ज़रा भरम रखना

हर बार का एक ही तिलिस्म या कि एक ही तिलिस्म के कई दरवाज़े। सारे के सारे बंद। हम तलाशते रहे चाबियाँ या कि कोई मंतर जो कि खोल सके ज़रा सी खिड़की इस तिलिस्म के बाहर। हम चाहते थे ज़रा सा सच वाली दुनिया। कि जिसके किरदार थोड़ा सा सच कह सकें हमसे। चुभता हुआ सही। दुखता, जानलेवा सच। कि उसे भूल जाने के बाद का कोई रास्ता इस तिलिस्म से बाहर जाएगा। हमें किसी ने नहीं बताया। हम ज़रा सा अपने जीने भर को चाहते रहे खुला आसमान। लेकिन तिलिस्म का आसमान भी जादुई था। उसमें सितारे थे, कई रंग के चाँद भी, लेकिन हम जानते थे ये छलावा है तो इस जादू की ख़ूबसूरती आँखों को ही ठंड पहुँचा सकती थी, आत्मा को नहीं। रात की झूठी रोशनी चुभती थी। प्रेम का झूठा क़िस्सा भी। लेकिन जो सबसे ज़्यादा चुभती थी, वो थी महबूब की झूठी चुप्पी। चुप्पी जो कि सिर्फ़ हमारे सामने ज़ाहिर होती थी। कि वो इस दुनिया का ही नहीं, हर दुनिया का सबसे बेहतरीन किस्सागो हुआ करता था। उसके पास इतने क़िस्से होते थे कि हर दुनिया के लिए कम पड़ जाते थे। जब वो क़िस्से सुनाता तो वक़्त भी ठहर जाता, लोग रेतघड़ी को उलटना भूल जाते और उसी वक़्त में ठहरे कहानी के लूप में घूमते रहते, दिन महीने साल। 

हम नहीं जानते कि हमें उस से ही इश्क़ क्यूँ हुआ। हम याद करने की कोशिश करते हैं कि वक़्त की किसी इकाई में हमने उसे देखा नहीं था और हम सिर्फ़ इस तिलिस्म से बाहर जाने का रास्ता तलाश रहे थे। किसी शाम बहुत सारे चंद्रमा अपनी अलग अलग कलाओं के साथ आसमान में चमक रहे थे और हम किसी एक बिम्ब के लिए थोड़ी रोशनी का रंग चुन रहे थे। गुलाबी चाँदनी मीठी होती थी, नीली चाँदनी थोड़ी सी फीकी और कलाई पर ज़ख़्म देती थी… आसमान के हर हिस्से अलग रंग हुआ करता था। सफ़ेद उन दिनों सबसे दुर्लभ था। कई हज़ार सालों में एक बार आती थी सफ़ेद पूरे चाँद की रात। ऐसी किसी रात देखा था उसे, सफ़ेद कुर्ते में, चुप आसमान तकता हुआ। समझ नहीं आ रहा था कि चाँद ज़्यादा ख़ूबसूरत था या वो। उस रोज़ हमारे साथ दस बीस और लोग होते तो सब उसके इश्क़ में इकट्ठे गिरते, उसी लम्हे में, उसी चुप्पी में…इतने लोगों में बँट कर शायद उसके हुस्न की चाँदनी थोड़ी कम धारदार होती। लेकिन उस रोज़ मैं अकेली थी। हम दोनों एक नदी के किनारे बैठे, चुप चाँद को देख रहे थे। वो नदी की धार में ऊपर की ओर बैठा था…पानी में उसकी परछाईं घुल कर मेरी ओर आ रही थी। मैं पानी में पैर दिए बैठी थी…ख़्वाहिश उसके साथ किसी सफ़र पर जाने की होने लगी। उसकी चुप्पी में सम्मोहन था, चाँद से भी ज़्यादा। मैंने उस रात न उसकी आवाज़ सुनी थी, ना उसके क़िस्से। मैं उसकी चुप्पी से ही प्यार करती थी। मुझे नहीं मालूम था हम दोनों ही शब्दों के मायावी हैं, हमारी चुप्पी जानलेवा होती है। 

हम उस दिन के बाद अक्सर मिलते। जिस भी दिन किसी चाँद के पूरे होने का न्यूज़ अलर्ट आता, हम नदी किनारे अपनी जगह बुक कर लेते। कई कई रात हम सिर्फ़ चाँद देखते रहे। हर पूर्णिमा को अलग अलग क़िस्म के फूल खिलते थे, जो अपने चाँद के रंग के होते थे। पीली चम्पा, गहरे लाल गुलाब, नीला अपराजिता, फ़िरोज़ी गुलदाउदी। ये तिलिस्म की दुनिया के फूल थे, इनकी ख़ुशबू चाँद रात को अलग होती थी…जादू भरी। हम पूरी रात नदी किनारे बैठे रहते। नदी उसकी परछाईं घुला कर मेरे पाँवों तक पहुँचाती रहती। मैं पाँव में कई सफ़र का इंतज़ार लिए भोर तक बैठी रहती। 

नदी के पानी से पाँवों में ठंडक आ जाती और घर जा कर मुझे अलाव के सामने बैठना पड़ता। नदी के पानी से बदन में एक लय भी आ जाती और मैं कविता लिखा करती। बाक़ी दिनों में मेरे अंदर एक छिटकाव होता। टैप डान्स करती तो लकड़ी के फ़र्श पर की खट खट आवाज़ आती और शब्द बेतरतीब होते जाते। ऐसे में कहानियाँ लिख लेना अपनेआप में एक पराक्रम होता जिसके लिए वीरता पुरस्कार की ज़रूरत महसूस होती। मुझे लिखना ही बहुत मुश्किल लगता। लेकिन ऐसा तब तक ही था जब तक मैं ये सोचती थी कि चुप रहना और चाँद को चुप ताकना महबूब की आदत और अदा है। फिर मैंने उसे बोलते सुना। 

हज़ारों लोग मंत्रमुग्ध उसकी आवाज़ में डूबते चले जाते। मैं अपनी चुप्पी से हथियार बनाने की विधियाँ पढ़ती। सोचती उसे तैरना न आता हो तो नदी के बीच ले जाऊँ और नाव डुबो दूँ। प्रेम के अतिरेक में हत्या करना प्रेम को सबसे ऊँचे पायदान पर स्थापित कर देता था। मैं इस ऊँचे पायदान से कूद के मरना चाहती थी। 

सब कुछ ठीक ऐसा ही चल रहा होता तो बेहतर होता। गुलाबी चाँद की मीठी रात थी। हम हमेशा की तरह अपनी अपनी जगह पर थे। लेकिन बहुत तेज़ हवा चल रही थी और बारिश ने नदी की सतह को बहुत बेचैन कर दिया था। लहरें उठ रही थीं और मैं बारिश से ज़्यादा नदी के पानी से भीग रही थी। उसकी परछाईं बदन पर पड़ती तो लगता उसने मुझे बाँहों में भर रखा है। इतने पर भी तिलिस्म टूटता नहीं। बारिश और आँधी के शोर में मुझे लगा उसने मेरा नाम लिया है… 

वो नाम जो मैं ख़ुद भूल गयी थी। अचानक से तिलिस्म के दरवाज़े खुल गए और मैं तिलिस्म के बाहर की दुनिया में चली आयी। इस एक चाँद की दुनिया में रहते हुए हर रोज़ अफ़सोस होता है…कि झूठ की वो दुनिया बहुत ज़्यादा ख़ूबसूरत थी…कि चैन तो कहीं नहीं है…वहाँ महबूब के मेरे होने का भरम था।

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