कभी न मिल सकने वाले लोगों की बातों से बनी धुन्ध

मैं अपनी माँ और बेटियों के बीच एक अदृश्य झूलने वाला पुल हूँ। हैंगिंग ब्रिज। जिसके दो ओर छोर होकर वे एक दूसरे को देखती हैं। सोचती हैं कि मिल लें, लेकिन पुल उन्हें दिखायी नहीं देता। सिर्फ़ मैं उन्हें देख पाती हूँ, पुल के दोनों छोर पर और कलेजे में एक टीस उठती है। एक सिसकारी जो हवा में घुली आती है और हमेशा धुन्ध भरे दिनों की याद दिलाती है। छुट्टियों में किसी अनजान शहर से गुज़रते हुए रेल की खिड़की पर दिखती है, पीछा करती हुयी, दूर तक। खेतों के ऊपर ऊपर। शहरों, गाँवों की बत्तियों में टिमकती हैं कुछ पुरानी बातें जो शायद मेरी दादी ने याद कर रखी थीं और उनके साथ ही चली गयीं। कुछ लोकगीत, कुछ उनकी ज़िंदगी के क़िस्से…कुछ हमारे गाँव के बारे में कहानियाँ।

कभी न मिल सकने वाले लोगों की बातों से बनी है धुन्ध … कभी कभी इसमें बाक़ी पितर भी दिखते हैं। मेरे बाबा, मेरी दादी, नानाजी, दीदिमा… कभी कभी बड़े पापा भी। आने वाली पीढ़ी के लिए आशीर्वाद के मंत्र गुनगुनाते हुए। मैं सोचती हूँ, मेरे पितरों ने भी मुझे ऐसे ही असीसा होगा। किसी अदृश्य पुल के इर्द गिर्द ठहरी हुयी फुसफुसाती धुन्ध में। वो सारा प्रेम जो हमारे हिस्से पीढ़ी दर पीढ़ी संचित होता आता है। पहाड़ों के बीच सदियों के मंत्र। काली, गहरी, डरावनी रातों को संबल क्या इन्हीं प्रार्थनाओं से आता है?

कभी कभी हमें लगता है, हम अकेले नहीं हैं। जुड़े हुए हैं। इस सृष्टि के ताने-बाने में हर धागा दूसरे धागे से जुड़ता जाता है। जुड़ने की जगह जो थोड़ी सी बारीकी आ जाती है, उसे सब लोग नहीं महसूस कर पाते। हैंडलूम की साड़ियाँ पहनने से इतना हुआ है कि इस तरह की बारिकियाँ नज़र में कुछ ज़्यादा आती हैं। कहीं धागे के ऊपर दूसरा धागा लिपटा हुआ। मैं बुनकर की उँगलियों के बारे में सोचते हुए ईश्वर के बारे में सोचती हूँ।

मैंने एक लोरी गुनगुनानी शुरू कर दी एक रात। उसके बोल, उसकी धुन, और गाते हुए बाँस के झुरमुट में सरसराती हवा की सनसन…सब एक साथ गुँथे ऐसे हैं कि किसी और के सामने गाते हुए मेरा गला अक्सर भर्रा जाता। मैं उसे बिल्कुल अकेले में गाती हूँ। मुझे याद नहीं है, पर लगता है, शायद ये लोरी मेरी माँ मुझे गा के सुनाती थी। एक ऐसे बचपन में जिसका सब कुछ याद्दाश्त से धुल चुका है। माँ के जाने के साथ वो कहानियाँ हमेशा के लिए चली जाती हैं जो हमारे बचपन को ज़िंदा रखतीं।
आधी नींद की किनार पर धूप चुभती है। मैं सोचती हूँ प्रेम भी बिना कहे विदा लेता है। किसी अदृश्य पुल के दूसरी तरफ़ प्रेम भी इंतज़ार में होता है कि किसी को नाव चलानी आए तो जा सके उस पर। कभी कभी प्रेम बीच दरिया में डूब जाना चाहता है। इतरां को लिखना ख़ुद को ख़ाली करना है। उन रंगों और गंधों को तलाशना है जो मेरे अवचेतन में तो हैं, पर लिखते हुए लगता है किसी और जन्म का जिया हुआ लिख रही हूँ।
इतरां। ऐसा गुमशुदा सा नाम क्यूँ रखा मैंने उसका। क्या वो भी खो जाएगी मेरी बाक़ी कहानियों की तरह? मैं उसका अंतिम अलविदा लिखने के पहले इतना हिचक क्यूँ रही हूँ। क्या वो भी मुझे फिर किसी पुल के पार दिखेगी और हमारे बीच कई शहर गुज़रते जाएँगे। मैं सिक्का फेंक कर कोई मन्नत माँग लेना चाहूँगी, उसके वापस लौटा लाने के लिए? क्या मैंने इतने पूजास्थल देख लिए कि हर जगह मनौती का धागा बाँधने का अब मन नहीं करता? मैंने अपने हाथ की लकीरें आख़िरी बार कब देखी थीं? कोई मेरा गाल थपथपाता है, आधी नींद में, जगाता है…कि हर कुछ सपना नहीं होगा एक रोज़। अपने किरदारों से इश्क़ नहीं करना चाहिए। उनसे थोड़ी दूरी बना के रखना जीने की जगह और वजह दोनों देता है। मैं इक रोज़ समझदारी की बातें करने के साथ साथ समझ में भी आने लगेंगीं।

वो जो लगता था, कोई दुःख आत्मा को लगा है। वो असल में, वो, वो ही सच में...सुख था। 
मेरे दिल में आज भी बहुत प्रेम है। किसी के हिस्से का नाम लिखे बग़ैर। 

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