दिखाता नहीं है शक्ल के शीशे में कुछ मगर आईना आँखों का चमक रहा होता है
जो
लिखना
होता है
उसी को
छोड़ कर
कुछ कुछ
लिख रहा होता है
लिखना
होता है
उसी को
छोड़ कर
कुछ कुछ
लिख रहा होता है
नहीं
लिखा सारा
लिखे
लिखाये
के पीछे खड़ा
छुपा
दिख रहा होता है
ना
सामान होता है
ना
दुकान होती है
मगर
थोड़ा रोज
बिक रहा होता है
आदत
से मजबूर
बिकने की
बाजार में
बिना टाँगें भी
टिक रहा होता है
नसीब
होता है
उस
पढ़ाने वाले का
अपने
पढ़ने वालों से
पिट रहा होता है
उपद्रव मूल्य
होता है
दोनों का
जहाँ
उपद्रव
खुद ही
अपने से
निपट रहा होता है
परम्परायें नयी
मूल्य नये
परिभाषायें नयी
नयी गीता
नयी रामायण में
सब कुछ नया
सिमट रहा होता है
नये कृष्ण
नये राम
नये गाँधी
नये बलराम
सब
इक्ट्ठा किये
जा रहे होते हैं
एक
जगह पर
ला ला कर
फिर भी
बेशरम
‘उलूक’
हमाम के
अन्दर
के
सनीमा में भी
कपड़ों
की
तस्वीरों
से
पता नहीं
किसलिये
चिपट
रहा होता है ?
चित्र साभार:

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