राम के फरियादी - प्रतिभा जोशी की कविताएँ

राम के फ़रियादी
कैकई की फरियाद
लो लगा आज फिर राम दरबार,
आई कैकेयी अब लिए नयनों में आंसू,
शिकायतें कई राम से लाई दिल में,
और पूछे राम से अपराध अपने,
क्यों दिया कलंक तुमने एक माँ को,
पाई कहाँ कमी प्यार में मेरे राम,
बदल दी सोच मेरी, फेरी जिव्हा मेरी,
हाय, हुआ विलग राम मेरा मुझसे,
ले गया संग लक्ष्मण और जानकी को,
दूर हुआ भरत मुझसे, मन से, दिल से,
हाय राम, छीन गये प्रियवर मुझसे,
क्यों डाली मार मेरी भावनाएं ममता की,
सूनी अयोध्या गिनवाए पाप सदा मेरे,
बना कैकेयी नाम कलंक द्वापर से कलयुग में,
हाय राम, आये नाम मेरा कहानियों में जब जब,
हो जाये मुंह कड़वा सुनें नाम मेरा तब ||
नयनों में देख आंसू चरण पकड़ बोले राम,
क्षमा मांगे यह राम आज अपनी माँ से,
माँ, लाया संग अपने मैं अपनी मर्यादाएं,
था प्रयोजन मिलना अपने संतों से,
लाना था जय विजय को धरा से,
बन जायेंगी शिक्षाएं, मेरी मर्यादाएं धरा पे,
भूमिकाएँ सबने वही निभाईं लिखी जो मैंने,
न कमी थी प्यार में, न भेद किया माँ तूने,
था मैं ही कठोर जो लिखी भूमिका कठोर तेरी,
माना होगी राम कथा घरों में जब जब,
होगा मुंह कडवा जन का, नाम आने से कैकेयी,
उठेगी टीस दिल में, तू जान माँ, इस राम के,
मांगूं क्षमा मैं राम आज अपनी माँ से |
विभीषण की फरियाद
रावण अनुज मैं विभीषण करूँ फरियाद आज,
मैं शरणार्थी पुन: आया तेरी शरण में राम,
भक्त मैं तुम्हारा भक्ति करना मेरा काम,
सोने की लंका में रहकर भजन करा सोने सा,
सीताहरण सुन जाना हरि आना तुम्हारा बनके राम,
देख विलाप माता का, रोता मन मेरा हर क्षण,
आना तुम्हारा सेतु पार, खिल उठा फूलों सा मैं,
जाना पाके मुक्ति अपने मेरे, आयेंगे हरि तेरे धाम,
खोली जिव्हा तोड़ी मर्यादाएं अनुज की मैंने,
सहकर अपमान आया तेरी शरण में मैं राम,
जलती लंका को देखा, देखी मौतें अपनों की,
न जाना हरि को, लड़कर हरि से, पंहुचे हरि धाम,
मिली भक्ति, शक्ति मिली, पाई संपदा अनहद मैंने,
राह दिखाते राहगीर को न बनाते साथी मुझे राम,
भक्ति में तेरी, बन गया कुपात्र लोकोक्तियों का,
लंका भेदी कहलाया, ढह गयी सोने की लंका मुझसे |
श्रीकृष्ण की फरियाद
द्वापर से आया मैं कृष्ण लेकर फरियाद,
दरबार में बैठे राम सुनो मेरा भी वाद,
हैं हम दोनों विष्णु के ही अवतार ,
नाश पापों का धरा के करना काम,
चौदह कलाओं के स्वामी मर्यादापुरुषोत्तम राम,
बन अग्रज संग लाये अपने अनुज प्यारे,
खड़े रहे संग तुम्हारे तन से, मन से,
पाए संत अपने, दानव घिरे वनों में ,
मिले संकटमोचन हनुमान तुम्हें अनमोल,
लव कुश पाए तुमने कराये जानकी मिलन,
नितांत अकेला मैं यादव कृष्ण महासमर में,
विजयी हुए पांडव मेरे पर मैं हारा,
ढूढती रह गईं निगाहें मेरी अपनों को,
घिर आये प्रश्नचिन्ह चहरे पर मोहन के |
बोले अब राम लिए मीठी मुस्कान,
सोलह कलाओं से सजे श्रीकृष्ण मेरे,
आई तुम्हारी कला कौनसी नयी यह,
कहलाया मर्यादापुरुषोत्तम मैं सदा,
निभाईं मर्यादाएं तुमने समय समय,
मिले मुझे त्रेता में मिले तुम्हें द्वापर में,
सजाए बांसुरी, फैलाई सरगम धरा पे,
आये शिव खुद ही बन बांसुरी तुम्हारी.
संत मेरे बन आए ब्रजगोपियाँ तेरी,
मिले अपने भी, पर मिली राधा अनमोल |
राम की फरियाद
आया आज स्वयं मैं राम, रामदरबार में,
कर रहा मैं फरियाद मर्यादापुरुषोत्तम राम,
क्यों दी मुझे मर्यादाएं इतनी अनंत, विशाल,
सहा वियोग परिजनों का, मेरी अयोध्या का,
देखा प्रेम भरत का, आवेश लखन का,
न देखा मौन, न भीगी आँखें उर्मिला की,
न देखा विलाप माताओं का, ना तड़प तात की,
क्यों बनाया कठोर मुझे मर्यादापुरुषोत्तम राम |
लेकर अपनी मर्यादाएं दिया जानकी को वियोग,
मारा बाली को तोड़ी अपनी मर्यादा सिर्फ़ एक,
कह न सका विभीषण को त्याग महासमर,
बन अयोध्या राजन, दिया वियोग पुन: सीता को,
लव कुश राजकुमार मेरे रहे वनों में संतों संग,
सुन फरियादें राम की, मंद मंद मुस्काएं राम,
राम, मेरे हो राम तुम शांत मर्यादाओं वाले,
मर्यादाएं निभाईं, सीखेगा जहाँ कल इनसे,
मर्यादाएं यही कल बनेंगी नियम गृहस्थी के,
लक्ष्मणरेखा लक्ष्मण की शिक्षा बनेगी आगे की,
राम आओ, समाओ राम में, बन जाओ तुम राम,
लिए अपनी मीठी मुस्कान राम समाये विग्रह में |
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