सुंदर और काफ़ी भी

लोगों के जीवन में जो धर्म की और ईश्वर की जगह रहती है, मेरे जीवन में साहित्य का वही स्थान है। मैं दुःख में हनुमान चालीसा नहीं, सिंबोर्सका पढ़ती हूँ। मेरे पास हर मुश्किल के दो ही रास्ते होते हैं - पढ़ना या लिखना। मुझे अवसाद में राहत लिखने से मिलती है। काग़ज़ पर इंक पेन से लिखने की प्रक्रिया मन को शांत करती है। काग़ज़ पर क़लम चलने से महीन खर-खर की आवाज़ आती है। इसके सिवा बहुत सालों से लगातार हाथ से लिखते रहने की आदत के कारण ये नोटिस किया है कि दिमाग़ में अगर बहुत से ख़यालों का झंझावात आया हुआ है तो लिखते हुए वो थम जाता है क्यूँकि एक बार में हम सिर्फ़ एक ख़याल को काग़ज़ पर लिख सकते हैं। एक ही दिशा में सोच सकते हैं। हज़ार मुसीबतों की जगह जब किसी एक पर ध्यान केंद्रित होता है तो लगता है समस्या उतनी बड़ी है नहीं जितनी कि सबके एक साथ मिल जाने पर महसूस हो रहा था। लिखते हुए मेरी साँस धीमी हो जाती है और ऐंज़ाइयटी के कारण अगर दिल बहुत तेज़ धड़क रहा होता है तो वो थोड़ा धीमी गति से धड़कने लगता है। 

जब लिखना इतना मुश्किल हो कि अपने ख़ुद के शब्द न मिल रहे हों, उन दिनों में में पढ़ती हूँ और कई बार अपनी पसंद की कविताओं को काग़ज़ पर लिखती हूँ। ऐसे में कोशिश रहती है कि जितनी धीमी गति और आराम से लिख सकूँ, उतना बेहतर। एक समय में में चिट्ठियाँ भी लिखा करती थी। ख़ास तौर से किसी और देश के सफ़र में मुझे चिट्ठियाँ लिखना बहुत पसंद होता था। मैंने ख़ूब ख़ूब पोस्टकार्ड लिखे हैं।

मेरे पास कई तरह का काग़ज़, बहुत रंगों में स्याही और कई रंग में फ़ाउंटन पेन हैं। स्ट्रेस दूर करने का एक तरीक़ा सारी कलमों को ठीक से धोना भी है। इसमें बार बार पानी में डुबो कर निब को बाहर निकालना होता है जब तक कि उसमें से एकदम साफ़ पानी न आने लगे। सारी कलमों को खोल कर उन्हें मग में डुबो कर रख देती हूँ। फिर एक एक करके साफ़ करती जाती हूँ। फिर टिशू पेपर से उन्हें सुखाती हूँ। आख़िर में सब कलमों में उनके रंग के हिसाब से स्याही भरती हूँ। इतना सारा कुछ कर के बहुत सुकून मिलता है। क़लम एकदम स्मूथ चलने लगती है धुलने के बाद।

दो दिन पहले कार्पल टनेल सिंड्रोम ने अफ़ेक्ट किया था तो परेशान हो गयी थी। एक पन्ना भी लिखना मुश्किल था। फिर दो दिन कलाई में रिस्ट बैंड पहना ताकि कलाई न मुड़े। आइफ़ोन का इस्तेमाल कम किया। तो आज ठीक है कंडिशन। आइफ़ोन ऐक्स बहुत वज़नदार है - कवर का वज़न मिला कर लगभग दो ढाई सौ ग्राम। इसमें पीछे के हिस्से को काँच का बनाया गया है ताकि वायर्लेस चार्जिंग सपोर्ट करे। वायर्लेस चार्जिंग कितने लोग इस्तेमाल करेंगे मालूम नहीं लेकिन काँच के बैक से जो फ़ोन का वज़न बढ़ा है उससे तकलीफ़ सबको होती है। वायर्लेस चार्जिंग में एक और दिक्कत ये है कि सभी फ़ोन कवर इसे सपोर्ट नहीं करते। तो अगर ऐसा फ़ोन कवर ले रहे हैं तो उसकी क़ीमत अमूमन अधिक होगी। या फिर हमेशा फ़ोन का कवर निकाल कर चार्ज कीजिए। फ़ोन इस्तेमाल करते हुए बटखरा वाली फ़ीलिंग आती है। कि भैय्या ज़रा ढाई सौ ग्राम भिंडी तौल दो…ये लो मेरा आइफ़ोन… इसी के बराबर वज़न का दे दो। आज हाथ का दर्द कम है तो मसखरी सूझ रही है, दो दिन पहले रुला मारा था। दिल्ली के ख़तरनाक दिन याद आए जब गंगाराम हॉस्पिटल का एक डॉक्टर बोल दिया था कि हम हाथ से कभी लिख नहीं पाएँगे। मेरा तो प्राण ही सूख गया था। लिखना दर्द में भी बंद नहीं होता। बस हैंड्रायटिंग ख़राब हो जाती है। उसमें भी आजकल एक्स्ट्रा फ़ाइन निब से लिखती हूँ तो अक्षर ज़्यादा छोटे छोटे होते हैं।

कविता के मामले में या तो टेस्ट बहुत ज़्यादा सिलेक्टिव है या बहुत अच्छे कवियों ने बिगाड़ रखा है। सिंबोर्सका बहुत पसंद आती हैं। उनकी कविता मैं कई बार बिना नाम पढ़े भी सिर्फ़ दिल में उठते दर्द या हूक से पहचान सकती हूँ। मेरे दुःख में उसका लिखा रेज़ॉनेट करता है। अफ़सोस बस ये है कि पोलैंड जाने के पहले इस क़दर उसके प्रेम में पड़ी होती तो थोड़ा ज़्यादा तलाश के देखती पोलैंड को उसकी नज़र से भी। सिंबोर्सका इसलिए भी पसंद है कि मैंने उन्हें ख़ुद से पढ़ना शुरू किया… किसी और के कहने पर नहीं। मैप की एक प्रति अमरीका घूमते हुए एक बुक स्टोर में ख़रीदी थी। इसी तरह बोर्हेस बहुत ज़्यादा पसंद हैं। उनके लिखे में का जादू बहुत बार अचरज में डाल देता है कि कम में इतनी चोट कैसे बुनी जा सकती है। बुकोव्स्की की कुछ कविताएँ बहुत वाहियात लगती हैं तो उनकी कुछ कविताएँ बहुत पसंद भी आती हैं। अपनी ब्लंट्नेस के कारण। कभी कभी अपनी संवेदनशीलता के कारण भी। उनकी एक कविता में उस व्यक्ति के अकेलेपन का ज़िक्र आता है जिसे छुआ नहीं है किसी ने और जो अपनी तन्हाई में एक पेड़ को पानी दे रहा है। ये बिम्ब बहुत सच्चा है और रोज़मर्रा की ज़िंदगी से उठाया हुआ है।

मुझे इन दिनों अपना लिखा नहीं पसंद आता। इन फ़ैक्ट ज़िंदगी के अधिकतर हिस्से में वे दिन हैं जब मुझे अपना लिखा पसंद नहीं आता रहा है। लेकिन मैं एक आदत की तरह लिखती हूँ। ख़ुद को कहीं गुम हो जाने से बचा लेने के लिए भी। मुझे अक्सर लगा है कि हम सबसे गहराई से अपने लिखे में मौजूद होते हैं। जो मुझे एक व्यक्ति की तरह जानते हैं वे मेरे स्वभाव और मेरी पसंद नापसंद को भले ही जानते हैं…जो लोग मेरे लिखे से लम्बे अरसे तक जुड़े रहे हैं वे मेरे मन का मिज़ाज बेहतर समझते हैं। जैसा कि मैं समझती हूँ। लिखने की पहली शर्त अपनी संवेदनशीलता को बचाए हुए रखना है। एक कठोरता के लिबास के भीतर की त्वचा बहुत नर्म नाज़ुक होती है। जल्द चोटिल हो जाती है। अभी से कुछ साल पहले ऐसा नहीं था। उन दिनों चोट ठीक होने में ज़्यादा वक़्त नहीं लगता था। इन दिनों थोड़ा ख़याल रखना पड़ता है ख़ुद का भी। इतने सालों में बहुत सारा कुछ लिखने पढ़ने के बावजूद वैसी विरक्ति नहीं आयी जैसे कि आ जानी चाहिए थी अब तक।

बहुत गहरी उदासी से किताबें उबार लेती हैं। थोड़ी सी तन्हाई को भी भर सकती हैं। किताबों के हाशिए पर लिखना एक अजीब क़िस्म का सुकून है। ये जानने का कि बरसों बाद भी हम अपनी किताबों में बचे रहेंगे, ठीक उस रंग में जैसे कि इस लम्हे हैं। मैं पुरानी किताबों में अपने नोट्स पढ़ कर ख़ुश होती हूँ। काफ़ी कुछ बदल जाता है, लेकिन काफ़ी कुछ पहले जैसा ही रहता है।

जीवन की इस आधापापी में कुछ जो दोस्त बने थे बहुत साल पहले, वे आज भी हैं। उन किताबों की तरह जिनसे गुज़रते हुए वे थोड़े थोड़े हमारे अपने हुए थे। ये कितना प्यारा है और इससे कितनी राहत मिलती है। हज़ार दुखों में एक ये राहत है कि मेरे कुछ सबसे पसंदीदा लोगों के घर में वे किताबें हैं जो मेरे पास हैं। जैसे हम किसी एक ही दुनिया में कभी साथ साथ मौजूद होते हैं। बचपन के साझे क़िस्से और कच्ची उम्र के अधूरे प्रेम की तरह… हमेशा अधूरे… हमेशा घटते हुए… जो कभी पूरे नहीं होंगे लेकिन कभी ख़त्म भी नहीं होंगे।

ये सुंदर है। और काफ़ी भी।

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