गले गले तक भर गये नहीं कहे जा रहे को रोक कर रखने से कौन सा उसका अचार हो लेना है
मन
पक्का करना है बस
पक्का करना है बस
सोच को
संक्रमित नहीं होने देना है
संक्रमित नहीं होने देना है
भीड़ घेरती ही है
उसे कौन सा
अपनी सोच से कुछ लेना देना है
अपनी सोच से कुछ लेना देना है
शरीर नश्वर है
आज नहीं तो कल मिट्टी होना है
तेरा तुझ को अर्पण क्या लागे मेरा
की
याद आ रही हो सभी को
जब नौ दिशाओं से
ऐसे माहौल में
कुछ कहना जैसे ना कहना है
सिक्का उछालने वाला बदलने वाला नहीं है
चित भी उसकी पट भी उसकी
सिक्का भी उसी की तरह का
जिसे हर हाल में
रेत नहीं होने के बावजूद
सन्तुलन दिखाते मुँह चिढ़ाते
सीधा बिना इधर उधर गिरे खड़ा होना है
सकारात्मकता का ज्ञान दे रही
खचाखच हो गयी भीड़ की
चिल्ल पौं के सामने
कुछ कह देना
अपनी इसकी और उसकी
की
ऐसी की तैसी करवा लेने का लाईसेंस
खुद अपने हस्ताक्षर कर के दे देना है
छोड़ क्यों नहीं देता है
पता नहीं
‘उलूक’
‘उलूक’
बकवास करने के नशे को किसी तरह
गले गले तक भरे कबाड़ शब्दों को
कौन सा
किसी सभ्य समाज के
सभ्य ठेकेदार की
खड़ी मूँछों को तीखी करने वाले
तेल की धार हो लेना है ?
चित्र साभार:

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