स्वामी दयानंद और आर्य समाज


इनका बचपन का नाम मूल शंकर था और जन्म 1824 ईसवी मौरवी गुजरात में हुआ था। २१ वर्ष की अवस्था में 1845 ईस्वी में घर से भाग निकले. स्वामी पूर्णानंद न 1848 ईस्वी में दयानंद सरस्वती नाम दिया। 1861 ईस्वी में मथुरा में इनकी भेंट अंधे स्वामी विरजानंद हुई। दयानंद सरस्वती इन के शिष्य बन गए। इन्होंने अपने गुरु से प्रतिज्ञा की कि मैं पूरे भारत में हिंदू धर्म एवं संस्कृति को प्रतिष्ठित करूंगा
1863 ईस्वी में अपने धर्म का प्रचार करने के लिए आगरा में इन्होंने पाखण्ड- खण्डिनी पताका फहराई तथा 1875 ईस्वी में मुंबई में आर्य समाज की स्थापना की।1877 इस्वी में इन्होंने अपना मुख्यालय लाहौर को बनाया।
आर्य समाज पंजाब और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सर्वाधिक लोकप्रिय हुआ। इन्होंने वेदों की ओर लौटो का नारा दिया। ये कठोर सुधारवादी थे। आर्य समाज ने छुआछूत, जाति व्यवस्था का विरोध किया परंतु वर्ण व्यवस्था का समर्थन किया। हिंदू धर्म को प्रतिष्ठित करने के लिए स्वामी जी ने 10 सिद्धांतों की स्थापना की।
१)-: वेद मंत्रों के आधार पर हवन किया जाना चाहिए.
२)-: मूर्ति पूजा का विरोध.
३)-: अवतारवाद एवं धार्मिक यात्राओं का विरोध।
४)-: कर्म सिद्धांत और आवागमन सिद्धांत का समर्थन.
५)-: निराकार ईश्वर की एकता में विश्वास.
६)-: स्त्री शिक्षा में विश्वास.
७)-: विशेष परिस्थितियों में विधवा विवाह की स्वीकृति.
८)-: बाल विवाह एवं बहु विवाह का विरोध.
९)-: हिंदी संस्कृति भाषा का प्रचार.
१०)-: सत्य केवल वेदों में निहित है इस कारण वेदो का अध्ययन परम आवश्यक है।
                        अंग्रेजों ने ब्रह्म समाज एवं आर्य समाज को प्रोत्साहन दिया था लेकिन दयानंद की लार्ड नॉर्थब्रुक से भेंट के बाद अंग्रेजों का दृष्टिकोण बदल गया। इसका कारण यह था कि नार्थबुक ने इन्हें अपने बातों के साथ-साथ विक्टोरिया का यशोगान करने के लिए कहा। उन्होंने इसे अस्वीकार कर दिया 1874 इस्वी में दयानंद ने सत्यार्थ प्रकाश प्रकाशित किया।केशव चन्द्र सेन की प्रेरणा से इन्होंने इसी हिंदी भाषा में लिखा।
            भारतीय समाज को धर्म परिवर्तन से बचाने के लिए स्वामी दयानंद ने शुद्धि आंदोलन चलाया। जिसके द्वारा ईसाई बने हिंदुओं को वापस अपनी उनकी संस्कृति में लाया गया इन्होंने वेद भाष्य और वेद भाष्य भूमिका जैसी पुस्तकें भी लिखी। ये पहले व्यक्ति थे जिन्होंने स्वराज शब्द का प्रयोग किया। इन्होंने ही पहली बार यह बताया कि विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करना चाहिए और भारत में बनी स्वदेशी वस्तुओं का ही प्रयोग करना चाहिए। यह पहले व्यक्ति थे जिन्होंने हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकार किया। 1882 में इन्होंने एक गौ रक्षा समिति बनाई. अजमेर में 30 अक्टूबर 1883 को इनकी मृत्यु हो गई. शिक्षा के क्षेत्र का योगदान उल्लेखनीय रहा।स्वामी ने भारत के पिछड़ेपन का एक प्रमुख कारण व्यापक अज्ञानता को माना था।
           स्वामी जी की मृत्यु के बाद आर्य समाज में शिक्षा को अंग्रेजी और हिंदी भाषा में अपनाएं जाने के प्रश्न पर मतभेद हो गया लाला हंसराज अंग्रेजी शिक्षा के प्रबल समर्थक थे। उन्होंने लाहौर में दयानंद एंग्लो वैदिक कॉलेज (डीएवी) की स्थापना की, जबकि स्वामी श्रद्धानंद  या मुंशीराम ने उन्हें हरिद्वार के निकट कांगड़ी में गुरुकुल विश्वविद्यालय की नींव रखी।
1907 ईस्वी में लंदन टाइम्स की ओर से भारत के उत्तर पुथल की जांच करने आए वेलेंटाइन शिरोल ने आर्य समाज को भारतीय अशांति का जन्मदाता कहा।

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