डींडाक-डोंआनी(प्रबंध काव्य)।

           डींडाक - डोंआनी(प्रबंध काव्य)
कवि-: बंशी लाल 'बंशी'
जन्म स्थान-: चौफांद बोकारो स्टील सिटी, बोकारो।
प्रकाशक-: खोरठा साहित्य- सांस्कृतिक परिषद,बोकारो।
प्रकाशक-: 1992 ई.

*खोरठा साहित्य से सोंध माटी का सामान्य परिचय जो आपके JTET के लिए उपयोगी सिद्ध हो सकता है।
डींडाक-डोआनी का सामान्य परिचय: प्रबंध काव्य के दो रूप होते हैं- महाकाव्य और खंडकाव्य। डींडाक-डोंआनी एक खंडकाव्य है। यह काव्य बोकारो स्टील कारखाना की स्थापना और उसके लिए हुई विस्थापन की पृष्ठभूमि पर लिखा गया है। काव्य का मूल कथ्य विस्थापितों का अपने हक अधिकार के लिए संघर्ष और स्त्री विरोधी सामाजिक रीति परंपराओं के खिलाफ आंदोलन है।
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कथावस्तु यानि काव्य में वर्णन की गयी कहानी-::
इस काव्य में महुआ और करमा नामक मजदूर के नेतृत्व में बोकारो कारखाना की स्थापना के दौरान विस्थापित और निर्माण कार्य में लगे मजदूरों पर हो रहे अन्याय और अत्याचार के खिलाफ संघर्ष की कहानी है । साथ ही सामाजिक बुराइयों के विरुद्ध आंदोलन का भी वर्णन है। कहानी है -- जगन नामक एक स्वतंत्रता सेनानी और शहीद की बेटी है महुआ। पिता की असमय मौत के बाद परिवार की जिम्मेदारी निभाने के लिए महुआ को रेजा का काम करना पड़ता है। बोकारो स्टील प्लांट के लिए खेती बारी गंवा चुके हजारों विस्थापित महिला- पुरुष जीविकोपार्जन के लिए इस कारखाने के निर्माण कार्य में मजदूरी कर रहे थे। इन्हीं में से महुआ भी थी। महुआ एक तेज-तर्रार युवती है। वह काफी संवेदनशील और स्वाभिमानी है। किसी भी तरह का शोषण अन्याय उसे बर्दाश्त नहीं है। मजदूरी के दौरान ठेकेदार द्वारा अन्याय और आर्थिक शोषण के खिलाफ मुखर होकर आगे आती है। मजदूर साथियों को संगठित करती है। लोगों का साथ मिलता है। इस बीच करमा नामक युवक महुआ का खास सहयोगी बन जाता है। महुआ उसे अपना मुंह बोला भाई बना लेती है।
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*खोरठा साहित्य से सोंध माटी का सामान्य परिचय जो आपके JTET के लिए उपयोगी सिद्ध हो सकता है। अवश्य पढे और आगे भी शेयर करें-)))))
महुआ करमा की संगठन का विस्थापितों के हक में संघर्ष तेज होता है। इस क्रम में कई सफलताएं मिलती है। लेकिन महुआ कारखाना प्रबंध और ठेकेदार की आंखों का कांटा बन जाती है। वह इस कांटा को रास्ते से निकालने के लिए मौके की तलाश में रहते हैं । कर्मा अपने गांव की एक विधवा-युवती सुगिया से विवाह करता है। सुगिया तथाकथित उच्च जाति की और जमींदार खानदान की बाल विधवा है। विधवा जीवन से निराश हो चुकी सुगिया आत्महत्या करने के लिए दामोदर नदी में कूद जाती है। संयोग से कर्मा उसको देख लेता है और उसे डूबने से बचा लेता है। करमा सुगिया को जीवन का नया पाठ पढ़ाता है। सुगिया की चुनौती पर अविवाहित करमा उसे अपना जीवन साथी बना लेता है। करमा के इस साहसिक और क्रांतिकारी कदम में महुआ और उसके संगठन का भरपूर साथ मिलता है।
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अब आगे महुआ जब सामाजिक बुराइयों के खिलाफ भी मुखर हो जाती है उसके दुश्मनों की संख्या और भी बढ़ जाती है। अंततः कारखाने के ठेकेदार और सुगिया के जमींदार ससुराल वाले, दोनों मिलकर महुआ की हत्या करवा देते हैं।
उसी दिन कर्मा की पत्नी सुगिया की कोख से एक कन्या का जन्म होता है। उस कन्या का नाम संगठन के सभी साथियों की राय से महुआ रखा जाता है। इसके बाद लोग महुआ की चिता की आग के सामने संगठन की संघर्ष को जारी रखने की कसम खाते हैं। काव्य की कहानी यहीं समाप्त होती है।
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काव्य का मूल अर्थ-; विस्थापन की त्रासदी और नारी चेतना ।
काव्य के शीर्षक का अर्थ-: डींडा का अर्थ है जन्म स्थान और आस पास का परिवेश। डांआनी का मतलब पीडा,जोर से रोना। इन्हीं दो ठेठ खोरठा शब्दों के माल से बना है यह शीर्षक । डींडाक-डींडा संज्ञा शब्द में संबंध कारक का चिन्ह लगा है।डोंआनी शब्द डोंआइएक क्रिया में नी प्रत्यय जोडने से बना है।इसका भावार्थ है लेखक की जन्म भूमि की संतानों की दुर्दशा का बखान।



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काव्य में कुल छः सर्ग है।
1. डींडा।
2. सपुन।
3. हुलुस्थुल।
4. डहर।
5. पोहा।
6. खांधार।
• काव्य के भूमिका लेखक-- ए के झा।
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