लघुकथा - प्रेरणा - अशोक मिश्र

प्रतीक कम्पयुटर साइंस में बी ई करने के उपरांत छः महीने से नौकरी के लिए भटक रहा था। रोज सुबह-सुबह दफ्तरों में इन्टरव्यू के लिए निकल जाता था। कदाचित् कुछ स्टेज क्लीयर भी कर लेता था पर फाइनली सेलेक्ट नहीं हो पाता था ।
एक बार फिर प्रतीक एक कम्पनी में अन्ततः चयनित नहीं हो पाने के कारण हताश और निराश होकर लौट रहा था तो देखा कि मुहल्ले का हीं एक पांव से पोलियोग्रस्त सात-आठ साल का लड़का, त्रिलोचन पैर घसीट घसीट कर आगे बढ़ रहा था। पसीना से तर-बतर त्रिलोचन थक कर किसी घर के आगे बने चबूतरे पर जब बैठ गया तो प्रतीक भी अपनी बाइक खड़ी कर उसके बगल में बैठ गया और अपने बैग से पानी का बोतल निकाल कर त्रिलोचन की ओर बढ़ा दिया।
त्रिलोचन ने पानी पीने के बाद सधन्यवाद बोतल वापस किया। प्रतीक ने त्रिलोचन से कहा- चलो मैं तुम्हें बाइक से घर छोड़ देता हूँ , लड़के ने बड़ी मासूमियत से कहा अरे! नहीं भैया, इसकी जरूरत नहीं है, यह तो मेरा रोज का काम है। वह कहने लगा, पता है !पापा मुझे आइ ए एस बनाना चाहते हैं और इसके लिए इन्सान को हर तरह की चुनौतियों का सामना करने के लिए स्वयं को तैयार करना चाहिए।असल में आज गरमी थोड़ी बढ़ी हुई है, कुछ दिनों में बर्दाश्त करने की क्षमता आ जाएगी।
उस दिव्यांग बालक की बातें सुनकर प्रतीक उत्साह से भरा जा रहा था और उसमें अब किसी प्रकार की निराशा नहीं थी क्योंकि उसको जीवन की प्रेरणा मिल चुकी थी।
अशोक मिश्र
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