प्रकृति करगेती के कविता संग्रह से कुछ कविताएँ
इस साल पुस्तक मेले में खूब कविता की किताबें आई. पिछले साल कम आई थी. जाने-पहचाने कवियों की किताबें आई कुछ चुपचाप कवियों की भी. प्रकृति करगेती का पहला कविता-संग्रह 'शहर और शिकायतें' चुपचाप कवि की किताब है. प्रकृति को कहानियों के लिए पुरस्कार मिल चुका है, कविताओं से अच्छी पहचान मिल चुकी है लेकिन वे किसी होड़ में नहीं हैं, किसी दौड़ में नहीं हैं. लेखन कहीं पहुँचने के लिए नहीं किया जाता है. सहजता से कुछ कहने के लिए किया जाता है. प्रकृति की कविताओं को पढ़िए. जितनी सादगी है उतनी ही गहराई- मॉडरेटर
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भूमिका
ये भूमिका,
‘भूमिका कैसे लिखते हैं ?”
के बाद की भूमिका है.
‘भूमिका अब कोई नहीं पढ़ता’
ऐसा सिखाये जाने
के बाद की भूमिका है
‘बड़े नामों के
चक्कर में मत पड़ना’
ऐसी हिदायतों
के बाद की भूमिका है
‘कुछ ख़ास हो कहने को,
तब ही लिखना’
ऐसे कई मशवरों
के बाद की भूमिका है.
“ ज़्यादा खींच-खाँचकर
मत लिखना”
ऐसी एक चेतावनी
के बाद की भूमिका है
ये भूमिका नहीं है,
भूमिका के चंगुल से निकलकर
घायल हुए,
विचारों की भूमिका है
यहाँ, वहाँ, कहाँ
सभ्यता के सिक्के
सभ्यता अपने सिक्के
हर रोज़ तालाब में गिराती है
कुछ सिक्के ऐसे होते,
जिनपर लहलहातीफ़सल की
दो बालियाँनक्काश होती हैं
या कुछ पर
किसी महानुभावकी तस्वीर
या गए ज़माने का कोई विख्यात शासक ही
ये सभी, और इनके जैसे कई सिक्के
सभ्यता की जेब से
सोच समझकर ही गिराए जाते हैं
वक़्त की मिट्टी परत दर परत
इनपर रोज़ चढ़ती है
इस बीच, न चाहते हुए भी
कुछ सिक्के हाथों से फ़िसल जाते हैं
वो सिक्के, जो काली याद बन आते हैं
पुरातत्व के अफ़सर जिन्हें,
काँच के पीछे सजाते हैं
सिक्के, जो सौदे की दहलीज लाँघ
इंसानों से बड़े हो गए थे कभी
सिक्के, जिनपर दहशत की नक्काशी है
सभ्यता के सिक्के
जो आज मिले,
तो कल की परख करवा गए
और काँच की दीवारों से झाँकते
ये कह गए
“अतीत के तालाब में,
तुम कौन से सिक्के फेंकोगे ?”
एक ख़रगोश हूँ मैं
एक ख़रगोश हूँ मैं
दुबक जाऊँगी
एक भेड़ हूँ मैं
सहम जाऊँगी
एक बकरी हूँ मैं
क़त्ल की जाऊँगी
पर मैं इंसान क्यूँ नहीं?
रीढ़ है,
पर सीधी नहीं
ज़बान है
पर खुलती नहीं
सोच है
पर इरादा नहीं
नीयत है
वो भी ज़्यादा नहीं।
टुकड़े में जंगल
हैरानियाँ जब ख़त्म हो जाती हैं
और लगता है कि
सब नीरस है
सब उबाऊ है
और दिन हैं लदे हुए
ऐसे वक़्त के लिए
एक टोटका रखा है अपने पास
एक तिलस्म सा है
एक टुकड़ा,
देवदार की लकड़ी का
वो देवदार से अलग होकर
भीगा पड़ा था किनारे
उसे एक पहाड़ चढ़ते उठाया था
उसी में सारा जंगल समाया था
उस जंगल को साथ ले आये
उस सूखे टुकड़े को
फिर से भिगोकर सूँघ लेते हैं
वो फिर से हैरान करता है,
वो फिर से रस भरता है
क्यूँकि,
उसमें अब भी
सारा जंगल महकता है
अठन्नी
बस कंडक्टर ने जब,
नन्ही सी
दो अठन्नियाँ मुझे थमाई,
लगा कि तुम बाज़ार में
नन्ही सी
दो अठन्नियाँ मुझे थमाई,
लगा कि तुम बाज़ार में
वापस आ गयी हो
ख़ुशी-ख़ुशी तुम्हें
ख़ुशी-ख़ुशी तुम्हें
बटवे में डाल दिया
अगले दिन,
कुछ सोचकर,
तुम्हारे बदले, पनवाड़ी से
दो टॉफ़ियों का सौदा करना चाहा
कुछ सोचकर,
तुम्हारे बदले, पनवाड़ी से
दो टॉफ़ियों का सौदा करना चाहा
पर,
"मैडम, पचास पैसे नहीं चलते"
ये कहकर उसने तुमसे पल्ला झाड़ा
"मैडम, पचास पैसे नहीं चलते"
ये कहकर उसने तुमसे पल्ला झाड़ा
मैंने सोचा,
अर्थव्यवस्था के समुद्र के
किसी और किनारे तुम्हें बहा दूँगी
अर्थव्यवस्था के समुद्र के
किसी और किनारे तुम्हें बहा दूँगी
पर जूसवाले ने ,
कैन्टीनवाले ने ,
और बाक़ी कितनी लहरों ने,
तुम्हें वापस किनारे धकेल दिया
कैन्टीनवाले ने ,
और बाक़ी कितनी लहरों ने,
तुम्हें वापस किनारे धकेल दिया
मैंने भी,
तुम्हेँ बटवे में वापस रख दिया
तुम्हेँ बटवे में वापस रख दिया
अगले दिन,
बस के सफ़र में
तुम्हें,
बस के सफ़र में
तुम्हें,
तुम्हारे तालाब छोड़ आयी
तुम्हें भी एहसास है कि,
तुम केवल बस में ही तैर सकती हो
अर्थव्यस्वस्था का समुद्र तो ,
तुम्हें कबका नकार चुका है
तुम केवल बस में ही तैर सकती हो
अर्थव्यस्वस्था का समुद्र तो ,
तुम्हें कबका नकार चुका है
पर फ़िक्र मत करो,
तुम्हारे लुप्त होने से पहले,
कई और सिक्के
तुम्हारे लुप्त होने से पहले,
कई और सिक्के
तालाब में फेंके जायेंगे
तब तक तुम मिलती रहना मुझसे,
छुट्टों के बहाने,
इसी तालाब में
छुट्टों के बहाने,
इसी तालाब में
सड़क की रीढ़
सड़क की रीढ़
जिस मोड़ मुड़ चुकी है
उसी मोड़ पर
हर रोज़
कई ज़िन्दगियाँ
दौड़ते-दौड़ते रुकती हैं
लड़ती हैं,
भिड़ती हैं
हॉर्न बन बिलखती हैं
" मादरचोद, दिसत नहीं का?
" तुझं आईची, माईची,"
" पुढे या चेपून दया"
कह
चीखती हैं, चिल्लाती हैं
मन पर पड़े
'डेंट' और ' स्क्रैच ' का
मातम मनाती हैं
फ़िर कोई आता है सज्जन
जो हाथों के इशारों से
कमान संभाल
रुकने का
या चलने का संकेत करता है
तब जाकर
बिलखते हॉर्न
और गालियोंकी बौछार के बीच
ट्रैफिक-जैम छटता है
सारी ज़िन्दगियाँ आगे बढ़ती हैं
फ़िर से मिलना है न उन्हें
बिलखने,
चीखने,
गरियाने
इसी सड़क की रीढ़ पर
जो मुड़ चुकी है
दबे पाँव
दबी-पिचकी उंगली से
दबी हुई बात जैसे
नया नाख़ून आता है ,
दबे पाँव
पुराने को
धकेलते हुए ,
जमे ख़ून को
ज़रा-ज़रा खिसकाते हुए
बिन चीखे,
बिन चिल्लाये,
चुपचाप
पुराना,
कहीं खो जाता
नया,
चमड़ी से चिपक जाता
बदलाव हमेशा
यूँ दबे पाँव क्यों नहीं आता?
चोटी
दूर एक चोटी है
खिड़की से उसे
मैं हर रोज़ ताकती हूँ
मेरी आँखों की हवा
उसे काटती है धीरे धीरे
मेरे मन के बादल
उसी पर बरसते हैं
खिड़की से उसे
मैं हर रोज़ ताकती हूँ
मेरी आँखों की हवा
उसे काटती है धीरे धीरे
मेरे मन के बादल
उसी पर बरसते हैं
मेरी साँसे
उसकी मिट्टी हरी करते हैं
मेरे रोंगटों से
कलियाँ खिलती हैं उसपर
उसकी मिट्टी हरी करते हैं
मेरे रोंगटों से
कलियाँ खिलती हैं उसपर
मेरे ज़हन के कम्पन से
वो थर्रा जाती है
मेरे ज़बान के फावड़े से
वो खुदती जाती हैं
वो थर्रा जाती है
मेरे ज़बान के फावड़े से
वो खुदती जाती हैं
दूर एक चोटी है
हर रोज़ उसे मैं,
यूँही ताकती हूँ
समंदर एक सौदागर है
समंदर एक सौदागर है
किनारे पर खड़े हर शख़्स से
सौदा करता है
सौदा करता है,
सीपियों का,
कुछ टूटी-फूटी
कुछ सही सलामत
सौदा करता है,
मछलियों का
कुछ दम-तोड़ चुकी
कुछ अब भी तड़पती हुई
और,
इस सौदे के बदले
समेट ले जाता है
रेत पर लिखे कई नाम
कुछ मेरे अरमानों के रेत के टीले
और मेरे पैरों तले की ज़मीन
समंदर एक सौदागर है
किनारे पर खड़े हर शख़्स से
सौदा करता है
बारिश
शहरों में,
बस खिड़कियों से ही
अच्छी लगती है बारिश
बाहर निकलकर
कौन भीगना चाहता है ?
बस खिड़कियों से ही
अच्छी लगती है बारिश
बाहर निकलकर
कौन भीगना चाहता है ?
बालकॉनी में रखे पौंधों से
बस बूँद बूँद टपकता रहे पानी
और,
ग्रिल पर यूंही लटकते रहें मोती
टपके न ज़रा भी अंदर को
बस बूँद बूँद टपकता रहे पानी
और,
ग्रिल पर यूंही लटकते रहें मोती
टपके न ज़रा भी अंदर को
वरना,
फ़र्श की कालीन ने गर
बूँदें सोक ली
तो इन कालीनों को
कहाँ सुखायेंगे...
फ़र्श की कालीन ने गर
बूँदें सोक ली
तो इन कालीनों को
कहाँ सुखायेंगे...
मंज़िलें जिन इमारतों की
ख़त्म ही नहीं होती
इन इमारतों में
छत कहाँ से लायेंगे?
ख़त्म ही नहीं होती
इन इमारतों में
छत कहाँ से लायेंगे?
उग्रवाद
मेरे अन्दर कुछ उग्रवादी रहते हैं
उनका होता है पाँच दिन का उग्रवाद
और कभी उससे भी कम...
इनका ये रिसता उग्रवाद
कपड़ो की परतों से रिसता है
मेरी योनी से टपकता है
दाग लगाता है...
एक कराह करके,
उठती हूँ सुबह
शिकायत नहीं है
मंजूर है कि,
इनका संघर्ष चलता रहे
आँखिर एक जान गयी है मेरे अन्दर
एक अंडा फूटा है
विरोध में उसके,
बड़ा लाज़मी है ये बवाल
धीरे धीरे अन्दर का
लोहा ही तो कम होता है बस
ये लाल रंग की क्रांति है
ये पांच दिन की क्रांति है
फिर सब शांत हो जायेगा
मैं भी भूल जाऊंगी
पर ये उग्रवादी फिर आयेंगे
आयेंगे मेरा लोहा कम करने
बिन बताये
चुपचाप...
गर्दन एक कुँए जैसी
गर्दन एक कुँए जैसी है
कोई न कोई
रिश्ते की रस्सी से
ख़ाली बाल्टी बाँध
फ़ेंक देता है गहरा
फाँस पड़ती है,
साँस रूकती है,
पर कुआँ
बाल्टी भरने नहीं देता
अपना ही पानी निगल जाता है
मेरी अय्याश मिज़ाज सोच
मेरी अय्याश मिज़ाज सोच
रात में, नींद में चलती है
सो जाने पर मेरे
चुपचाप
उठकर, ज़हन से
दबे पाँव निकल लेती है
किसका दरवाज़ा खटखटाती है
कौन जाने!
पर हर सुबह
मुझसे नज़रें नहीं मिला पाती
मैं कुछ पूछती नहीं
वो कुछ बताती नहीं
कुछ बात करती तो ,
मैं भी उसे बता ही देती
कि रात भर मैं भी कहाँ थी
अपने बिस्तर पर ।
शहर सा हो जाना
ये शहर सा हो जाना ही तो है,
कि शहर फ़ुर्सत में है
और हम भी
छोटे शहरों का वक़्त
रिक्शेवाले खींचते हैं ,
और हम उसी रिक्शे पर सवार
आरामगंज की गलियों से गुज़रते हैं
ये शहर सा हो जाना ही तो है
और बड़े शहरों का वक़्त
ट्रेनों में दौड़ता है
वक़्त हमेशा कम होता है
और ट्रेने हमेशा वक़्त से पीछे
और हम
इस वक़्त-बेवक़्त के बीच
किसी वक़्त में फँसे हैं
ये भी शहर सा हो जाना ही तो है
जेबें
वो ब्लाउज़ से,
तुम्हारी दी खर्चे भर आज़ादी निकाल
थक चुकी है
छाती से इन चिल्लारों का बोझ
अब संभालतानहीं
तो उसने सोचा है
कि वो अब,
ख़ुद के लिए जेबें सियेगी
वो जेबें जो कभी
उसके कपड़ो पर बनी ही नहीं
उसने सोचा है
वो दो जेबें सियेगी
बिलकुल वैसे जैसे
तुम्हारे कपड़ो पर होती हैं
उसने सोचा है
वो एक तरफ़ अपने हक़ भरकर रखेगी
और दूसरी तरफ़
तुम्हारे हक़ मेह्फूसरखेगी
सुई-धागा वो खुद धुंध लेगी
पर क्या तुम तैयार हो
अपनी जेबें फ़िर से टटोलने के लिए
जो उसका है उसे वापस देने के लिए
इअर-बड्स
इअर-बड्स से कान का मैल निकाला
तो उस पीले के पीछे, सफ़ेद रुई को देख
ख़याल आया,
एक कूबड़ हुई कमर का
एक सूखी चमड़ी का
मांस पर उभरी,
पसलियों का, हड्डियों का
एक कपास के किसान का ...
सोचा थोड़ी देर,
फिर इअर-बड्स फेंक दिए
कूड़ेदान में
अब मैं क्या करूँ !
मेरे घर की खेती भी तो बंजर पड़ी है
यह कविता संग्रह राधाकृष्ण प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है.

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