ताखे पर रखी चिट्ठियाँ

बहुत दिन पहले किसी से बात हो रही थी। याद नहीं किससे। उन्होंने कहा, तुम्हारे जेनरेशन में कमसे कम ये अच्छा है कि कोई चिट्ठी नहीं लिखता। किसी के जाने के बाद, रिश्ता टूटने के बाद... कभी ये दिक्कत नहीं आती कि चिट्ठियों का क्या करना है। हम लोग में तो सबसे बड़ी दिक्कत यही होती थी। रख सकते नहीं थे कहीं भी...और कितना भी मनमुटाव हो गया हो, चिट्ठी फेंकने का भी मन नहीं करता था।

मुझे अपने पूरी ज़िंदगी में देखे वो कई सारे घर याद आए। गाँव के घर, जिनमें एक ताखा होता था लकड़ी का। जहाँ चीज़ें एक बार रख के भुला दी जाती थीं। ये प्लास्टिक के पहले की बात है। उन्हीं दिनों जो सबसे ज़्यादा मिलते थे वो थे चिट्ठियों के पुलिंदे। मैं छोटी थी उस समय लेकिन फिर भी मालूम होता था कि इनमें जान होती है। साड़ी या ऐसे ही किसी कपड़े से टुकड़े में कई बार लपेटे और पतले पतले धागों से बँधे हुए। दिखने में ऐसा लगता था जैसे ईंट हो। उस ज़माने में लिफ़ाफ़ों की एक ही साइज़ आती होगी। अभिमंत्रित लगते थे वे पुलिंदे। मैंने कई कई बार ऐसे कपड़ों में सहेजे पुलिंदों को खोल खोल कर पढ़ा है। आप इस ज़माने में यक़ीन नहीं कर सकते कि उन दिनों डाकखाना कितना efficient हुआ करता था। चिट्ठियों में मेले में मिलने की बात होती थी। अगले हफ़्ते किसी दोस्त के यहाँ किसी शाम के छह बजे टाइप जाने की बात होती थी। कोई पसंद के रंग के कुर्ते, दुपट्टे या कि स्वेटर की बात भी होती थी। ऐसे पुलिंदों में ही काढ़े हुए रूमाल भी होते थे अक्सर। एक आध बार किसी शर्ट की पॉकेट भी मिली है मुझे। 

मैं बहुत छोटी होती थी उन दिनों। उम्र याद नहीं, कोई पाँच आठ साल की। जब ऐसे ताखे पर चढ़ने के लिए किसी सीढ़ी की ज़रूरत नहीं होती थी। मैं किसी खिड़की, दीवार में बने छेद को पकड़ कर लकड़ी पर झूल जाती थी और ऊपर चढ़ जाती थी। गाँव में छत ज़्यादा ऊँची नहीं होती थी...ख़ास तौर से घरों के पहले तल्ले में। फिर मेरा वज़न भी बहुत कम होता था तो ताखे के टूटने का डर नहीं लगता था। 

जबसे मैंने पूरा पूरा पढ़ना सीखा, ऐसे काम जब मौक़ा मिले, कर डालती थी। उस समय थोड़ा सा भय होता था कि कुछ ग़लत कर रही हूँ। लेकिन उन दिनों सजा थोड़ी कम मिलती थी। ज़्यादा डाँट कपड़े गंदे होने पर मिलती थी। किसी को लगता नहीं था कि मुझे चिट्ठियों की कुछ समझ होगी भी।

आख़िरी चिट्ठियाँ मुझे उन दिनों समझ नहीं आती थीं। उनमें अक्सर परिवार की बात होती थी। घर वाले नहीं मानेंगे टाइप। तुम तो समझते/समझती हो टाइप। मुझे लगता, उस उम्र के लोग बहुत समझदार होते हैं। कि एक दिन मैं भी समझ जाऊँगी कि आख़िरी चिट्ठियाँ आख़िरी क्यूं होती हैं। 

इन बातों को बहुत साल बीत गए। वैसी चिट्ठियों का पुलिंदा अपने सूती कवर और बारीक धागों के साथ चूल्हे में झोंके जाते हुए देखे। बढ़ती उम्र की अपनी क्रूरता होती है। बचपन की अपनी माफ़ी। उन दिनों खाने में नमक ज़्यादा लगता। दीदियों/चाचियों/भाभियों की आँख भरी भरी लगती। भैय्या/चाचा खाने की थाली थोड़ा ज़ोर से पटकते। कुआँ ख़ाली कर देंगे इस तरह नहाते। गोहाल में रेडीयो चलाते और दीवार के पीछे चुक्कु मुक्कु बैठ बीड़ी पीते। 

ऐसा लगता, घर में कोई मर गया हो। मैं थोड़ी भी समझदार हो चुकी होती तो वैसे किसी दिन क़सम खा लेती कि कभी भी चिट्ठियाँ नहीं लिखूँगी। लेकिन मैंने दूसरी ही चीज़ सोच ली… कि कभी प्यार नहीं करूँगी। पता नहीं, चिट्ठी नहीं लिखने का वादा भी पूरा कर पाती ख़ुद से कि नहीं, क्यूँकि प्यार…

मुझे मत कहो कि मैं तुम्हें चिट्ठियाँ लिखूँ… हर चिट्ठी में मेरी आत्मा थोड़ी सी रह जाती है… तुम्हारे यहाँ तो चूल्हा भी नहीं होता। कुछ जलाने की जगहें कितनी कम हो गयी हैं। कभी काग़ज़ भी जलाए हैं तुमने? इतना आसान नहीं होता। दुखता है अजीब क़िस्म से...किसी डायरी का पन्ना तक। चिट्ठी जलाना तो और भी बहुत ज़्यादा मुश्किल होता है। तुम पक्का मेरी चिट्ठियाँ समंदर में फेंक आओगे। हमारे धर्म में जलसमाधि सिर्फ़ संतों के या अबोध बच्चों के हिस्से होती है। वादा करो कि जब ज़रूरत पड़े मेरी चिट्ठियाँ जला दोगे…सिर्फ़ तब ही लिखूँगी तुम्हें।

और तुम क्या पूछ रहे थे, मेरे पास तुम्हारा पता है कि नहीं। बुद्धू, मुझे तुम्हारा पता याद है।

ढेर सारा प्यार,
तुम्हारी…

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