अध्यापकों के लिए संवेगात्मक विकास के निहितार्थ

*अध्यापकों के लिए संवेगात्मक विकास के निहितार्थ--*
 बालक के संवेगों के विकास पर ही बालक का शारीरिक, मानसिक व चारित्रिक विकास निर्भर होता है। शिक्षा का कार्य है कि सभ्य, सुशिक्षित, संस्कारित,अनुशासित और बहुआयामी व्यक्तित्व वाले नागरिकों का विकास करें। उचित रूप से संवेगों का प्रदर्शन व नियंत्रण करने में सफल बालक स्वयं और समाज दोनों के लिए हितकारी होते हैं। संवेगों के प्रशिक्षण में अध्यापकों की प्रमुख भूमिका होती है। बालक का व्यवहार उसके व्यक्तित्व का निर्धारण करता है और व्यवहार और व्यवहार संवेगों की उपस्थिति से प्रभावित होता है। संवेगों का उचित विकास नहीं होता है तो बालक का संपूर्ण व्यक्तित्व विघटित हो सकता है। आवश्यकता इस बात की है कि अध्यापक विद्यार्थियों के संवेगात्मक विकास में सहायक बने। अतः अध्यापक को बालक के संवेगात्मक विकास और संवेग प्रशिक्षण विधियों से अवगत होना आवश्यक है। तभी वह अपने दायित्वों को पूर्ण करने में सफल हो सकता है। _अध्यापकों के लिए संवेगात्मक विकास के निहितार्थों को निम्न बिंदुओं में प्रस्तुत किया जा सकता है---:_
1-: अध्यापक को शिक्षण की ऐसी व्यवस्था बनानी चाहिए जिसमें विद्यार्थी खुलकर अपने संवेगों की अभिव्यक्ति कर सकें और उनके मन में शैक्षणिक गतिविधियों के प्रति व्याप्त भय वा चिंताएँ दूर हो सकें।
2-: विद्यार्थियों को अपने संवेगों की अभिव्यक्ति के प्रोत्साहित करना अध्यापकों का कर्तव्य है और इसके लिए अध्यापकों को ऐसे अवसर सृजित करना चाहिए जिससे विद्यार्थियों की झिझक समाप्त हो सके।
3-: अध्यापकों को ध्यान रखना चाहिए कि बालक के संवेगों के विकास किए बिना उसका बौद्धिक विकास करना संभव नहीं है। अध्यापक को अपने अंदर यह क्षमता पैदा करनी चाहिए कि वह कक्षा के बाहर विषम परिस्थितियों में भी अपना भावनात्मक संतुलन बनाए रखें तथा तथा सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाएं. जिससे वह बालकों के साथ समुचित व्यवहार कर सकेगा।
4-: अध्यापकों को चाहिए कि विद्यार्थियों के माता-पिता से निरंतर संपर्क बनाएँ रखें। विद्यार्थियों के संवेग प्रशिक्षण में माता पिता का सहयोग प्राप्त करने के साथ-साथ विद्यार्थियों की शारीरिक कमजोरियों , न्यूनताओ, बीमारियों आदि से अवगत हो,  जिससे विद्यार्थियों के लिए उचित निर्देशन एवं परामर्श दे सके।
5-: अध्यापकों को माता-पिता को स्पष्ट रूप से अवगत कराना चाहिए कि बालकों के संवेगात्मक विकास पर पारिवारिक वातावरण का बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है। बालकों को अनुकूल वातावरण प्रदान करने के लिए माता-पिता को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
6-: अध्यापक की संबोधन क्षमता, वैयक्तिक आकृति, संयम, उत्साह, मानसिकता निष्पक्षता, शुभचिंतन, सहानुभूति बालक की संवेगों को प्रशिक्षित करने में सहायक होती है।
7-: पाठ्य सहगामी क्रियाओं का बालक के संवेगात्मक विकास में बड़ा योगदान होता है । इन कार्यक्रमों के द्वारा बालकों को आत्माभिव्यक्ति, स्वयं को तथा दूसरों को जानने की समझदारी ,स्वयं की रुचियों को व्यापक बनाने, स्वयं के कार्यों को नियंत्रित करने की अवसर प्राप्त होते है। अध्यापकों को पाठ्य सहगामी क्रियाओं की आयोजन में विशेष रुचि लेनी चाहिए ।
8-:गृह कार्य प्रदान करते समय अध्यापकों को बालकों की आयु और व्यक्तिगत विभिन्नताओं को ध्यान में रखना चाहिए
9-: अध्यापक को शिक्षण विधियों का चयन और शिक्षण कार्य में यह ध्यान रखना चाहिए कि बालक की संवेगात्मक आवश्यकताओं की पूर्ति हो सके।

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