धर्मसंकट : दिव्या विजय


दिव्या विजय अपने पहले कहानी संग्रह ‘अलगोज़े की धुन पर’ के पाठकों के बीच पहुँचने के उपरांत अपने को कथाकार के तौर पर नित्य समृद्ध करती जा रही हैं। उनकी हर अगली कहानी का कथानक हमारी पहुँच एक नयी दुनिया तक बनाता है… वह दुनिया जो स्वयं ही नित्य परिवर्तनशील है। इस परिवर्तनशीलता को दर्ज करते हुए वे अपनी भाषा एवं शिल्प के प्रति सजग रहती हैं। दिव्या विजय की भाषा का प्रवाह… उसका आरोह-अवरोह पाठक को कथानक से जोड़े रहता है। तो आइए, हम पढ़ते हैं उनकी नयी कहानी जो हमें संवेदित करने के साथ ही ठहर कर सोचने को मजबूर करती है।


धर्मसंकट : दिव्या विजय
मधुसूदन जी को रिटायर हुए करीब छह महीने बीत गए हैं पर उनकी दिनचर्या में कोई अंतर नहीं आया है. उसी चुस्ती-फुर्ती से रोज़ का काम निबटाते हैं और दस बजते-बजते स्कूटर उठा कर निकल पड़ते हैं. उनका कहना है निठल्ले बैठे रहने से शरीर को जंग लग जाता है. इसलिए अपने कल-पुर्ज़े चालू रखने का इंतज़ाम उन्होंने कर लिया है.

बैंक की नौकरी से क्लर्क के ओहदे से रिटायर हुए हैं मधुसूदन बाबू. छोटा-सा शहर. कौन ऐसा है जो उन्हें नहीं जानता. उन की कर्मठता के चर्चे शहर भर में होते हैं. उन-सा ईमानदार और मेहनती इस शहर में बिरला ही होगा. लोग अपने बच्चों को उनकी मिसाल देते हैं. अपने काम में इतने माहिर कि मजाल है हिसाब में कोई गलती रह जाए. इसलिए रिटायर होते ही बहुत-से लोग उन्हें अपने यहाँ बुलाने के लिए लालायित थे. एक-दो कोचिंग इंस्टिट्यूट ने तो उन्हें अपने यहाँ एकाउंट्स पढ़ाने तक का ऑफर दे डाला. इतने अनुभवी और उद्यमी व्यक्ति की आवश्यकता सबको थी पर मधुसूदन बाबू सबको एक-सा जवाब देते, “इतने साल सरकार की चाकरी कर ली. अब कुछ हज़ार रुपल्ली की खातिर अपनी आज़ादी नहीं दूँगा. यही तो समय है अपने मन की करने का.” 

हाँ, यह बात अलग है कि यहाँ उनका और पत्नी का मन अलग पड़ गया. जहाँ पत्नी बरसों से प्रतीक्षा कर रही थी कि मधुसूदन बाबू रिटायर हो जायेंगे तो उन्हें समय देंगे. उन्होंने मंसूबे बाँध रखे थे कि अब वे सुबह की सैर पर साथ जायेंगे, रिश्तेदारों से मिलना-जुलना करेंगे, तीर्थ-स्थलों के दर्शन को निकल पड़ेंगे. इतने सालों में लाख चाहने पर भी ऐसा नहीं हो पाया था. वह देर रात तक अपनी फाइलों में उलझे रहते, सुबह उठते ही फिर वही फाइलें, दिन भर दफ्तर. बाकी कामों के लिए समय निकल ही नहीं पाता. कई बार तो खाना भी कंप्यूटर या फाइल में सर घुसाए-घुसाए खाते. रिश्तेदारों के काम हों या बच्चों के..सब बरसों-बरस वह अकेली निपटाती रहीं. वह सोच रही थीं कि जिस साथ का उन्हें इंतजार था वह अब मिलेगा पर उन पर घड़ों पानी फिर गया जब मधुसूदन बाबू ने सेवा-संगम में अपनी सेवाएँ देना तय कर लिया. सेवा-संगम एक ग़ैर सरकारी संस्था है जो बहुत-से क्षेत्रों में पिछड़े और कमज़ोर वर्ग के उत्थान के लिए काम कर रही है. मधुसूदन बाबू ने सोचा कि क्यों न यहीं काम किया जाए. पैसा तो इतने सालों में ज़रुरत भर का कमा लिया. अब कुछ समाज सेवा भी कर ली जाए. 

तो वह पहुँच गए सेवा-संगम के दफ्तर. उधर सेवा-संगम वाले भी उन्हें देखकर गदगद. हाथों-हाथ लिया गया उन्हें. इतना सत्कार पाकर मधुसूदन बाबू तो फूले न समाये. जब तक नौकरी रहती है सारा आदर-सत्कार नौकरी की बदौलत होता है. लेकिन उसके बाद जो सम्मान मिलता है वह व्यक्ति के रूप में मिलता है. उनकी इच्छा जानते ही संस्था वालों ने कहा,

“नेकी और पूछ-पूछ. हमें भी अपने अकाउंट संभालने के लिए कोई चाहिए था. आपसे बेहतर हमें कौन मिल सकता है.” 
सुनकर मधुसूदन बाबू खिल उठे.

“कहिये कब से आऊँ?”

“आपका दफ्तर है. जब चाहें आयें. न हो तो आज ही से शुरू कर दें.” कहते हुए सामने वाला व्यक्ति अपनी कुर्सी छोड़ खड़ा हो गया. 

“अरे आप क्यूँ खड़े हो गए. आप बैठिये. आज तो संभव न होगा. कल से आता हूँ.” वह भाव-विभोर थे. 

“अरे साहब, आपका जब मन हो आइये, जब मन न हो न आइये. यह तो सेवा है. मन से होगी. आप पर कोई बंदिश थोड़े ही है.” उसकी मुस्कराहट से मधुसूदन बाबू का मन हिलोरें ले रहा था. 

“लेकिन आपकी सेवा का कोई शुल्क हम नहीं दे सकेंगे.” कुर्सी वाला व्यक्ति अब झिझकते हुए कह रहा था. 

“जी, जी जानता हूँ मैं. इसीलिए यहाँ आया हूँ. सेवा का मूल्य चाहिए होता तो यहाँ कतई न आता. आप निश्चिन्त रहिये.” वह सामने वाले की झिझक ख़त्म कर देना चाहते थे. 

“तो ठीक है. कल से यह कमरा आपका हुआ.” संस्था वाले इतना योग्य व्यक्ति पाकर खुश थे. वह हाथ जोड़कर बाहर निकल आये. 

मधुसूदन बाबू मिठाई लेकर घर पहुँचे तो पत्नी सिल्क की साड़ी में लिपटी तैयार बैठी थी. 

“कहाँ लगा दी इतनी देर? कब से इंतज़ार कर रही हूँ.” उनके हाथ में मिठाई का डब्बा देखकर वह खीज गयीं. 

“यह मिठाई क्यों. अभी मुंडन-संस्कार में जाना है. मीठा तो वहाँ भी होगा.”  

उनके भांजे के बेटे का मुंडन था. मधुसूदन बाबू को उन्होंने पहले ही कह दिया था कि आज देर नहीं होनी चाहिए. उनका क्या, वह तो पुरुष हैं. औरतों के बीच बैठकर ताने तो उन्हें सुनने पड़ते हैं. यही सब सोचकर उन्हें कोफ़्त हो रही थी. ऊपर से यह मिठाई. इस उम्र में ज़्यादा मिठाई पचती नहीं. फिर बाँटते रहो धोबी और सफाई वाली में. अब रिटायर हो गए हैं. इतने खुले हाथ से खर्चा करेंगें तो कैसे चलेगा. पर ये कुछ समझें तब न. 

“अरे यह मिठाई मेरी दूसरी पारी शुरू करने की है. लो खाओ.” कहते हुए उन्होंने मिठाई पत्नी के मुँह में ठूँस दी और बेटे को फ़ोन लगा दिया. 

सारी बात सुनकर बेटे की वही प्रतिक्रिया थी जो किसी भी फरमाबरदार बेटे की होती. उधर से आवाज़ आई,

“पापा, क्यों इन चक्करों में पड़ रहे हो. घूमो-फिरो, आराम करो. कमाने के लिए मैं हूँ न.”

बेटे को इतनी चिंता करते देख मधुसूदन बाबू मन ही मन मुस्कुराये, “अरे नहीं बेटा, पैसे कमाने के लिए नहीं, स्फूर्ति रहती है मन और शरीर में. तुम चिंता मत करो.”

सुनकर पत्नी भुनभुनायी, “लेना एक न देना दो. न पैसे मिलेंगे, वक़्त जाएगा सो अलग. क्या ज़रुरत है वहाँ जाने की.”

“भई, हर काम पैसे के लिए थोड़े न होता है. कुछ काम मन की ख़ुशी के लिए भी होते हैं. और कौन सा बंध गया हूँ. तुम्हारा जब मन हो रोक लेना. नहीं जाउँगा.” कहते हुए उन्होंने मिठाई का दूसरा टुकड़ा उठा लिया.

मगर यह सिर्फ कहने की बात थी. वह दिन था और आज का दिन है. मधुसूदन बाबू को सेवा-संगम का काम ऐसा रास आया कि फिर वह किसी के रोके नहीं रुके. आँधी हो, तूफ़ान हो या ज़लज़ला ही क्यों न आ जाये वहाँ जाने से उन्हें कोई ताकत नहीं रोक पाती. तबियत खुद की ख़राब हो या पत्नी की, कहीं जाना हो या बेटा छुट्टी पर घर आया हो उनकी पहली प्राथमिकता थी सेवा-संगम. सिनेमा का कार्यक्रम बनता तो या तो टिकट बर्बाद हो जाते या उनके बगैर सबको जाना पड़ता. ख़ुदा न खास्ता कभी मेहमान आ जाएँ तो उनके इंतज़ार में ऊँघने लगते. अब तो खैर किसी ने आना ही बंद कर दिया है. होली जलाने के लिए अब कॉलोनी में उनका इंतज़ार नहीं किया जाता. चंदा इकट्ठा करने के लिए उन्हें कोई बुलाने नहीं आता. दफ्तर से लौटकर शाम को होने वाली बैठकों ने दम तोड़ दिया है. सबको पता है मधुसूदन बाबू अब व्यस्त रहते हैं. जो बात लोग समझ नहीं पाए वो ये कि मधुसूदन बाबू ऐसा क्या काम करते हैं जिसमें नौकरी से भी अधिक व्यस्तता रहती है. 

इधर सेवा-संगम से फ़ोन आए, उधर मधुसूदन बाबू झट हाज़िर. अलादीन का जिन्न हो गए हैं वह उनके लिए. “आता हूँ अभी थोड़ी देर में, बस मैं अभी आया”, सुनते-सुनते सब जान गए हैं कि इस अभी की मियाद निश्चित नहीं है. अमूमन यह उनके अंदाज़े से ज़्यादा ही निकलती है. अब मधुसूदन बाबू भी क्या करें. बतरस का जो मज़ा सेवा-संगम में है वह घर में कहाँ. घर में अकेली पत्नी, सेवा-संगम में इतने सारे लोगों का जमघट. और सिर्फ लोग ही नहीं, असल बात तो वहाँ मिलने वाले सम्मान की है. यूँ सम्मान उन्हें हमेशा मिला, सबसे मिला पर यहाँ कुछ था जो अलग था. अभी तक उनके जीवन में घटी बातों से कुछ अलग. बैंक में उन्होंने हमेशा किसी के अधीन काम किया लेकिन इस ब्रांच के तो वह सर्वेसर्वा हो चले थे. मजाल है उनसे पूछे बिना कोई काम हो जाए. सब जगह उन्हीं की पुकार, उन्हीं की हाँक. नोटों के बंडल तिजोरी में और तिजोरी की चाबी उनके पास. बैंक की चेकबुक, पासबुक सब उनके पास. कोई जलसा हो उनके हस्ताक्षर, कोई बिल पास होगा उनकी हामी पर. बाहर कहीं जाना हो तो मधुसूदन बाबू हाज़िर, अपने शहर से संस्था की नुमाइंदगी करनी हो तो वह हैं ही. वह आये तो थे एकाउंट्स सँभालने, धीरे-धीरे सब संभाल लिया. बाकी लोग भी मज़े में. न कोई काम, न गड़बड़ी होने पर उनकी ज़िम्मेदारी. वे लोग पूरी तनख्वाह उठाते और आराम करते. इधर मधुसूदन बाबू बेगार करते. मगर उनको तो यह बेगार न लगती. बदले में जो उन्हें मिल रहा था उसकी बराबरी तो दुनिया की कोई मुद्रा न कर पाती. शक्कर में पड़ी चींटियों-सी उनकी हालत थी. वह और उनका सेवा-संगम. सब मीठा-मीठा महसूस होता. 

पत्नी जी के अरमान, अरमान ही रह गए. वह मधुसूदन बाबू को देख-देख कर कुढ़ती रहतीं. उनकी ज़िन्दगी तो तब भी ऐसी, अब भी ऐसी. बस एक फेसबुक भर का बदलाव था. अब वही उनके अकेलेपन का साथी हो चला था. वह उसी से अपना मन बहलातीं. लेकिन थोड़े दिनों बाद फेसबुक जले पर नमक छिड़कने लगा. सेवा निवृत्त दूसरे लोगों को देखतीं तो तीर उनके सीने से आर-पार हो जाता. कोई अपने घर की छत को बगीचे में बदल रहा होता, कोई बीवी के साथ मंदिरों के बहाने पहाड़ की ठण्ड में, कम्बल में दुबक पुरानी बातें याद कर रहा होता. किसी घर में मियाँ-बीवी के ठहाके गूँजते तो कोई बीवी की फरमाइश पर कच्चे-पक्के चावल बना कर खिला रहा होता. लेकिन उनके पति...वह अब भी रात गए तक फाइलों में सर खपाए रहते. सुबह उठते ही फिर वही सब. जाने कैसी-कैसी फाइलों का अम्बार लग गया था घर में. श्रीमती जी का काम और बढ़ गया था. घर का काम कम था जो फाइलों को सहेजने-समेटने का काम और गले आ पड़ा. जिधर देखो उधर फाइलें.

वह चिड़चिड़ातीं, “जाने ऐसा क्या काम होता जिसके लिए यह मुई फाइलें ही चाहिए. सारी दुनिया कंप्यूटर में सिमट गयी है और एक यह हैं जो फाइल लेकर चलते हैं तो लगता है अपने लाव-लश्कर के साथ कहीं का किला फतह करने निकल रहे हों.”

लेकिन मधुसूदन जी के पास यह सब सुनने का समय कहाँ था. वह तो ये जा और वो जा. कहने वाला अपना सा मुँह लेकर देखते रह जाए. 

उम्रदराज़ होते जाना बड़ी टेढ़ी शय है...खासकर घर में प्रतीक्षारत स्त्रियों पर उम्र भारी बीतती है. अच्छे दिनों की प्रतीक्षा में झींक-झींक कर मधुसूदन बाबू की पत्नी दुबला गयी थीं. कब उन्हें जटिल रोगों ने आ जकड़ा वह जान नहीं पायीं. कभी चलते-चलते चक्कर आ जाता तो कभी घर का काम करते हुए साँस धौंकनी की तरह चलने लगती. सर अलग दर्द से फटा रहता. फिर भी मरने से पहले तक अपने कर्मों से विमुख न होने वाली भारतीय स्त्री की विशिष्टता से लैस वह अपने काम निबटाती जातीं. अगले हफ्ते बेटा आने वाला था. उस के साथ डॉक्टर के जायेंगी. बड़ी भाग्यशाली हैं. पति न सही, बेटा उनका बहुत ख़याल रखता है. पिछले हफ्ते अपने एक डॉक्टर दोस्त को भेजा था. घर पर ही चेक-अप हो गया. अस्पताल की लम्बी लाइन से छुटकारा मिला. उस ने कुछ टेस्ट लिखे थे. उसी के लिए बेटा लम्बी छुट्टी लेकर आ रहा है. कह रहा था, 

“माँ, हम एक साथ वक़्त बिताएँगे और आपके टेस्ट भी हो जायेंगे.” 

सुनकर उन्होंने उलाहने भरी दृष्टि से मधुसूदन बाबू को देखा पर वह तो प्रसन्नचित्त, बिना किसी ग्लानि के अपने काम में डूबे थे. वाहवाही का ऐसा भी क्या लोभ कि अपने जीवन-साथी का सुख-दुःख बिसरा दिया जाए. दूसरे लोगों का साथ क्या आधा अंग मानी जाने वाली पत्नी को भी विस्मृत कर देता है. पत्नी को पहले तो क्रोध आया फिर एक गहरी उदासी उनके मन पर चस्पां हो गयी. सामने बैठा पुरुष जिसे वह अपना मानती आई हैं, क्या वह सचमुच उनका अपना है. इतने सालों में आपस में उन्होंने कितने शब्द कहे होंगे? कितना समय सिर्फ एक-दूसरे के साथ बिताया होगा? वह अपलक उन्हें देखती रहीं. उनकी दृष्टि मधुसूदन बाबू के होंठों पर अटक गयी. वहाँ मंद हास था. औचक ही उनका मन नए तरह के भाव से भर गया. कैसी उत्फुल्लता है उनके चेहरे पर, अपने मन का काम कर सकने की संतुष्टि भी. वह स्वयं न सही पर मधुसूदन बाबू तो अपने मन का जीवन व्यतीत कर रहे हैं. वह क्यों रोड़ा बनें इसमें? साँझ की दहलीज़ पर आ ठहरे जीवन में किसी एक के जीवन में पुलक शेष है तो उन्हें अधिकार नहीं कि वह उसे अपनी अपेक्षाओं की भट्टी में झुलसा दें. वह एकाएक उदार हो चली थीं. हर प्रकार के द्वेष से मुक्त हो उन्होंने अपने मन में उनके लिए आशीर्वचन पढ़े. उन्होंने खुद से वादा किया कि मधुसूदन बाबू से झगड़ना एकदम बंद. वह करें अपना काम, वह कुछ नहीं कहेंगी. न बन पाए हों मधुसूदन बाबू उनके मन के साथी, वह स्वयं तो कभी अपने कर्तव्य से विमुख नहीं हुईं. यह बात उनकी संतुष्टि के लिए पर्याप्त है. सोचते हुए भीषण सरदर्द के बावजूद वह मुस्कुरा दीं. 

अगली सुबह मधुसूदन बाबू जल्दी-जल्दी अपने काम निबटा रहे थे. आज संस्था के क्षेत्र प्रमुख आने वाले हैं. वह रोज़ से अधिक उत्साह में थे. वह जल्द-से-जल्द सेवा-संगम पहुँच कर सारे इंतज़ाम परख लेना चाहते थे. वह नहीं चाहते कोई कमी रह जाए. क्षेत्र प्रमुख फ़ोन पर कह रहे थे उनकी काफी तारीफ सुनी है. वह इन तारीफों को झुठलाना नहीं चाहते. उनके आने से पहले सब अपनी आँखों से देख लेना चाहते हैं..कहीं कोई कमी-बेसी न रह जाए. कल फ़ोन पर हुई बातें उनके मन में अब तक गुदगुदी मचाये हुई हैं. वह यहीं नहीं बल्कि प्रदेश तक में प्रख्यात हो चुके हैं. उनका नाम अब अनजान नहीं रह गया है. वह बाहर से तो कुछ नहीं कह रहे पर मन बल्लियों उछल रहा है. एक सुगबुगाहट सेवा-संगम में भीतर ही भीतर पर फैला रही है जो उन तक भी पहुँच चुकी है. सब कुछ ठीक रहा तो आज उन्हें सर्वश्रेष्ठ कार्यकर्ता के ख़िताब से नवाज़ा जायेगा. एक अनूठे रस से सराबोर थे वह आज. 

वह निकलने को थे कि घर की शांति उन्हें कुछ अखरी. न बर्तनों की खटपट, न पत्नी जी की बड़बड़ाहट . आज क्या वह अभी तक जागी नहीं? कल तबियत कुछ अधिक ही ख़राब लग रही थी. उसे कह देते हैं कि खाने के लिए परेशान होने की ज़रुरत नहीं. आज उनका खाना वहीं संस्था में है. पत्नी के लिए भी वहीं से लेते आयेंगे. पत्नी को यह बात कहने कमरे तक आये तो उनके होश उड़ गए. कमरा बदबू से भरा था. बिस्तर मूत्र-पाखाने में लिथड़ा था. पत्नी चित्त पड़ी थीं. कोई हरकत उनके शरीर में नहीं दिखाई दी तो वह डरते-डरते बिस्तर तक आये और उनकी नाक के आगे हाथ लगा दिया. न, साँस नहीं थी. उन्होंने पास पड़ी कुर्सी का हत्था पकड़ लिया. कब हुआ होगा यह? कोई आवाज़, कोई आहट तक नहीं. भनक तक नहीं पड़ी. उन्हें तो आज नींद ही नहीं आई थी. सारी रात दूसरे कमरे में बैठ क्षेत्रीय प्रमुख को दिखाए जाने वाले कागजों का मिलान करते रहे थे. उन्होंने उनके चेहरा देखा. पीड़ा का कोई चिन्ह नहीं न संघर्ष का संकेत. क्या यूँ ही, रात के किसी पहर! 

लेकिन अब? अब क्या करें वह? बेटे को फ़ोन करें या किसी स्थानीय सम्बन्धी को ख़बर करे या जाकर किसी पड़ोसी को बुला लायें. वह हतबुद्धि-से मन ही मन सारे विकल्प परख रहे थे. 

तभी हवा का झोंका आया. खिड़की से होकर उन पर से गुज़रते हुए पत्नी की बगल में रखे कागज़ पर आ ठहर गया. यह नोटपैड था जिस पर वह हिसाब लिखती थीं. क्या अंतिम वक़्त भी वह हिसाब लिख रही थीं. उत्सुकतावश उन्होंने नोटपैड उठाया. जिस पन्ने पर पेन फँसा था वहाँ दो पंक्तियाँ थीं,

“मुझे कभी कुछ हो जाए तो आप पीछे मुड़ कर मत देखिएगा. जो भी काम कर रहे हों वह पूरा कर ही आइयेगा. इसे मेरी पहली और अंतिम इच्छा मानिये.”

यह क्या कह गयीं वह! उन्होंने प्रेमवश ऐसा कहा अथवा प्रतिशोध के प्रयोजन से! वह हतप्रभ खड़े उन पंक्तियों को दोहरा रहे थे. जीवन भर वह यही तो करते रहे. उनका काम ही सदा उनकी प्राथमिकता रहा. अब अंतिम समय पत्नी ने इसी की इच्छा व्यक्त कर क्या अनर्थ कर दिया? उन्होंने यही तो चाहा कि जो आज तक होता रहा, वही अब भी हो. तो क्या वह उन की मृत देह को छोड़ सेवा-संगम चले जाएँ? पत्नी की इच्छा मानते हैं तो उसका अनादर होता है, उसकी इच्छा का मान नहीं रखते तो भी उसका तिरस्कार होता है. अब मधुसूदन बाबू क्या करेंगे?


परिचय :

नाम - दिव्या विजय, जन्म - 20 नवम्बर, 1984, जन्म स्थान – अलवर, राजस्थान, शिक्षा - बायोटेक्नोलॉजी से स्नातक, सेल्स एंड मार्केटिंग में एम.बी.ए., ड्रामेटिक्स से स्नातकोत्तर
विधाएँ - कहानी, लेख, स्तंभ

‘अलगोज़े की धुन पर’ कहानियों की पहली किताब। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं जैसे नवभारत टाइम्स, कथादेश, इंद्रप्रस्थ भारती, पूर्वग्रह, जनपथ, नया ज्ञानोदय, परिकथा, सृजन सरोकार आदि में नियमित प्रकाशन। इंटरनेट पर हिन्दी की अग्रणी वेबसाइट्स पर अद्यतन विषयों पर लेख। रविवार डाइजेस्ट में नियमित स्तंभ।

अभिनय : अंधा युग, नटी बिनोदिनी, किंग लियर, सारी रात, वीकेंड आदि नाटकों में अभिनय। रेडियो नाटकों में स्वर अभिनय। 

सम्मान - मैन्यूस्क्रिप्ट कॉन्टेस्ट विनर, मुंबई लिट-ओ-फ़ैस्ट 2017 
सम्प्रति - स्वंतत्र लेखन,  वॉयस ओवर आर्टिस्ट 
ईमेल- divya_vijay2011@yahoo.com

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