बस समय चलता है अब इशारों में एक माहिर के सूईंया छुपाने से
किसलिये
डरता है
उसके
आईना
दिखाने से
डरता है
उसके
आईना
दिखाने से
चेहरा
छुपा के
रखता है
वो
अपना
जमाने से
कुछ
पूछते ही
पूछ लेना
उस से
उसी समय
तहजीब
कहाँ गयी
तेरी
पूछने
चला है
हुकमरानो से
ना देखना
घर में लगी
आग को
बुझाना भी नहीं
दिखाना
आशियाँ
उसका जलता हुआ
चूकना नहीं
तालियाँ
भी
बजाने से
हिलती रहें
हवा में
आधी कटी
डालें
पेड़ पर ही
सीखना
कत्ल करना
मगर बचना
लाशें
ठिकाने लगाने से
नकाब
सबके
उतार देने का
दावा है
नकाबपोष का
शहर में
बाँटता है
चेहरे
खरीदे हुऐ
नकाबों के
कारखाने से
घड़ी
दीवार पर टंगी है
उसी
तरह से
टिकटिकाती हुयी
बस
समय चलता है
अब
इशारों में ‘उलूक’
एक
माहिर के
सूईंया
छुपाने से।
चित्र साभार: https://www.fotolia.com

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