रेडियो कोसी के लेखक पुष्यमित्र से बातचीत




रेडियो कोसी असल में एक अंचल की कहानी है. लेखक पुष्यमित्र से जानकी पुल ने एक बातचीत इसी उपन्यास को लेकर की- मॉडरेटर 
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1. रेडियो कोसी उपन्यास में क्या है?

कोसी की एक ही कहानी है, जो रेणु जी ने परती परिकथा में लिखी, नागार्जुन ने वरुण के बेटे उपन्यास में लिखी, मायानंद मिश्र ने माटी के लोग सोने की नैया में लिखी, दिनेश मिश्र जी ने दुई पाटन के लोग में लिखी और आज मैंने उसे लिखने की कोशिश की है। इनमें से दिनेश मिश्र जी किताब गैर साहित्यिक कृति है, बाकी लोगों की साहित्यिक कृति है। कुल मिलाकर यह वही पुरानी कहानी ही है।

एक पुराना रोग है। सरकारें बार-बार इसका अंग्रेजी इलाज कराती रही है। मगर हर सर्जरी के बाद इसका रोग बढ़ ही जाता है, क्योंकि इसका इलाज अंग्रेजी डॉक्टरों यानी जल संसाधन विभाग के इंजीनियरों के पास नहीं है। वे हर बार इस चंचल और आजाद तबीयत नदी को बांधने की कोशिश करते हैं, मगर हर कुछेक साल में यह नदी बंधन तोड़ कर आजाद हो जाती है। और इस नासमझी भरे प्रयोग में बार-बार पिस कर कोसी के किनारे बसी लाखों की आबादी तबाह होती रहती है।

तो रेडियो कोसी की भी यही पृष्ठभूमि है, यही कैनवास है। कोसी तटबंध के बीच फंसे 300 गांवों के लोग हैं, जो इस इक्कीसवीं सदी में भी 18वीं सदी जैसे हालात के बीच रहते हैं। वहां न सड़कें हैं, न बिजली, न स्कूल, न अस्पताल, न थाना पुलिस। मतलब सरकार आज भी वहीँ पहुंची ही नहीं है और भूल गयी है कि यह भी कोई दुनिया है और उसके विकास की जिम्मेदारी भी उसी की है।

उस दुनिया में एक लड़का जुगाड़ टेक्निक से एक रेडियो स्टेशन चलाता है। 5रुपये लेकर लोगों को गाने सुनाता है, उनके छोटे-छोटे विज्ञापन प्रसारित करता है। और उस इलाके में जहां न अख़बार की पहुँच है, न टीवी चलते हैं यह रेडियो स्टेशन वहां के लोगों के जीवन का सहारा बन जाता है। एक नेशनल टीवी चैनल की रिपोर्ट के जरिये उस रेडियो स्टेशन की खबर बाहर आती है और फिर कुछ लोग उस रेडियो स्टेशन को बंद कराने में जुट जाते हैं क्योंकि इसने लाइसेंस नहीं लिया है।

पुलिसिया दबिश शुरू होती है और यह दबिश वहां के लोगों को उत्तेजित कर देती। लोग भड़क जाते हैं कि अब तक सरकार कहाँ थी। आज यह सरकार हमारे मामले में सरकार बनने क्यों आई है। और फिर पुलिस प्रशासन और गांव वालों के बीच चूहे बिल्ली का खेल शुरू होता है। यही इस किताब की कथा है।

2. क्या आपको लगता है कि आप आंचलिक लेखक हैं?

जी हाँ, मैं आंचलिक ही हूँ। क्योंकि अब तक खुद को कोसी के कैद से ही आजाद नहीं करा पाया। तीन किताबें लिखी। दो फिक्शन और एक रिपोर्ताज। तीनों का विषय कोसी नदी ही है। इस किताब के बाद पहली बार चंपारण सत्याग्रह के विषय को हाथ लगाने की कोशिश कर रहा हूँ। मेरी सोच की सीमा यही है। अभी तक उत्तर बिहार से ही बाहर नहीं निकल पाया हूँ। पत्रकारिता भी बिहार-झारखण्ड की सीमा में बंध कर कर रहा हूँ। और यह कोई छोटा इलाका नहीं है। यूरोप के कई मुल्क इससे काफी छोटे हैं। इस लिहाज से इस बड़े इलाके में खुद को सीमित कर भी लें तो लिखने के लिये कई बड़े विषय हैं। अब चुकी मेरे लिखने की जगह ही उत्तर बिहार की है तो जाहिर है भाषा में वहां के शब्द आते हैं और फिर वह आंचलिक हिंदी बन जाती है, जिसे रेणु ने गढ़ा है।

 3. अपनी पत्रकारिता से अपने साहित्यिक लेखन को आप किस तरह से अलग करके देखते हैं?

मैं मूलतः किस्से कहानियों वाला आदमी हूँ। मुझे लगता है कि किसी बात को अगर समझाना हो तो किस्से अधिक कारगर होते हैं। इसलिये खबरें लिखते वक़्त भी मैं कोशिश करता हूँ कि उसमें कोई न कोई किस्सा हो जो लोगों को कन्विंस कर सके। किसी की आपबीती, किसी का अनुभव। आंकड़े और बयानों के साथ अगर खबरों में कोई किस्सा हो तो फिर खबर दिलचस्प बन जाती है। मेरा जोर आम लोगों की लार्जर दैन लाइफ कहानियाँ तलाशने में रहता है। अब देखिये जैसे महावीर सिंह फोगट की कहानी। यह कहानी पहले खबर ही बनी थी, बाद में उस खबर से दंगल फ़िल्म भी बनी। किसी की किताब भी बन सकती थी। मेरे एक मित्र ने रांची में एक रिक्शे वाले की रिपोर्ट लिखी थी जो अपनी पत्नी के कैंसर का इलाज कराने गांव से जमीन बेचकर रांची चला आया था और जब सारे पैसे खर्च हो गये तो वह रिक्शा चलाने लगा ताकि अपनी पत्नी की केमोथेरेपी का खर्च उठा सके। क्या इस न्यूज रिपोर्ट में एक उपन्यास की संभावना नहीं है।

4 आपने साहित्यिक लेखन कम किया है क्या आपको लगता है कि आपको इस उपन्यास से पहचाना जायेगा?

यह तो पाठक ही तय करेंगे कि यह उपन्यास कैसा है? इस कहानी ने उनके अंदर रूचि पैदा की या नहीं। मैं बस इतना समझता हूँ कि हर पत्रकार को अपने कैरियर में कोई न कोई बहुत बड़ी स्टोरी मिल जाती है। वह उसे अख़बार के छोटे से स्पेस में छाप कर संतुष्ट नहीं होता है। फिर वह उसे किताब की शक्ल देता है। चाहे रिपोर्ताज के रूप में या कहानी-उपन्यास के रूप में या नॉन फिक्शन के रूप में। मेरे कैरियर में भी मुझे कुछ किस्से ऐसे मिले हैं जो मुझे किताब लिखने के लिये प्रेरित करते हैं।

5. कुछ अपने उपन्यास की कथा कुछ अपनी व्यथा बताइए।

कथा के बारे में पहले सवाल में ही बता चुका हूँ। व्यथा भी कोई खास नहीं है। किताबों की दुनिया में लोग तभी आपको नोटिस करते हैं जब आपकी पहचान हो। और पहचान बनाने के लिये कोशिश करनी ही पड़ती है। कुछ व्यवस्थागत परेशानियां हैं मगर लगता है कि उसका भी समाधान हो ही रहा है।

6. आपको उपन्यास लिखने की आवश्यकता क्यों महसूस हुई?

इसका उत्तर भी पहले दे चुका हूँ। पत्रकारिता के कैरियर में रोज अलग अलग किस्सों से परिचय होता है। मगर कई दफा कुछ किस्से आपको पकड़ लेते हैं। उसे लिख कर ही उससे मुक्ति हासिल की जा सकती है। 2008 की भीषण बाढ़ में मैं कोसी के इलाके में गया था। उस वक़्त मैं इतना परेशान हुआ कि नौकरी छोड़ दी और एक साल तक उसी इलाके में भटकता रहा। फिर दुबारा नौकरी में आया तब भी मन उसी इलाके में भटकता रहा। बार-बार रिपोर्टिंग करने वहीँ जाता था। फिर CSDS से वहां शोध करने के लिये फेलोशिप मिली। उसका भी इस्तेमाल इस मसले को और समझने में किया। फिर फरकिया के नाम से रिपोर्ताज की एक किताब लिखी जो ई बुक बनी है। अब यह किताब उपन्यास के रूप में आई है।

7. किताबों के प्रचार प्रसार के बारे में आपकी राय क्या है?

यह प्रचार का युग है। सरकार फ्री में कुछ बांटती है तो उसका भी प्रचार करती है ताकि सही व्यक्ति को पता चल सके और वह उसका लाभ ले सके। लोगों को पता चलना चाहिये कि आपने फलां किताब लिखी है और उस किताब का विषय यह है। तभी तो पाठक उस किताब को खरीदेंगे या कहीं पड़ी मिली तो उठा कर पढ़ेंगे। वरना आज के जमाने में किसी को फुरसत कहां कि वह हर साल छपने वाली लाखों किताबों में से अपने लायक किताब तलाश सके। आज तो जमाना यह है कि पाठक को इतनी सुविधा मिलनी चाहिये कि वह मोबाइल से क्लिक करके किताब मंगवा सके या मोबाइल पर ही पढ़ डाले। आज लोगों की इतनी व्यस्तता है कि आप उससे यह अपेक्षा नहीं कर सकते कि वह कोयले के ढेर में हीरा तलाशे। इसलिए प्रोमोशन जरूरी है।

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