दिवाली (A Human Story )

दिवाली का वक्त था. घरों में रंगाई-पुताई चल रही थी. हलवाईयों की दुकानों पर खोया-छेना बन रहा था. मैं रसोई में बैठी पति के लौटने का इंतजार कर रही थी. लौटा तो उसके हाथ में कुछ पैसे थे. वो पैसे, जो मेरा आखिरी गहना गिरवी रखकर मिले थे. उन पैसों से मैंने लक्ष्मी पूजा की.


राजस्थान की लतादेवी के पास कोई तमगा या किसी भी किस्म का कोई अवॉर्ड नहीं. बोलती हैं तो बात किस्सों से शुरू होकर किसी किस्से पर ही ठहरती है. लता के पास सिर्फ एक हासिल है- उनका जज्बा. इतना चमकीला कि दम-दम दमकते जेवर और दिवाली की रोशनी भी उनकी उजली मुस्कान के आगे फीकी लगे. पढ़ें, लता को.

मां ने चूल्हे पर हांडी चढ़ाई हुई थी, तभी पेट में दर्द उठा. बढ़ता ही गया. आनन-फानन पड़ोस की लुगाइयां जमा हो गईं. इतनी भी मोहलत नहीं मिली कि मां को जच्चा-बच्चा वाली कोठरी में ले जा सकें और मैं आ पहुंची. हांडी अलग खदक रही थी. हंसती हुई लता बताती हैं.

मैं पहली औलाद थी. थालियां बजी, लड्डू बंटे. सतमाहा बच्चा थी. कमजोर, मरगिल्ली-सी. प्यार के साथ-साथ खूब चोंचले भी उठाए गए.

सारे नातेदार कहते हैं कि मैं जन्म से पहले आ गई थी इसलिए इतनी बेसब्री और शौकीन हूं. पिछले जन्म में किसी राजे-रजवाड़े में रही होऊंगी. जल्दबाजी के कारण ऊपरवाले को पूरा वक्त नहीं मिला कि वो मेरे पुराने जन्म के शौक मिटा सके. लता की बड़ी-बड़ी आंखों में तिरता इंद्रधनुष उनकी इस बात की गवाही दे रहा है. लगभग 25 साल की लता खेतों में काम करती हैं. मिट्टी गुड़ाई, रोपने, सींचने, फसल पकने पर निकालने का काम. वो सारे काम, जिनमें मिट्टी में सने बगैर काम न चले. बाकी औरतें अपना सबसे पुराना और फटहर कपड़ा पहनती हैं, वहीं लता सबसे अलग हैं.

दोपहर के खाने के बाद खेत में सुस्ताती लता पर 'बीत चुके रजवाड़ों' की महक है. वे बताती हैं- चाहे खेत में मिट्टी गोड़नी हो या फिर खाना पकाना- मैं अच्छे कपड़ों और गहनों के बिना नहीं रहती.

जन्म से ही मुझे गहने-जेवर का खूब शौक रहा. मां बताती है कि छठी पूजा में मैं उन्हीं लुगाइयों के हाथों में जाकर खुश रहती जो खूब अच्छी तरह से पहने-ओढ़े हों. कोई बड़ी उम्र वाली या थोड़ी कम सजी-धजी किसी बींदणी ने गोद में लिया तो चीख-चीखकर रो देती. थोड़ी बड़ी हुई तो मां का बोरला (राजस्थान में पहना जाने वाला मांग टीका) पहनकर खूब उछलकूद करती. अपनी उम्र जितना ही मासूम सपना था- शादी करूंगी तो गहने मिलेंगे.

बीते जन्म में रानी का सुख भोग चुकी लता के हाथों में लकीरों की जगह फावड़े-कुदाल के निशान हैं. पैर बगैर चप्पलों के. सिर पर कोई चंवर नहीं डुलाता, बल्कि तेज धूप से आंखें मिचमिचाती हैं. 

लता को इससे खास फर्क नहीं पड़ता. वे याद करती हैं- हमारे यहां लड़की को ऐसे पालते-पोसते हैं, मानो कोई अनचाहा मेहमान बार-बार कहने पर भी न जाए. जितना काम, उतनी ही रोटियां. प्याज और लाल मिर्च की चटनी या मिर्चों की ही सब्जी के साथ खाना होता. मेरा मामला अलग था. सतमाही बच्ची को खूब प्यार मिला. बड़ी हुई तो अपने अनोखे शौक के कारण नाजों में रही. घर के छोटे से छोटे काम पर सब खूब असीसते. शायद इसकी वजह ये भी थी कि मेरे बाद घर की कमाई में बरकत हुई. तब मैं चुपड़ी रोटी खाया करती।
फिर वो दिन आया, जिसका सपना बचपन से देखा था. शादी हुई. मां-बाप ने मन भरकर गहने दिए. गांव से लेकर उदयपुर के जौहरियों की दुकानें छान लीं.

शादी के रोज ऐसी चमचमाती दुल्हन थी कि आसपास के सारे गांववाले दिनों तक बोलते-बताते रहे. 

बस इतना ही!
थोड़ा रुकने के बाद लता बताती हैं- शादी के बाद वक्त बदल गया. जबतक शादी के मायने समझे, पति कमाने-खाने के लिए गुजरात जा चुका था. मैंने गहने बक्से में बांधे और दूसरी लुगाइयों के साथ खेत में मजदूरी करने लगी. इसी बीच दो लड़के हुए. न थाल बजी, न लड्डू बंटे.

पति शहर से लौट आया लेकिन गहने बक्से में बंद ही रहे. निकालो तो कहता कि मिट्टी का काम करनेवालों को जेवर नहीं सुहाते. घर में चोरी हो जाएगी.

खर्चे बढ़े. बच्चों की पढ़ाई. सास की दवा-दारू. बक्सा खाली होता गया. दिवाली के दिन जब आखिरी गहना गिरवी रखा, तब बार-बार आंसू आने को होते और मैं अपशगुन के डर से उन्हें रोकती. तर पकवान की छोड़ें, भरपेट खाना भी नसीब नहीं हुआ था. दिवाली के दूसरे रोज जी-भरके रोई. हाथों में कोई हुनर नहीं है. अब खेतों की गुड़ाई-निंदाई, रोपना, गाय-गोरू की सार-संभाल, परचून की दुकान के लिए लिफाफे बनाना- सब कर लेती हूं.

शादी में मिली बकुची में थोड़े-थोड़े पैसे जमा करती हूं और जैसे ही शहर जाने का मौका मिलता है, कोई न कोई गहना खरीद लेती हूं. खरखराती आवाज में बताते हुए लता हंस देती हैं और उनकी हंसी में ही गहनों का सारा नकलीपन खो जाता है...

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