जी डी पी और पी पी पी में कितने पी बस गिने कितने हैं मगर किसी को ना बतायें
कुछ
चुटकुले
अगर
समझ में
ना भी आयें
खुल के
खिलखिला के
अगर
हँस
ना भी पायें
कोशिश
कर लें
थोड़ा सा
बिना
बात भी
कभी यूँ ही
मुस्कुरा
जायें
किस लिये
समझनी
हर बात
अपने
आस पास की
कुछ
हट के
माहौल
भी
जरा जरा
मरा मरा
छोड़ कर
बनाने
को
कहीं चले जायें
कविता कहानी
गजल शेर के
मज़मून
भरे पड़े हैं
जब
फिजाँ में हर तरफ
किसलिये
बेकार में
उलझे हुऐ से
विषय
कबाड़ से
उठा उठा कर
ले आयें
मजबूत हैं
खम्बें
पुलों के
मान कर
उफनती
नदी में
उछलती
नावों में
अफीम ले के
थोड़ी सी
हो सके
तो
सो जायें
खबर
मान लें
बेकार सी
फिसली हुई
‘उलूक’
के
झोले के छेदों से
जी डी पी
पी पी पी
जैसी
अफवाहों को
सपने देखें
खूबसूरत
से
दिन के
चाँद और तारों के
बॉक्स आफिस
में
हिट होगी
फिर से
फिलम
पड़ोसी के
घर में लगी आग
की
अगले पाँच सालों
में एक बार
जल जला
कर
हो गया होगा
राख
मान लें
शोर कर
ढोल
और
नगाड़ों का
इतना
कि
पूछने का
रोग लगे
रोगी
किसी से
क्या हुआ
कैसे हुआ
और
कब हुआ
पूछ ही
ना पायें।
चित्र साभार: https://www.cleanpng.com

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