समझना जरूरी नहीं होता है हमेशा पागलपन



एक
लम्बे अर्से तक टिक कर 
अघोषित अर्धविक्षिप्तता के अंधेरे में 
की गयी बड़बड़ाहट को 

सफेद कागज के ऊपर 
काले अक्षरों को भैंस बराबर 
देखते समझते जानबूझ कर 
रायते की तरह फैलाने की कोशिश 
जरूर कामयाब होती है 

एक नहीं 
कई उदाहरण सामने से नजर आयेंगे 
जरूरत प्रयास करने की है 

अब 
कौन विक्षिप्त है कौन अर्धविक्षिप्त है 

ये 
तरतीब से पहने हुऐ कपड़े 
या दिखायी जा रही अच्छी आदतों से 
बताया जा सकता है या नहीं 
अलग प्रश्न पत्र का प्रश्न है 

फर्क
बस कोण का होता है 
होती हर किसी में है 
ये पक्का है 

पर
पैमाना किसका है 
और
नापा क्या जा रहा है 
ज्यादा महत्वपूर्ण है 

पहले पहले चलना सीखते 
सड़क से बाहर उतर जाना 

उसी तरह का है 
जैसे उछलते कूदते फाँदते 
बड़बड़ाहट के शब्दों का 
कलम से निकलते निकलते 
फिसल कर कागज से बाहर हो जाना 

और
बचा रह जाना 
बस शब्दों की छीलन का कागज पर 

नहीं आयेगा समझ में 

क्योंकि
नहीं समझ में आया ही 
बदल जाता है होंठों के बीच 
दाँतों से निकलती हवा में 

रह जाती हैंं कुछ आवाजें 
फुस्स फिस्स
जैसी 

और
आवाजों के अर्थ 
किसी शब्दकोष में 
कहाँ पाये जाते हैं 

‘उलूक’ 
पागल पागल होते हैं 
पागल कैसे बनायेंगे किसी को 

समझना
जरूरी नहीं है 
हमेशा पागलपन। 

चित्र साभार: 

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