उदास चेहरा भी कार्टून में जगह ले लेता है कुछ भी लिखे को व्यंग समझना जरूरी नहीं होता है: ताला बन्दी के बहाने बकवास
उबासी लेता
व्यंग
अवसादग्रस्त है
मगर
मानने को
तैयार नहीं है
उसके
खुद
अपने चेहरे को खींचते हुऐ
दाँत निपोरना
जोर लगा कर हैशा
कुछ
ऐसा अहसास
करा रहा है
जैसे
कलम का लिखा
नहीं
सामने से
कलम का
हाथ में लोटा लिये
दिशा जाना
समझा रहा है
कलम
वैसे भी
अब कहीं
होती भी कहाँ है
कलम
मोक्ष प्राप्त कर
आभासी
हो चुकी है
मुँह के सामने
स्क्रीन पर
बनते लटकते
सफेद पर काले
मशीन के
पूँछ लगे मूषक
के
इशारों पर
घसीटते घिसटते
शब्दों के प्रतिबिम्ब
आभासी
अहम ब्रह्मास्मिं का बोध कर
स्वयं को स्वयं में
आत्मसात कर
मोक्ष प्राप्त कर चुकी
परम आत्मा हो लेने के लिये
उकसा रहा है
बौरा जाने के
मौसमों
और
उसके प्रकार पर
निबन्ध
बाँधने के लिये
सीमाओं को खोल कर
लेखन के बैल
या गाय
को
गले में
उसकी रस्सी लपेट कर
आजाद कर देने के बाद
गोबर से बने
भित्तिचित्रों
जैसे अभिलेखों पर
आँखें गड़ाये ‘उलूक’ को भी
इन्तजार है
अच्छे दिनों का
वो
अच्छे दिन
जिनका
अच्छा
मतलब निकाल कर
अच्छा
महसूस कर सके
कुछ
वैसा ही
जैसा
अलसुबह
किसी रोज
गड़गड़ाहट के साथ
पेट के
साफ हो जाने के बाद
होता है।
चित्र साभार: https://pixabay.com/
व्यंग
अवसादग्रस्त है
मगर
मानने को
तैयार नहीं है
उसके
खुद
अपने चेहरे को खींचते हुऐ
दाँत निपोरना
जोर लगा कर हैशा
कुछ
ऐसा अहसास
करा रहा है
जैसे
कलम का लिखा
नहीं
सामने से
कलम का
हाथ में लोटा लिये
दिशा जाना
समझा रहा है
कलम
वैसे भी
अब कहीं
होती भी कहाँ है
कलम
मोक्ष प्राप्त कर
आभासी
हो चुकी है
मुँह के सामने
स्क्रीन पर
बनते लटकते
सफेद पर काले
मशीन के
पूँछ लगे मूषक
के
इशारों पर
घसीटते घिसटते
शब्दों के प्रतिबिम्ब
आभासी
अहम ब्रह्मास्मिं का बोध कर
स्वयं को स्वयं में
आत्मसात कर
मोक्ष प्राप्त कर चुकी
परम आत्मा हो लेने के लिये
उकसा रहा है
बौरा जाने के
मौसमों
और
उसके प्रकार पर
निबन्ध
बाँधने के लिये
सीमाओं को खोल कर
लेखन के बैल
या गाय
को
गले में
उसकी रस्सी लपेट कर
आजाद कर देने के बाद
गोबर से बने
भित्तिचित्रों
जैसे अभिलेखों पर
आँखें गड़ाये ‘उलूक’ को भी
इन्तजार है
अच्छे दिनों का
वो
अच्छे दिन
जिनका
अच्छा
मतलब निकाल कर
अच्छा
महसूस कर सके
कुछ
वैसा ही
जैसा
अलसुबह
किसी रोज
गड़गड़ाहट के साथ
पेट के
साफ हो जाने के बाद
होता है।
चित्र साभार: https://pixabay.com/

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