होली का त्यौहार...
हिलता-खिलता-मिलता-जुलता,आया होली का त्यौहार।
नाचे तन-मन, नाचे जीवन
नाचे आँगन, नाचे उपवन,
रंग-बिरंगी ओढ़ चदरिया
धरती लाई नई बहार।
टेसू महके, चहके पंछी
धुन में अपनी हंस-हंसिनी,
चोंच मिलाकर करें ठिठोली
करें सवेरे का सत्कार।
अंबर चला बाँध के सेहरा
लिये संग तारों का पहरा,
लगता मानो धरा-वधू की
डोली लेने आए कहार!
शीत बीत दिन हुए सुहाने
कुनमुनी धूप लगी मस्ताने,
हँसी-खुशी की, खेल-मेल की
राग-रंग की लगी है धार।
ऊँच-नीच क्या, बैर-खार क्या
छोट-बड़न क्या, जात-पाँत क्या,
भेद मिटा गोरे-काले का
दसों दिशा में उमड़ा प्यार।
झगड़े-झंझट और झमेले
छोड़, भुला दो बैर कसैले,
फागुन की मदमस्त बयारें
आई हैं करने मनुहार।
© निशान्त जैन
बाल कविता संकलन 'शादी बन्दर मामा की' में संकलित।
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