अभिवृद्धि एवं विकास के सिद्धांत

अभिवृद्धि और विकास के सिद्धांत

बालक की वृद्धि और विकास सुनिश्चित नियमों के अनुरूप होती है। अभिवृद्धि में हुए परिवर्तन मात्रात्मक होते हैं जिन्हें ना पाया तोला जा सकता है किंतु विकास का अर्थ शरीर में होने वाले सभी परिवर्तन हैं, विशेष रूप से रूप और आकार में परिवर्तन है। दोनों परिवर्तन साथ साथ चलते रहते हैं फिर भी अभिवृद्धि और विकास के सिद्धांत व नियम है जो इस प्रकार है :

1. समान प्रतिमान का सिद्धांत

 एक जाति के जीवो में विकास का एक क्रम पाया जाता है और विकास की गति का प्रतिमान भी समान रहता है यही शिरोपुच्छ का नियम है जिसका अर्थ है कि सभी बालकों में विकास का क्रम समान होता है। समान प्रतिमान का सिद्धांत हरलॉक ने दिया।गैसेल कहना है - "यद्यपि दो व्यक्ति समान नहीं होते, किंतु सभी सामान्य बालकों में विकास का क्रम समान होता है।"
सभी बालकों का गर्भावस्था या जन्म के बाद विकास का क्रम सिर से पैर की ओर होता है।

2. सामान्य से विशिष्ट क्रियाओं का सिद्धांत

इसका अर्थ है कि बालक के विकास के सभी क्षेत्रों में पहले सामान्य प्रतिक्रिया होती है, फिर विशिष्ट क्रिया होती है। उदाहरण के लिए -पहले बालक किसी वस्तु को पकड़ने के लिए अपने हाथ, पैर, सिर आदि सभी अंगों को प्रयोग में लेता है। बाद में केवल संबंधित अंग से ही प्रतिक्रिया होती है अर्थात केवल हाथ ही हिलाता है।

3. सतत विकास का सिद्धांत

बालक के विकास का क्रम गर्भावस्था से लेकर वृद्धावस्था तक सतत रूप से चलता रहता है किंतु विकास की गति सदैव समान नहीं होती, कभी तीव्र कभी मंद होती है। जन्म के प्रथम वर्ष में सबसे अधिक तेजी से वृद्धि व विकास होते है। इसके बाद 11 वर्ष तक वृद्धि की दर तथा विकास की गति कम होती है।11 वर्ष के पश्चात पहले शरीर की लंबाई उसके बाद भार में तेजी होती है और लगभग 20 वर्ष के पश्चात वृद्धि और विकास पूर्णता को प्राप्त हो जाते हैं।
स्किनर (Skinner) के मत में - "विकास प्रक्रियाओं की निरंतरता का सिद्धांत केवल इस तथ्य पर बल देता है कि व्यक्ति में कोई परिवर्तन आकस्मिक नहीं होता है।"

4. परस्पर सम्बधता का सिद्वान्त

बालक के विभिन्न गुण परस्पर संबंधित होते हैं। एक गुण जिस अनुपात में विकसित हो रहा है उसी अनुपात में अन्य गुणों का विकास होता है। उदाहरण के लिए तीव्र बुद्धि वाले बालक के मानसिक विकास के साथ ही शारीरिक व सामाजिक विकास की गति भी तीव्र होती है, किंतु शरीर के सभी अंगों का विकास एक गति से नहीं होता है। विकास की गति में भिन्नता पाई जाती है।
 उदाहरणार्थ 6 वर्ष की आयु तक मस्तिष्क पूर्ण विकसित हो जाता है जबकि हाथ -पैर, नाक - मुँह आदि किशोरावस्था में पूर्णता को प्राप्त होते हैं।
विकास के विभिन्न गति के सिद्धांत डग्लस एवं हालैण्ड ने दिया।

5. मध्य-बाह्य विकास का सिद्धांत 

जैसे वृद्धि और विकास सिर की ओर से पैरों की ओर होता है उसी प्रकार वृद्धि एवं विकास मध्य भाग से प्रारंभ होकर अन्य बाह्य भागों की ओर बढ़ता है - यह अत्यधिक महत्वपूर्ण नियम है।
अर्थात् पहले शरीर के मध्य भाग का विकास होता है उसके बाद घुटने हाथ पैर तथा उंगलियां विकसित होती है। इसी प्रकार यह भी महत्वपूर्ण है कि सबसे पहले अनुक्रिया मस्तिष्क में होती है। उसके पश्चात अन्य अगं अपना कार्य करना आरंभ करते हैं।

6. वृद्धि एवं विकास में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि वृद्धि विकास का आरंभ एक कोशिका के रूप में होता है। यह माता के रक्त से अपना पोषण प्राप्त करती है। बाद में कोशिकाओं की संख्या एवं उनके आकार में वृद्धि होती जाती है। इस वृद्धि और विकास का निर्धारण गुण सूत्रों द्वारा होता है जो माता-पिता से बालक को प्राप्त होते हैं।
 साथ ही यह भी महत्वपूर्ण तथ्य है की वृद्धि और विकास की गति समान नहीं होती। कभी तीव्र गति होती है तो कभी मंद।

7. एकता और विभिन्नता का सिद्धांत-

 इस सिद्धांत का अर्थ है कि प्रारंभ में बालक के व्यवहार सामान्य होते हैं, बाद में उनमें विशिष्टता आती है। अर्थात् वृद्धि और विकास सामान्य से विशिष्ट की ओर अग्रसर होता है। बालक की भाषा के विकास में यही नियम कार्य करता है।
नोट - आकस्मिक विकास का सिद्धांत हॉल ने दिया।

• वृद्धि और विकास के सिद्धांतों के शैक्षिक निहितार्थ

1. बालक अनवरत अधिगम प्रक्रिया के द्वारा धीरे-धीरे सीखता है इसलिए अभिवृद्धि और विकास के अनुसार ही धीरे-धीरे विषय वस्तु का प्रस्तुतीकरण करना चाहिए। बालक किसी विषय वस्तु को एकाएक नहीं समझ पाएगा।
2. विकास की गति के सिद्धांत का शैक्षिक निहितार्थ है कि पाठ्यक्रम में विषय वस्तु में व्यक्तिगत शिक्षण की व्यवस्था पर जोर दिया जाना चाहिए अर्थात् बालक की आयु के आधार पर उसकी क्षमता के अनुसार ज्ञान प्राप्त कराने का प्रयत्न किया जाना चाहिए।

3.शिक्षक को चाहिए की विषय वस्तु को क्रमानुसार प्रस्तुत करें। पहले सरल और बाद में कठिन विषय वस्तु छात्रों के सम्मुख रखी जाए।

4.शिक्षक को चाहिए कि पहले विषय वस्तु का विश्लेषण करें फिर उसका संश्लेषण किया जाए। पूर्ण से अंश के सिद्धांत को अपनाना चाहिए।

5. विकास के सिद्धांतों के अनुसार शिक्षक पहले सामान्य बातों का ज्ञान छात्रों को दें तत्पश्चात उससे संबंधित विशिष्ट बातें बताई जा सकती हैं।

6. वृद्धि व विकास के शैक्षिक निहितार्थ यह भी है कि बालक के उचित विकास के लिए वंशानुक्रम और वातावरण दोनों को ध्यान में रखा जाना चाहिए।

सारांशतः यह कहा जा सकता है कि अभिवृद्धि और विकास के सिद्धांतों का ज्ञान शिक्षक को इस तथ्य से अवगत कराता है कि किस आयु में बालक से क्या अपेक्षाएं रखी जा सकती है।
इस प्रकार वृद्धि एवं विकास के ये सिद्धांत शिक्षक के लिए अति महत्त्व के हैं। वृद्धि एवं विकास के सिद्धांतों का ज्ञान अध्यापक को बताता है कि बालक से कब किस प्रकार के व्यवहार की अपेक्षा की जा सकती है। साथ ही इसके ज्ञान से बालकों के सही विकास के अनुकूल वातावरण की सृष्टि की जा सकती है। यदि अध्यापक इन नियमों से अनभिज्ञ होता है तो ऐसी स्थिति में बालकों के साथ यथोचित व्यवहार नहीं करता इससे उनमें हीन भावना का उदय हो सकता है। उनमें तनाव और संघर्ष पैदा हो सकता है। अतः वृद्धि और विकास के नियमों का ज्ञान अध्यापक के लिए आवश्यक है जिससे वह बालकों के साथ सही व्यवहार कर सके।

 • अभिवृद्धि और विकास के विभिन्न चरण

 प्रत्येक आयु में विकास के क्रम को चार भागों में विभाजित किया जाता है -
१. जन्म पूर्व अवस्था : गर्भाधान से जन्म तक। 
२. शैशवावस्था : जन्म से 5 वर्ष तक।
३. बाल्यावस्था : 6 वर्ष से 12 वर्ष तक।
४. किशोरावस्था : 13 वर्ष से 19 वर्ष तक ।

(१) जन्म पूर्व अवस्था में अभिवृद्धि एवं विकास -

जन्म से पूर्व विकास न केवल बड़ी तीव्र गति से होता है बल्कि व्यवस्थित और पूर्वानुमानगम्य भी होता है। जन्म पूर्व अवधि को प्राय तीन अवस्थाओं में बांटा जाता है। प्रत्येक का विकास का स्वरूप अपना अलग ही होता है। यह तीन अवस्थाएं हैं -
१. डिबांवस्था, जो गर्भाधान से लेकर दूसरे सप्ताह के अंत तक रहती है।
२. भ्रूण अवस्था, जो दूसरे सप्ताह के अंत से दूसरे मास के अंत तक रहती है।
३. गर्भावस्था, जो दूसरे माह के अंत से जन्म से पूर्व तक रहती है।
 बालक की गर्भकालीन वृद्धि और विकास के दो प्रमुख सिद्धांत अति महत्वपूर्ण है -

१. शिरो पुच्छ विकास - इसका अर्थ है की वृद्धि और विकास सिर की ओर से पैरों की ओर होता है। अर्थात पहले सिर के पास वाले भागों में वृद्धि होती है उसके बाद नीचे के अंगों की वृद्धि होती है।

२.मध्य-बाह्य विकास - इसका अर्थ है कि पहले मध्य भाग में वृद्धि और विकास होता है फिर अन्य भागों की ओर बढ़ता है।

(२)  शैशवावस्था में अभिवृद्धि और विकास

शैशवावस्था प्राय: दो कालों में बाँटी जा सकती है १.सद्‌योजातावस्था २.नवजातावस्था ।
 गर्भनाल कट जाने पर शिशु माता के शरीर से बाहर की दुनिया के नए पर्यावरण से समायोजन स्थापित करता है तब से नवजातावस्था प्रारंभ होती है।
 इस अवस्था में बालक में ठंडा, गर्म, खुशी, दर्द आदि भावनाएं विकसित हो जाती है। मानसिक विकास (mental development) अधिक नहीं होता फिर भी सोचने की क्षमता का विकास हो जाता है। बालक को संवेगों पर नियंत्रण नहीं होता। और असुरक्षा की भावना उसमें रहती है ।पहले वह दूसरों पर निर्भर रहता है किंतु बाद में स्वतंत्र रहने की इच्छा प्रकट करने लगता है। नैतिक विकास का अभाव रहता है। उसकी क्रियाए मूल प्रवृतियों से अधिक प्रभावित रहती हैं। वृद्धि की दृष्टि से पेशी नियन्त्रण, धड़ के भाग व टांगों के मार्ग का नियंत्रण, हाथों में नियंत्रण आदि आ जाता है। खिलौने पकड़ना, फेंकना आदि क्रियाएं करता है।

(३) बाल्यावस्था में वृद्धि एवं विकास 6 से 12 वर्ष-


इस अवस्था में शारीरिक और मानसिक रूप से स्थिरता बालक में आ जाती है। वातावरण से अपना सामंजस्य बना लेता है। बाह्य जगत में उसकी रुचि बढ़ जाती है। वह बहिर्मुखी होने लगता है। हर वस्तु के विषय में उसकी जिज्ञासा होती है। प्रत्येक क्षेत्र में उसमें स्थायित्व की भावना आ जाती है।
 वृद्धि और विकास इस उम्र तक पर्याप्त रूप से हो चुका होता है। पेशीय नियंत्रण पूर्ण हो चुका होता है। इस समय वृद्धि समान रूप से होती है। 6 वर्ष की आयु तक लंबाई औसतन 4.5 इंच हो जाती है। शारीरिक वृद्धि पूर्व की तुलना में मंद हो जाती है।
अभिवृद्धि और विकास में शारीरिक वृद्धि व विकास और चालक विकास का विशिष्ट क्षेत्र होता है। ये दोनों ही विकास शिरोपुच्छ नियम तथा मध्य क्षैतिज नियमों के अनुरूप ही होते हैं। इस समय तक भार, लंबाई हड्डियों का विकास एवं उनमें अभिवृद्धि होती है।

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