बेटियां घर की रौनक होती हैं

 बेटियां घर की रौनक होती हैं

बेटियां घर की रौनक होती हैं 


बेटियां घर की रौनक होती हैं और माता-पिता के दिल के बेहद करीब भी होती हैं। उस पर भी जब एक शायर के घर बेटी का जन्म हो और वो इस रिश्ते को शब्दों में ना ढाले, यह असंभव है इसलिए पेश हैं आपके लिए बेटियों पर लिखे चुनिंदा शेर जिनमें शायरों ने अपने जज़्बातों का इज़हार किया है।

घर में रहते हुए ग़ैरों की तरह होती हैं

बेटियाँ धान के पौधों की तरह होती हैं

उड़के एक रोज़...

उड़के एक रोज़ बड़ी दूर चली जाती हैं
घर की शाख़ों पे ये चिड़ियों की तरह होती हैं


ऐसा लगता है कि जैसे ख़त्म मेला हो गया

उड़ गईं आँगन से चिड़ियाँ घर अकेला हो गया

बेटी मुस्कुराती है...

तो फिर जाकर कहीँ माँ- बाप को कुछ चैन पड़ता है
कि जब ससुराल से घर आ के बेटी मुस्कुराती है



बड़ी होने को हैं ये मूरतें आँगन में मिट्टी की

बहुत से काम बाक़ी हैं सँभाला ले लिया जाये

बेटियों की रुख़सती...

रो रहे थे सब तो मैं भी फूट कर रोने लगा
वरना मुझको बेटियों की रुख़सती अच्छी लगी



घरों में यूँ सयानी बेटियाँ बेचैन रहती हैं

कि जैसे साहिलों पर कश्तियाँ बेचैन रहती हैं

मेरी बेटी से...

ये चिड़िया भी मेरी बेटी से कितनी मिलती जुलती है
कहीं भी शाख़े- गुल देखे तो झूला डाल देती है


तू अगर बेटियाँ नहीं लिखता

तो समझ खिड़कियाँ नहीं लिखता

बेटियों को बचा के रखिए...

बेटियों को बचा के रखिए 'कँवल'
इन को पाने में वक़्त लगता है


घर में जब बेटियाँ नहीं होंगी

पेड़ पर टहनियाँ नहीं होंगी

जरूरी नहीं रौशनी...

जरूरी नहीं रौशनी चिरागों से ही हो
बेटियाँ भी घर में उजाला करती हैं 

माँ-बाप के जीवन में...

माँ-बाप के जीवन में ये दिन भी आता है
जिगर का टुकड़ा ही एक दिन दूर हो जाता है

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