सोच कुछ भी हो आईने सी साफ हो लिखे लिखाये में सूरत दिखनी भी नहीं है
साफ
कहना है
कहने से
कोई परहेज
होना भी नहीं है
बात
अपनी
खुद की
जरा
सा भी
कहीं
करनी भी
नहीं है
थोड़े से
मतभेद
से केवल
अब
कहीं कुछ
होता भी नहीं है
पूरा
कर लें मनभेद
इस से
अच्छा माहौल
आगे
होना भी नहीं है
झूठ सारे
लिपटे हुऐ हैं
परतों में
पर्दे में
नहाने की
जरूरत
भी नहीं है
बन्द
रखनी हैं
बस आँखें
हमाम
की दीवारें
खिड़कियाँ
दरवाजे
अभी
तैयार
भी नहीं हैं
भेड़िये
सियार कुत्ते
सारे साथ हैं
क्या हुआ
रिश्तेदार
भी नहीं हैं
सोचना
भी नहीं है
नोचना
ही तो है
सबने
कुछ ना कुछ
क्या हुआ
अगर जिन्दा हैं
लाशें अभी
बनी भी नहीं हैं
लिखने में
कुछ नहीं
जाता है
सब कुछ
लिखने के
बीच का
कुछ
लिखना
भी नहीं है
सोच
कुछ
भी हो
‘उलूक’
आईने सी
साफ हो
लिखे
लिखाये में
सूरत दिखनी
भी नहीं है ।
चित्र साभार: http://clipart-library.com

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