अपना रिक्शेवाला...
रुकता न थकता है कभी, न काम से जी वो चुराए,मन में हरदम गूँज लगन की, गाने श्रम के गाए।
उठते हम जब सोते-जगते, आलस में ही रहते,
लेने हमें पहुँचता हरदम, मोनू-पिंकी कहते।
सवारियों को ढोकर आए, चाहे जितना पसीना,
चिल्ले का जाड़ा हो या हो, जालिम जेठ महीना।
दुःख-सुख जीवन दो पहिए, जाने मन से बात,
हँसता-खिलता चलता जाए, दिन हो या हो रात।
मन में न एक पल भी निराशा, रहता मगन हमेशा,
आशाओं के फूल खिला लो, देता यही संदेशा।
© निशान्त जैन
बाल कविता संकलन 'शादी बन्दर मामा की' में संकलित।
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