नाड़ियों को शुद्ध करता है कपालभाति प्राणायाम

कपालभाति प्राणायाम क्या है?
कपालभाति प्राणायाम (Kapalbhati Pranayam) में 'कपाल' का अर्थ 'ललाट' या 'मस्तिष्क' का सामने वाला भाग है। भाति का अर्थ लोहार द्वारा उपयोग में लायी जानेवाली धौकनी है। अतः इस अभ्यास से  'मस्तिष्क' (Brain) के सामनेवाले हिस्से को शुद्ध किया जा सकता है। पैट के अंगों, श्वसन क्रिया में सुधार तथा मन को शांत तथा जागरूक बनाने के लिए भी यह शक्तिशाली विधि है। 
Benefits of Kapalbhati Pranayam

कपालभाति प्राणायाम कैसे करें?
आरामदायक आसन में बैठ जाएं। रीढ की हड्डी, गरदन और सिर सीधा रखें। दोनों हाथ घुटनों के ऊपर ज्ञान अथवा चित मुद्रा में रहेंगे। आंखों को सहजता से बंद कर लें। दोनों नासिका से गहरी सांस लेते हुए पेट को फुलाएँ तथा बलपूर्वक सांस छोड़ते हुए पेट की पेशियों को पूर्णत: संकुचित करें, अधिक जोर नहीं लगाएं। अगली श्वास उदर की पेशियों को बिना प्रयास फैलाते हुए लें और थोड़ा जोर लगाते हुए श्वास छोड़े। इसे लगातार 10 बार करें और इस तरह 10-10 के तीन चक्र अभ्यास करें।

बाद में एक चक्र में 20 से अधिक या क्षमतानुसार श्वसन करें। चक्रो की संख्या बढा सकते हैं। सबसे उचित होगा कि आप शुरुआत के दिन में पांच चक्र के अभ्यास में 10 बार कपालभाति करें, फिर आगे चल कर आप पांच चक्र के अभ्यास में धीरे-धीरे कपालभाति की संख्या बढ़ाएं जो अपनी क्षमता के अनुसार 20 से 50 या उससे अधिक भी किया जा सकता है।

प्रतिदिन सुबह एवं खाना खाने के तीन-चार घंटे के बाद इसका अभ्यास किया जा सकता है। रात में सोने से पूर्व  कभी भी इसका अभ्यास नहीं करना चाहिए, अन्यथा नींद नहीं आयेगी।

कपालभाति प्राणायाम करने में क्या सावधानियाँ व्रतनी चाहिए?
यदि अभ्यास के दोरान दर्द हो, चक्कर आये या जी मिचलाये तो थोड़े देर के लिए अभ्यास बंद कर देना चाहिए और थोड़ी देर शांत बैठने के बाद अधिक सजगता के साथ और कम जोर लगा कर अभ्यास पुन: आरंभ करें। फिर भी यदि समस्या हो, तो किसी योग शिक्षक से परामर्श लेना चाहिए। जिन्हें उच्च रक्तचाप, हर्निया, बेचैनी, चक्कर आना, मिरगी, गेस्टिक अल्सर या हदय की समस्या हो उन्हें यह अभ्यास नहीं करना चाहिए।

कपालभाति प्राणायाम के क्या लाभ है?
यह अभ्यास इड़ा और पिंगला नाड़ियों को शुध्द करता है तथा मानसिक कार्यो के लिए ऊर्जा प्रदान करता है। निद्रा को दूर भगाता है तथा मन को ध्यान के अभ्यास के लिए तैयार करता है। पाचन अंगों को मालिश करके उन्हें शक्तिशली बनाता है तथा पेट की समस्याओं को दूर करता है। यह अभ्यास फेफड़ों को मजबूत बनाता है। अतः दमा, वातस्फीति, ब्रोन्काइटिस और इया यक्षमा से पीड़ित व्यक्ति के लिए यह अत्यंत उत्तम अभ्यास है। यदि कोई महिला उचित देख रेख में प्रसव से पूर्व इसका अभ्यास करती है, तो उन्हें शक्ति लाभ मिलता है। यह अभ्यास मानसिक शक्ति को बढ़ाने में एक अत्यंत महत्वपूर्ण अभ्यास है।

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