2 अनुवाद - मराठी कविताएँ - विजय नगरकर

सुप्रसिद्ध मराठी नाटककार एवं कवि गोविंदाग्रज (राम गणेश गडकरी) की कविता का हिंदी अनुवाद सादर प्रस्तुत है-
मंगल भूमि ,पवित्र भूमि,महाराष्ट्र भूमि
इस महाराष्ट्र भूमि को मेरा प्रणाम।
सख़्त भूमि, सुदृढ भूमि,पत्थरों की भूमि
नाजुक भूमि,कोमल भूमि, फूलों की भूमि।
अंजन,कंचन,करौंदी के काँटों की भूमि
बकुल,प्राजक्त फूलों से सुवासिक भूमि।
भाव भक्ति की भूमि और बुद्धि की भूमि
शाहिरों की भूमि , निर्माता मर्दों की भूमि।
तेरे मानस में लक्ष्य, तेरे निशान पर डोले विजय पताका
इस इह लोक में जोड़े मानव, व्यवहार,परमार्थ,वैभव,वैराग्य के साथ
जरी पटका सह एक ध्वज के नीचे
पावन श्री महाराष्ट्र भूमि को मेरा प्रणाम।
अपार सिंधु के भव्य बंधु , महाराष्ट्र भूमि
सह्याद्री का सखा, जीवनसाथी महाराष्ट्र भूमि।
पाषाण देह पर हरी सम्पन्न भूमि
गोदावरी,कृष्णा,भीमा तेरे ललाट की रेषा।
तेरे देह पर प्रथम प्राणियों की प्रतिष्ठा
मंगल आबादी,जन स्थान पर श्री रघुनाथ की कृपा, लक्ष्य है तेरे अंतःकरण में ।
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संत ज्ञानेश्रर जी ने ज्ञानेश्वरी ग्रंथ अर्थात "सटीक भावार्थ दीपिका" पूर्ण करने के उपरांत ईश्वर को जो प्रार्थना लिखी थी,उसे 'पसायदान' से मराठी विश्व में ख्याति प्राप्त हुई है। अत्यंत कष्टदायी जीवन बिताने पर गीता ग्रंथ पर सटीक विवरण प्राकृत मराठी में लिखा। संन्यासी के पुत्र के नाम से जाति से बहिष्कृत किया गया। सनातन धर्म की ज्योत प्रज्वलित करके आम लोगों में ज्ञान गंगा प्रवाहित की। तत्कालीन आसान प्राकृत भाषा में गीता का ज्ञान प्रवाहित किया जो वर्षों से संस्कृत भाषा की मर्यादा में बंधा हुआ था।संत ज्ञानेश्वर संतों में क्रांतिकारक संत थे जिहोंने दीन दुखी आम लोगों के लिए धार्मिक कार्य किया। मराठी के प्रथम आद्य कवि, अनुवादक, समीक्षक, मार्गदर्शक संत ज्ञानेश्वर के चरणों पर पसायदान का हिंदी अनुवाद सविनय सादर प्रस्तुत है। मेरी अल्प बुद्धि से यह अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-
*पसायदान*
विश्वरचयिता ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ
मेरे वाक यज्ञ से संतुष्ट होकर
मुझे अनुग्रहित करके प्रसाद प्रदान करें। (1)
दुष्टों की दुर्भावना का अंत हो,
सत्कर्म के प्रति दुष्टों की आस्था बढ़े
विश्व में मित्र भाव प्रवाहित होकर
सभी जीवों में मित्रता बढ़े । (2)
पापी के मन का अज्ञान रुपी अंधकार दूर हो
विश्व में स्वधर्म रुपी उषा काल हो
सभी जीवों की मंगल मनोकामनाएँ पूर्ण हो (3)
सर्वत्र मंगल वृष्टि से
सकल विश्व को पुलकित करनेवाले
ईश्वरनिष्ठ संत
सभी जीवों पर कृपा करें (4)
वे सभी सुसंवादी संत कल्पतरु समान
उद्यान हैं
चेतनारूपी चिंतामणी रत्नों के पुर हैं
अमृत स्वर की गर्जना करनेवाले समुद्र हैं (5)
बेदाग पूर्णिमा के चंद्र और
ताप रहित सूर्य के समान संत सज्जन
सभी जीवों के मित्र हो जाएं (6)
त्रिलोकों में सर्व सुख सम्पन्न पूर्ण होकर
विश्व के आदि पुरुष की सेवा करें (7)
यह ग्रंथ जिनका जीवन है
वे इस विश्व के दृश्य और अदृश्य
भोग पर विजय प्राप्त करें (8)
इति विश्वेश्वर गुरु श्री निवृत्तिनाथ
आशीर्वाद देकर बोले
यह प्रसाद तुझे प्राप्त हो
यह वर पाकर ज्ञानदेव सुखी हो गया (9)
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~विजय नगरकर(मूल मराठी कवि, नाटककार गोविंदाग्रज की कविता 'महाराष्ट्र देशा' का भावानुवाद )
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