शब्द बच के निकल रहे होते हैं बगल से फैली हुयी स्याही के जब कोई दिल लगा कर लिखने के लिये कलम में स्याही भर रहा होता है
लिखा
हुआ भी
रेल गाड़ी
होता है
कहीं
पटरी पर
दौड़
रहा होता है
कहीं
बेपटरी हुआ
औंधा
गिरा होता है
लिखते लिखते
कितनी दूर
निकल
गया होता है
उसे
खुद पता
नहीं होता है
मगर
कलम
जानती है
बहुत
अच्छी तरह से
पहचानती
है
स्याही सूखे
इससे पहले
हमेशा
शब्दों को
अपने
हिसाब से
छानती है
लिखे हुऐ के
कौऐ भी
उड़ते हैं
उड़ते उड़ते
कबूतर
हो लेते हैं
क्या
फर्क पड़ता है
अगर
सफेद
के ऊपर
काला
लिखा होता है
कौन
देखता है
समय
के साथ
लिखा लिखाया
हरे से पीला
हो लेता है
किताबें
पुरानी
हो जाती हैं
लिखाई
से
आती महक
उसकी उम्र
बता जाती है
लिखा हुआ
अकेला
भी होता है
मौके बेमौके
स्टेशन से
रेल पहुँचने
के बाद
निकली भीड़ के
अनगिनत
सिर हो लेता है
शब्द
शब्दों के ऊपर
चढ़ने
शुरु हो जाते हैं
भगदड़
हो जाना
कोई
अजूबा
नहीं होता है
कई शब्द
शब्दों के
जूतों के नीचे
आ कर
कुचल जाते हैं
लाल खून
कहीं
नहीं होता है
ना ही
कहीं के
अखबार रेडियो
या
टी वी
चिल्लाते हैं
कोई
दंगा फसाद
जो क्या
हुआ होता है
सिरफिरे
‘उलूक’ का
रात का
काला चश्मा
सफेद
देख रहा होता है
लिखते लिखते
लिखना लिखाना
घिसी हुई
एक कलम से
फैला हुआ
कुछ रायता सा
हो रहा होता है
शब्द बच के
निकल रहे होते हैं
बगल से
फैली हुयी स्याही के
हर
निकलने वाला
थोड़ी दूर
पहुँच कर
घास
के ऊपर
अपना जूता
साफ
करने के लिये
घिस रहा होता है ।
http://hans.presto.tripod.com
हुआ भी
रेल गाड़ी
होता है
कहीं
पटरी पर
दौड़
रहा होता है
कहीं
बेपटरी हुआ
औंधा
गिरा होता है
लिखते लिखते
कितनी दूर
निकल
गया होता है
उसे
खुद पता
नहीं होता है
मगर
कलम
जानती है
बहुत
अच्छी तरह से
पहचानती
है
स्याही सूखे
इससे पहले
हमेशा
शब्दों को
अपने
हिसाब से
छानती है
लिखे हुऐ के
कौऐ भी
उड़ते हैं
उड़ते उड़ते
कबूतर
हो लेते हैं
क्या
फर्क पड़ता है
अगर
सफेद
के ऊपर
काला
लिखा होता है
कौन
देखता है
समय
के साथ
लिखा लिखाया
हरे से पीला
हो लेता है
किताबें
पुरानी
हो जाती हैं
लिखाई
से
आती महक
उसकी उम्र
बता जाती है
लिखा हुआ
अकेला
भी होता है
मौके बेमौके
स्टेशन से
रेल पहुँचने
के बाद
निकली भीड़ के
अनगिनत
सिर हो लेता है
शब्द
शब्दों के ऊपर
चढ़ने
शुरु हो जाते हैं
भगदड़
हो जाना
कोई
अजूबा
नहीं होता है
कई शब्द
शब्दों के
जूतों के नीचे
आ कर
कुचल जाते हैं
लाल खून
कहीं
नहीं होता है
ना ही
कहीं के
अखबार रेडियो
या
टी वी
चिल्लाते हैं
कोई
दंगा फसाद
जो क्या
हुआ होता है
सिरफिरे
‘उलूक’ का
रात का
काला चश्मा
सफेद
देख रहा होता है
लिखते लिखते
लिखना लिखाना
घिसी हुई
एक कलम से
फैला हुआ
कुछ रायता सा
हो रहा होता है
शब्द बच के
निकल रहे होते हैं
बगल से
फैली हुयी स्याही के
हर
निकलने वाला
थोड़ी दूर
पहुँच कर
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