याकरण और शिल्प उतना ही निजी हैं। पारुल जी की कविता हमारे संवेदन को भी एक नवीन रूप देती हैं, हमारे संवेदन श्रृंगारित होते हैं और किसी हद तक विस्तार भी पाते हैं। मन और देह के अनुभव से शब्द एक नया धरातल गढ़ते हैं। कविता में ध्वनि में बदलते हैं ये शब्द अपने स्थापत्य में। आम बोलचाल और व्यावहारिक भाषा के ये शब्द  हमारे उच्चारण में या मन में रहस्य, सौंदर्य ,गाम्भीर्य लिए स्वयं को और खोलते हैं। शब्दों का ये हुनर या खेल पारुल जी की कविता हैं।

शब्दों का ये अनुभव स्तब्ध करता है। देह को गुदगुदाता है। भाव, स्मृति और अनुभव में सने ये शब्द अपना यौवन पुनः पाते हैं, कुछ कोरे जान पड़ते हैं ये मुझसे भी पुराने शब्द (यहाँ मैं खुद को अपने कुटुंब का प्रतिनिधि कह रहा हूँ)। शब्दों के बीच अवकाश पंक्ति में प्रकट होता हैं और कुछ पंक्तियों का ये संकुल कविता कही जाती हैं। हर पंक्ति एक दृश्य और हर कविता दृश्यांकन रचती है। इन दृश्यों में उबाऊ बोझिल सतही औपचारिक अर्थों की गुंजाइश नहीं। ये दिगंबर शब्द अपने पौरुषार्थ में टहलतें हैं इन कविताओं के भूगोल में।

पारुल जी की कविताएँ पर्यावरण की कवितायेँ हैं। इन कविताओं का चरित्र प्रकृति हैं। इस अर्थ में ये कालजयी भी हैं। इन्हें अपने और नवीन अर्थों को खोलने के लिए अब समय की दरकार नहीं। अपना स्थापत्य खुद लांघते हैं ये शब्द। प्राकृतिक, दैहिक, आध्यात्मिक (फिलहाल और कोई शब्द नहीं सूझ रहा), दैविक पर्यावरण इन कविताओं में झांकता हैं। पर्यावरण का यह विस्तार गंभीर तो है ही साथ ही साहसिक भी हैं। देवता, पक्षी, हवा, आकाश, मनुष्य और उसकी देह तथा उसकी आवाज़ जैसे प्रमुख तत्व इस कविता संसार में हैं।

कुछ पँक्तियाँ इस कदर दृश्य रचतीं हैं मानो हूबहू देखा हुआ अनुभव हो, जो न जाने कब से स्मृति के खोखल में अनछुआ दुबका या सुबह से शाम के फेर में उदासीन सा छूट गया हो। उसे कविता फिर हमारे पास लौटाती है। हमारे यथार्थ को फिर गढ़ती है।हमें वही दिखाती है जिसकी हमारे मन को जरूरत है। बीते हुए पलों में घटे छोटे पर अत्यंत महत्वपूर्ण- संवेदनशील अनुभव इन कविताओं में पुनः हमारे सामने पेश होते हैं। नयी हरी ताज़गी लिए। जिस पर सुबह की हलकी रौशनी का तिरछा तेज़ पसरा हैं।  

ईश्वर और मनुष्य की जूठन का निकट और निजी सम्बन्ध कविता में दीखता है जो अद्भुत है। कविता और ईश्वर दोनों को और उदार बनाता हैं। ईश्वर कई बार मनुष्य देह और उसके प्रपंच (माया), कार्यकलापों के बीच उपजता, रेंगता, फिसलता प्रेम,सौंदर्य, विरह मानवीय संवेदन आदि खुद भी महसूस करता है। कविता ईश्वर को यह अवसर देती हैं। देह के बाहरी सौंदर्य और उसकी लिप्तता उसके तात्कालिक सुख और उसके बयानों से भी कविता बड़े कौशल के साथ बच कर निकलती है। यहां कवयित्री के कविता शिल्प कौशल को सराहना चाहिए। वरना दैहिक प्रेम के ज्वार भरे विस्तार को सहेजना और उसके ताप से खुद को कुछ ही ओस की बूंदों से संवारना और बचाना कठिन है। कविता यहाँ किसी तरह की शिकायत या भोएं भी नहीं सिकोड़ती। कविता यहां संतोषी जान पड़ती है जो कुछ भी उसके हिस्से आया है या जो भी उसकी नियति में उसे प्रदत्त है....  पर्याप्त है, यह संतुष्टि खूबसूरती से पारुल जी की कविता बयान करती हैं। जैसे :-


न अन्न कम पड़ता है
  जल


आसपास ईश्वर की उपस्थिति है पर एक अन्य की तरह नहीं बल्कि मित्र या सहचर्य की तरह।

ससम्मान मित्रवत ईश्वर इन कविताओं में हस्तक्षेप करता है या उपस्थित होता है।


ईश्वर
यह तुम हो

जूठा जिसे रास आता
मेरा!


ईश्वर की यह उपस्थित सुखद और सहज है। ईश्वर की मौन उपस्थिति यहाँ शब्द की आवाज़ और उसकी देह में  है। एक दृश्य में रूपांतरित होती महसूस होती है। यह कठिन और लगभग असंभव-सा प्रकटन पारुल जी की मौन और आवाज़ के प्रति सच्ची आस्था और श्रद्धा से ही हो सका है। दिखाई देने वाली आवाज़ यहाँ पढ़ी जा सकती है।


बिना फेंके
अपनी आवाज़ का
कंकर

मौन में
तुम्हारे

              एक दृश्य बहुत सुन्दर है जिसे पढ़कर मुझे पहाड़ी शैली का लघु चित्र याद हो आता है।

दूर बुर्ज़ पर
बोल

मयूरपाखी

कर आह्वान
कहीं और

देख
भंग हो रही
मर्यादा शब्द की

  यह वाक्य हमारी शब्द और मौन की नितांत भारतीय प्रज्ञा से ही उपज सकता है। निश्चित ही किसी और देश के काव्य में यह वाक्य शायद नहीं लिखा जा सकता। भाषा के व्याकरण व शब्दों की मर्यादा भी इन कविताओं में विस्तार पाती है। यह कविता का भाषा में और भाषा का कविता में समकालीन विस्तार है। इस विस्तार के ऐश्वर्य पर कविता पंक्ति "जहां होना लिखा है तुम्हारा" संग्रह में यहाँ- वहाँ इठलाती भी नज़र आती है।


चिड़िया सुन ले शायद
दुबकी मुँडेर पर

चीटियाँ सुन लें
रेंगती अवसाद पर


यहाँ भी कोई लघु चित्र दूर धूँघलके में करवट लेता है, अवसाद की गुदगुदी के बिना यह करवट असंभव हैं। कवितामयी इस स्थापत्य का बुर्ज़ तमाम दृश्य अनुभवों को यथार्थरूप में बाँध कर ठीक हमारी आँखों के सामने ठहरा देता है। दृश्य को कवयित्री ईश्वर की तरह मायावी बनाती हैं। स्वयं ओझल है पर संचालित करती है संवेदन, दृश्य कर्म, रंग संयोजन, अनुक्रम, आवाज़ और मौन। उनकी परछाई या खुशबू महसूस होती है पृष्ठ दर पृष्ठ। कहीं बहुत करीब से देहरी लांघते उनके पाँव भी महसूस होते हैं।

भाषा और शब्द की देहरी लांघते हुए अपनी कविता में पारुल जी एक नया संयोजन प्रस्तुत करती हैं।मन से संचालित भाषा और शब्दों के घर की देहरी को कविता अवकाश में लाया गया है। यह प्रयोग चुनोतिपूर्ण और जोखिम भरा है। एक आत्मविश्वासी युवा प्रेमिका-सा उद्यम है यह सफल प्रयोग। मन के महल में कविता का यह प्रवेश शुभ है। शब्द और अर्थ की देह के पाँव अब देहरी लांघे या तब देहरी लांघें यह इतना महत्वपूर्ण नहीं। ....  यहां कविता की अपनी देह का कृत्य है प्रश्न है जिसकी अपनी गति और अपनी चाल हैं और अपने ही पाँव हैं। यह पदचाप शोर नहीं करती इसकी सिहरन महसूस होती है। और स्वीकार्य भी। मन में कुछ और नवीनता की आतुरता भी जगाती है और कई कोरी जिज्ञासाएं भी जागृत होती हैं इन कविताओं को पढ़ते हुए। कविता की देह का हर अंग पूर्ण हैं।


धूप के पाँव
पोछती है साँझ


इस लघु शब्दचित्र को इतने कम शब्दों में रचना जैसे कि बड़े केनवास को रंगना हैं। इन चित्रों में रंगों की बहुतायत नहीं बल्कि एक या दो ही रंग मिलकर अनेक परतें रचते हैं। यूँ तैयार होता हैं एक शब्दचित्र समूची अभिलाषा शांत होती है यहाँ। बस इतने में ही। एक या दो रंग ही बाकी रंगों का भी दायित्व भली भाँती निभाते हैं। कहीं कोई अधूरापन नहीं दिखता।

हाँ ये कविताएँ आगे कुछ और पढ़ने की उत्कंठा जगाती हैं। इन के भीतर जाना खुद के भीतर जाना हैं। शब्द से जैसा रिश्ता कवयित्री का हैं वैसा ही पाठक का भी बनता हैं।



चिड़िया को देखना  
खुद को देखना है
.
.
उड़ती है जंगल में
जंगल होकर

नदी पर
नदी-सी बहती है


नदी, जंगल, चिड़िया को नदी, जंगल, चिड़िया हुए बिना नहीं लिखा जा सकता। बिना आडम्बर और कृत्रिमता के पारुल जी ने यह सहजता से रचा है। उनके इस मन को कविता में देखा जा सकता है।



नहीं लिखा जा सकता
कार्तिक का यह सबेरा
हूबहू
कागज़ पर


यहाँ कार्तिक को उसकी समग्रता में समझना या महसूस करना होगा। फिर सबेरे को। फिर देखने को भी।  यह सही है। ...नहीं लिखा जा सकता या नही चित्रित किया जा सकता है कोई भी सूर्योदय। इस अभिलाषा से जो भी प्रयास होगा वह उस सूर्योदय की अनुकृति ही होगा। यहाँ कुशल रचनाकार सिर्फ उस सूर्योदय की और इशारा-भर ही कर सकता है। पढ़ते हुए मैंने उस कार्तिक के सूर्योदय को हूबहू महसूस किया जो इन पंक्तियों में नहीं लिखा जा सका है। पक्षी और शंख की ध्वनि इसके गवाह हैं। हालांकि यहां किसी भी तरह का प्रमाण अनर्थक हैं।


पक्षी रुद्ध कंठ
कर रहा
भोर की अगवानी

जिसमे गूँजता
शंख
देवालय का


पर दूसरी ओर पक्षी और देवालय से आती शंख ध्वनि कविता में घट रही सुबह को जीवंत सौंदर्यमयी गरिमा प्रदान करती हैं। देवता भी इस कार्तिक की सुबह को साक्षात देखता है कवयित्री की आँखों से कागज़ पर। देवता या ईश्वर यहाँ दृष्टी में समाया है। ईश्वर ही ईश्वर को गढ़ रहा है यहाँ। जैसे इस पंक्ति का रचा जाना :-


कोयल की कूक में बिधा मन
मालती की बेल पर टँका फूल



याद का रचना भी मेरे पाठक मन के लिए नया है। ..यह ठीक ही तो है। ... याद स्मृति नहीं कि जो घटा हो उसे याद कहकर मन ही मन दोहराओ। याद। .... कोई सुन्दर याद रची भी तो जा सकती हैं और उसे हम अपने प्रिय गीत की तरह  चाहे गुनगुना सकते हैं। कविता में इस संभावना या कल्पना को यथार्थ और व्यवहार में बदलना कविता शिल्प का अद्भुत गुण हैं।


ईश्वर के
होठों की जूठन

ईश्वर कभी पाप चुगता है तो कभी प्रभु बन जाता है। जिससे याचना करनी हो। मनीषी देह और उसके व्यवहार में भी ईश्वर मिलन और विरह की अनुभूति इन कविताओं में है। पर क्यों है कि प्रेम के मिलन का यहां परहेज़ सा हैं। यहां चिड़िया, धूप, आंसू, रात ,नींद,स्वप्न सब है तो मिलन क्यों नहीं ?

पीड़ा, विरह, अवसाद, एकांत ही क्यों  ? प्रेम पाप क्यों ?

यह बोझ की तरह है जिसे अपनी पीठ पर लिए कब से कोई चल रहा है जैसे एक स्वप्न में। यह स्वप्न यथार्थ बन सकता है किसी भी कविता पंक्ति में पर न जाने क्यों पाप या अन्य धारणाओं की वजह से विरह अकारण ही एक श्राप की तरह रचा गया हैं। प्रेम की अनदेखी हठपूर्वक इन कविताओं में है। देह प्रेम का जैसे अवरोध हो। पर बिन देह प्रेम संभव नहीं। आध्यात्म शायद संभव हैं।

"अस्त " कविता की आखिरी तीन पंक्तियाँ सूर्य अस्त का चित्रण करतीं हैं। जो देखती हैं आँख वही शब्दों में पिरोया गया हैं। जब इस यथार्थ का स्वीकार्य हैं तो प्रेम का क्यों नहीं। प्रेम को यथार्थ से ऊपर क्यों रखा गया हैं ।

जैसे इन पंक्तियों में सूर्यास्त हमेशा वर्तमान में होता रहेगा भले ही आप कविता किसी भी पहर में पढ़ें। सूर्यास्त यहां ठहर गया है चलायमान। प्रेम भी बंध नहीं पाएगा। वो अंकुरित हो चला हैं।  

कविता संग्रह- "जहाँ होना लिखा है तुम्हारा"

लेखक- पारुल पुखराज

प्रकाशक- सूर्य प्रकाशन मन्दिर,

दाऊजी मन्दिर रोड,

बीकानेर 334001

(राजस्थान)



पुस्तक प्राप्ति हेतु सम्पर्क-

प्रशांत बिस्सा 09829280717

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