इतनी जल्दी भी क्या है सब्र कर खुदा बने हुऐ ही उसे हुऐ कुछ महीने चंद हैं
शब्दों
के
जोड़
जन्तर
जुगाड़ हैं
कुछ के
कुछ भी
कह लेने के
तरीके
बुलन्द हैं
के
जोड़
जन्तर
जुगाड़ हैं
कुछ के
कुछ भी
कह लेने के
तरीके
बुलन्द हैं
सच के
झूठ के
फटे में
किसने
देखना होता है
लगे हुऐ
कई
रंगीन पैबन्द हैं
लिखना लिखाना
पढ़ना पढ़ाना
पढ़े लिखों
का
कहते हैं
परम
आनन्द है
अनपढ़
हाँकता
चल रहा है
पढ़े लिखों
की
एक भीड़
का
आदि है
ना
अन्त है
लिखा
जा रहा है
एक नया
इतिहास है
गुणी
इतिहासकारों
के
किले
चाक चौबन्द हैं
अवगुणों
से
लबालब हैं
सोचने
फिर
बोलने
वाले
कुछ
सभी
होशियार हैं
जिनके मुँह
शुरु से ही
बन्द हैं
लिख रहा है
‘उलूक’
कुछ ऐसा
मुद्दों को
छोड़कर
जो
ना
गजल है
ना शेर है
ना छन्द है
रट रहा है
जमाना
उस
शायर का
कलाम
आज
जिसका
एक शब्द
एक पूरा
निबन्ध है
समझ
लेता है
इशारा
समझने वाला
कौन
शायर है
कैसा
कलाम है
बचा
जमाना है
नासमझ है
जब
हो चुका
खुद ही
शौक से
नजरबन्द है ।
चित्र साभार: https://making-the-web.com

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