दिव्या विजय : पहली कहानी से पहले संग्रह तक (दूसरा भाग)




दिव्या विजय जितनी उदारमना लेखिका हैं, उतनी ही गंभीर पाठक। उनके पास सघन अनुभूतियों के किस्से हैं और वह अंतर्मन में उठते सवालों पर पूर्वाग्रहरहित होकर विचार करती हैं। उनके गद्य में एक सहज आकर्षण है जिसकी सरसता पाठकों को अपनी और खींचती है तथा अंतर्निहित कथ्य ठहर कर सोचने के लिए मजबूर कर देते हैं। विधा के चयन, पहली रचना से लेकर पहले संग्रह तक के सफ़र पर आइये उनके विचारों को जानें।

नरेन्द्र कुमार : आपने एक पाठक के रूप में गद्य को वरीयता दी। क्या यह पाठकीयता ही लेखन में विधा के चयन का आधार बनी?


दिव्या विजयहालाँकि यह हो सकता है कि पढ़ने और लिखने में मन अलग-अलग विधा में रुचे। पाठक के रूप में मेरी वरीयता, मेरे लेखन में यूँ ही किसी पसंद या टेव के रूप में विकसित नहीं हुई। मेरे विचार से कहानी स्वयं को अभिव्यक्त करने की सबसे पुरानी और नयी विधा है। पुरानी क्योंकि भाषा के जन्मते ही आपबीती कहने और परबीती सुनने से ही कहानी का आरंभ हुआ तथा नयी क्योंकि कि साहित्य में यह अभी केवल एक सदी पहले ही आयी है।

लेखक की तुलना प्रजापति से की गयी है जो अपने लेखन द्वारा एक नये संसार को रचता है। वह उसका सृष्टा होता है जो पहले अपने मन मस्तिष्क में उसकी रचना से हर्षित होता है और फिर वही आनंद लिख कर, पाठकों तक पहुँचा कर उन्हें अपने अनुभव में साझीदार बना लेता है। पात्रों के आपसी या स्वयं के या परिस्थितियों के विरुद्ध द्वंद्व की जो क्षिप्रता और तीव्रता सृजित करने का अवसर लेखक को कहानी में मिलता है, शायद उसने मुझे ज़्यादा अपनी ओर खींचा। या कहूँ कि मैंने नहीं बल्कि विधा ने मुझे चुना।

नरेन्द्र कुमार : विधा के रूप में कविता ने आपको कितना आकर्षित किया है?

दिव्या विजय : काव्य के भेदोपभेद में जायें तो बालमन रामलीला में राधेश्याम कथावाचक के पद्यात्मक संवादों में भी आनंद पाता था। रामचरित मानस का पारायण भी घर में होता था। पाठ्यपुस्तकों में बच्चन की ' रही रवि की सवारी' तथा नीरज की 'छिप-छिप अश्रु बहाने वालों' कविता पढ़ते ही ज़ुबान पर चढ़ गयीं थीं। किसी तर्कणा से परे कविता की लयात्मकता, गेयता और सौंदर्यानुभूति ही पहले-पहल मन को आकर्षित करती थी। फिर भक्तिकालीन सूफ़ी-संत काव्य, सूर का वात्सल्य तथा रीतिकालीन शृंगार, अनुप्रास के ध्वनिचित्र काव्यपाठ के आनंद से इतर अर्थभावन द्वारा रसानुभूति की भी माँग करने लगे। श्रीधर पाठक के प्रकृति चित्रण से लेकर केदारनाथ अग्रवाल का ग्राम्य सौंदर्य'चंद्र गहना से लौटती बेर' तक, वाद और युग का विचार किए बिना उपलब्ध काव्य पढ़ कर रसास्वादन किया। दरअसल दसवीं कक्षा के बाद हिन्दी साहित्य मेरी पढ़ाई का विषय नहीं रहा अतः काल, युग, वाद आदि से विधिवत परिचय नहीं हुआ परंतु शायद यही कारण था कि इन सब वाद आदि से बिना प्रभावित हुए ही काव्य पढ़ने का उत्साह और प्रेरणा मिली। लेखक के तौर पर तो अभी मन गद्य में ही रमा है, आगे कभी पद्य में कुछ लिखा तो वह पाठकों तक पहुँचेगा ही।

नरेन्द्र कुमार : आप कथा के साथ कथेतर गद्य भी लिखती हैं। दोनों की रचना-प्रक्रिया में आप क्या मूलभूत अंतर पाती हैं?

दिव्या विजय : कोई भी रचना रूपाकार ग्रहण करने से पूर्व रचनाकार के मन में आकार लेती है। रचनात्मक प्रक्रिया की शुरूआत दरअसल लेखक की अपनी संवेदना, आसपास के परिवेश और उससे उत्पन्न अनुभव से होती है। जॉर्ज ह्वेली ने अपनी पुस्तक ' पोयटिक प्रोसेस' में सृजन प्रक्रिया के बारे में लिखा है कि "प्रक्रिया-कलात्मक कृति जिसका परिणाम होती है- एक साथ ही अन्वेषण और आत्मानवेषण दोनों ही है, यह एक प्रकार का आत्मबोध है जो रचनात्मक संसार को वास्तविक बना देता है।"

रचना प्रक्रिया को विस्तारित अर्थ में देखा जाए तो वह विचार या अनुभूति जो रचना का उत्स है, भी उसमें सम्मिलित है। जो रचनात्मक अनुभूति लेखक को एक तड़ित चमक की भाँति उपलब्ध होती है वह भी एक लंबी प्रक्रिया का फल होती है। इसलिए रचना का विवेचन-विश्लेषण तो हो पाता है परंतु रचना-प्रक्रिया का सटीक विश्लेषण कर पाना आसान नहीं।

सृजन प्रक्रिया में कोई लेखक अपने अनुभव की अभिव्यक्ति के लिए किसी विधा का चयन कैसे और क्यों करता है यह भी एकाधिक आंतरिक बाह्य कारणों पर निर्भर करता है, जिन्हें कई बार लेखक भी बता पाने में समर्थ नहीं होता। वह जिस भी माध्यम को सहज पाता है, चुनता है। रचनात्मक अनुभूति के मन में उत्पन्न होने से विधा के चयन तक प्रक्रिया क्रमिक और सादृश्य ही है, तदनंतर अभिव्यक्ति माध्यम में तात्विक अंतर तो आता ही है परंतु कथा और कथेतर गद्य की रचना प्रक्रिया में मूलभूत अंतर वैयक्तिकता और निर्वैयक्तिकता का है। कथा साहित्य में लेखक स्वयं अनुपस्थित रहता है, पात्र ही उसकी अनुभूति को वहन कर पाठकों तक ले जाते हैं। इसी कारण कई बार यह भी कहा जाता है कि अनुभूति सर्वथा उसी रूप में रचना में प्रतिबिंबित नहीं होती जिस रूप में वह लेखक के मन में उपजी थी। है। जबकि कथेतर गद्य में उसका संवाद पाठक से सीधे हो सकता है परंतु यहाँ वह संवेदना न्यूनाधिक रूप में लेखक के व्यक्तित्व से प्रभावित होती है।

नरेन्द्र कुमार : आपने पहली कहानी कब लिखी?

दिव्या विजय : बीज दिन की ही बात करूँ तो शायद चौथी कक्षा की बात है। रेग्युलर अध्यापिका छुट्टी पर थीं और उनकी जगह एक नयी अध्यापिका आयीं थीं। हम बच्चों को व्यस्त करने के उद्देश्य से वे पूरी कक्षा को स्कूल के मैदान में ले गयीं और सभी को कहानी-कविता जो रुचे, लिखने के लिए कहा। बाल्यावस्था में पेड़-पौधे, पक्षी आकर्षित करते थे सो मेरी कहानी की नायक भी एक दयालु चिड़िया थी, जो उसका बुरा करने वाले को माफ़ कर फिर से जीवन के संघर्ष में रत हो जाती है। मैडम ने मेरी कहानी को प्रथम घोषित किया। इतने उत्साह वर्द्धन ने मेरे नये-नये शौक को बढ़ावा दिया। फिर और भी कुछ लिखती रही परंतु सब छुटपन के विषय थे जिनमें से कुछ पन्ने सहेज पाई और कुछ खो गये।

स्वप्रेरणा से पहली गंभीर कहानी 'मूक संवेदनाएँ' नाम से लिखी थी, जब मैं नवमी कक्षा में थी। यह कहानी किसी मशग़ले के लिए नहीं थी। गर्मी की छुट्टियों में खिड़की से झाँकते मकानों को देखते-देखते मैंने स्वयं को मकानों और मकीनों के आपसी संबंधों के ख़याल और सवालों से निमज्जित पाया। अपने निवासियों से मकान क्या चाहते होंगे, पुरानों के जाने पर उनकी ग़मज़दा होने, यादों को सहेज कर रखने और नयों के आने पर उनकी ख़ुशी, नयों से उनके संबंध आदि सवाल उपजे। इन्हीं सवालों और भावनाओं को मकानों की तरफ़ से कहते और फिर उनके जवाबों को तलाशते हुए पूरी कहानी बुनी गयी।

नरेन्द्र कुमार : वह पहली कहानी कौन-सी थी, जो किसी पत्रिका के माध्यम से पाठकों के बीच आयी? उसपर कैसी प्रतिक्रियायें प्राप्त हुईं?

दिव्या विजय : 'परवर्ट' कहानी को सम्मानित पत्रिका कथादेश में पहली बार प्रकाशित होने का अवसर मिला। पाठकों तक पहुँची पहली कहानी के प्रति उनकी प्रतिक्रियाओं को लेकर एक स्वाभाविक नर्वसनेस तो थी परंतु सुधिजनों से कहानी को मिली प्रशंसा और प्यार से अपने लेखन के प्रति मेरा कॉन्फ़िडेंस बढ़ा। कहानी एक ही प्रेम की मर्यादा-पवित्रता और उसे ज़िन्दगी भर ढोने वाले फ़्रेम के विपरीत थी और यह नज़रिया पाठकों को पसंद आया, उन्होंने नायक की भावनाओं के साथ कनैक्शन फ़ील किया। विषय के ट्रीटमेंट, भाषा, मुख्य पात्र का समाज के ज़बरदस्ती ओढ़े गये प्रेम के उलट, प्रेम से अपने तईं ईमानदारी बरतने का मजबूत दृष्टिकोण, सब पसंद आया। तारीफ़ के साथ कुछेक आलोचनायें भी थीं परन्तु वे ज़्यादातर सलाह के स्वर में थीं। मेरे लिए तो वे भी अमूल्य थीं क्योंकि गुण-दोषों से अधिक मेरे लिए यह महत्त्वपूर्ण था कि पाठकों ने मेरी कहानी पढ़ी और उस पर अपनी राय दी। मेरे पहले कहानी संग्रह 'अलगोज़े की धुन पर' में भी यह कहानी सम्मिलित है और आज भी बाक़ी कहानियों के साथ इस कहानी के लिए भी पाठकों से ईमेल्स, मैसेज और ख़त मिलते रहते हैं।

परिचय :



नाम - दिव्या विजय, जन्म - 20 नवम्बर, 1984, जन्म स्थान – अलवर, राजस्थान, शिक्षा - बायोटेक्नोलॉजी से स्नातक, सेल्स एंड मार्केटिंग में एम.बी.ए., ड्रामेटिक्स से स्नातकोत्तर


विधाएँ - कहानी, लेख, स्तंभ

‘अलगोज़े की धुन पर’ कहानियों की पहली किताब। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं जैसे नवभारत टाइम्स, कथादेश, इंद्रप्रस्थ भारती, पूर्वग्रह, जनपथ, नया ज्ञानोदय, परिकथा, सृजन सरोकार आदि में नियमित प्रकाशन। इंटरनेट पर हिन्दी की अग्रणी वेबसाइट्स पर अद्यतन विषयों पर लेख। रविवार डाइजेस्ट में नियमित स्तंभ।

अभिनय : अंधा युग, नटी बिनोदिनी, किंग लियर, सारी रात, वीकेंड आदि नाटकों में अभिनय। रेडियो नाटकों में स्वर अभिनय। 

सम्मान - मैन्यूस्क्रिप्ट कॉन्टेस्ट विनर, मुंबई लिट-ओ-फ़ैस्ट 2017 

सम्प्रति - स्वंतत्र लेखन, वॉयस ओवर आर्टिस्ट 

ईमेल- divya_vijay2011@yahoo.com

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